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________________ चतुःसप्ततितमं पर्व ४६७ धातिकर्माणि निर्मूल्य प्राप्यानन्तचतुष्टयम् । चतुस्त्रिंशदतीशेषव्याभासिमहिमालयः ॥ ३५२॥ सयोगभावपर्यन्ते स्वपरार्थप्रसाधकः । परमौदारिकं देहं बिभ्रदभ्राङ्गणे बभौ ॥३५३ ॥ चतुर्विधामरैः साधं सौधर्मेन्द्रस्तदागतः। तुर्यकल्यागसत्पूजाविधि सर्व समानात् ॥ ३५४ ॥ अपापप्राप्तितन्विज्यास्थायिकातिशयोजितः। 'परमात्मपदं २प्रापत्परमेष्ठी स सन्मतिः ॥ ३५५ ॥ अथ दिव्यध्वनेहेतुः को भावीत्युपयोगवान् । तृतीयज्ञाननेत्रेण ज्ञात्वा मां परितुष्टवान् ॥ ३५६ ॥ तदैवागत्य मग्राम गौतमाख्यं शचीपतिः । तत्र गौतमगोत्रोत्थमिन्द्रभूतिं द्विजोत्तमम् ॥ ३५० ॥ महाभिमानमादित्यविमानादेत्यभास्वरम् । शेषैः पुण्यैः समुत्पन्नं वेदवेदाङ्ग वेदिनम् ॥ ३५८॥ दृष्टा केनाप्युपायेन समानीयान्तिकं विभोः । स्वपिपृच्छिषितं जीवभावं पृच्छेत्यचोदयत् ॥ ३५९।। अस्ति किं नास्ति वा जीवस्तत्स्वरूपं निरूप्यताम् । इत्यप्राक्षमतो मह्यं भगवान्भव्यवत्सलः ॥ ३६०॥ अस्ति जीवः स चोपाचदेहमात्रः सदादिभिः । किमादिभिश्च निदेश्यो नोत्पन्नो न विनङक्ष्यति ॥३६॥ द्रव्यरूपेण पर्यायैः परिणामी प्रतिक्षणम् । चैतन्यलक्षणः कर्ता भोक्ता सर्वैकदेशवित् ॥ ३६२॥ संसारी निर्वृतश्चेति वैविध्यन निरूपितः। अनादिरस्य संसारः सादिनिर्वाणमिष्यते ॥ ३६३ ॥ न निवृतस्य संसारो नित्या कस्यापि संसृतिः। अनन्ताः संसृतौ मुक्तास्तदनन्ताः 'सुलक्षिताः ॥३६॥ सति व्ययेऽपि बन्धानां हानिरेव न हि क्षयः । आनन्त्यमेव तद्धतुः शक्तीनामिव वस्तुनः॥ ३६५॥ शुक्लध्यानके द्वारा चारों घातिया कर्माको नष्टकर अनन्तचतुष्टय प्राप्त किये और चौंतीस अतिशयोंसे सुशोभित हो कर वे महिमाके घर हो गये ॥ ३४८-३५२ ।। अब वे सयोगकेवली गुणस्थानके धारक हो गये, निज और परका प्रयोजन सिद्ध करने लगे, तथा परमौदारिक शरीरको धारण करते हुए आकाशरूपी आंगनमें सुशोभित होने लगे ॥ ३५३ ।। उसी समय सौधर्म स्वर्गका इन्द्र चारों प्रकारके देवोंके साथ आया और उसने ज्ञानकल्याणक सम्बन्धी पूजाकी समस्त विधि पूर्ण की ॥ ३५४ ।। पुण्यरूप परमौदारिक शरीरकी पूजा तथा समवसरणकी रचना होना आदि अतिशयोंसे सम्पन्न श्रीवर्धमान स्वामी परमेष्ठी कहलाने लगे और परमात्मा पदको प्राप्त हो गये ॥ ३५५ ।। तदनन्तर इन्द्रने भगवान्की दिव्यध्वनिका कारण क्या होना चाहिये इस बातका विचार किया और अवधिज्ञानसे मुझे उसका कारण जानकर वह बहुत ही संतुष्ट हुआ ॥ ३५६ ॥ वह उसी समय मेरे गाँधमें आया। मैं वहाँ पर गोतमगोत्रीय इन्द्रभूति नामका उत्तम ब्राह्मण था, महाभिमानी था, आदित्य नामक विमानसे आकर शेष बचे हुए पुण्यके द्वारा वहाँ उत्पन्न हुआ था,मेरा शरीर अतिशय देदीप्यमान था. और मैं वेद-वेदाङ्गका जानने वाला था॥३५७-३५८॥ मुझे देखकर वह इन्ट मझे किसी उपायसे भगवानके समीप ले आया और प्रेरणा करने लगा कि तुम जीव तत्त्वके विषयमें जो कुछ पूछना चाहते थे सो पूछ लो ॥ ३५६ ॥ इन्द्रकी वात सुनकर मैंने भगवान्से पूछा कि हे भगवन् ! जीव नामका कोई पदार्थ है या नहीं? उसका स्वरूप कहिये। इसके उत्तरमें भव्यवत्सल भगवान् कहने लगे कि जीव नामका पदार्थ है और वह ग्रहण किये हुए शरीरके प्रमाण है, सत्संख्या आदि सदादिक और निर्देश आदि किमादिकसे उसका स्वरूप कहा जाता है। वह द्रव्य रूपसे न कभी उत्पन्न हुआ है और न कभी नष्ट होगा किन्तु पर्याय रूपसे प्रतिक्षण परिणमन करता है। चेतना उसका लक्षण है, वह कर्ता है, भोक्ता है, और पदार्थोके एकदेश तथा सर्वदेशका जानकार है ॥ ३६०-३६२॥ संसारी और मुक्तके भेदसे वह दो प्रकारका निरूपण किया जाता है । इसका संसार अनादि कालसे चला आ रहा है और मोक्ष सादि माना जाता है । ३६३ ॥ जो जीव मोक्ष चला जाता है उसका फिर संसार नहीं होता अर्थात् वह लौटकर संसारमें नहीं आता। किसी-किसी जीवका संसार नित्य होता है अर्थात् वह अभव्य या दूराह र भव्य होनेके कारण सदा संसारमें रहता है। इस संसारमें अनन्त जीव मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं और अनन्त जीव ही अभी बाकी हैं। कर्मबन्धनमें बंधे हुए जीवोंमेंसे १ परमाप्त-इति क्वचित् । २ प्राप म०, ल• । ३ कोऽसावीत्युप-ल०। ४-दित्यभासुरं ल.। ५ सहक्षिता क, ख, ग, घ०, म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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