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________________ चतुःसप्ततितम पर्व आनुषभिकमेतत्ते फलं भावि महत्तरम् । इति वक्तुमिवाश्चर्यपञ्चके त भवत् ॥ ३२२॥ पुण्यहेतुविनेयानां वीरो निर्गत्य तद्हात् । विहितेच्छो 'विविक्तेष तं विधिवत्तपः ।। ३२३॥ विषयगुमसङ्कीर्ण करणाटविकोत्कटम् । परीषहमहाघोरविश्वश्वापदसङ्गुलम् ॥ ३२४ ॥ कषायमत्तमातङ्गसातशतसन्ततम् । विवृतास्यान्तकानन्तकुम्भीनसविभीषणम् ॥ ३२५॥ चतुर्विधोपसर्गोग्रकण्ठीरवकठोरितम् । विप्नौघतस्करारुद्धं त्यक्त्वा भववनं शनैः ॥३२६ ॥ तपावनं सतां सेव्यमव्याहतसुखावहम् । महाजनसमाकीर्ण विस्तीर्णमनुपप्लुतम् ॥ ३२७ ॥ महानतमहासामन्तान्वितः सुनयानुगः । दर्शनज्ञानचारित्रव्यक्तशक्तित्रयोजितः ॥ ३२८ ॥ शीलायुधो गुणबातकवचः शुद्धमार्गगः । सद्भावनासहायः सन् प्रविश्य परमः पुमान् ॥ ३२९ ।। पावसंस्तन निश्शत नानायोगान्प्रवर्तयन् । धर्म्यध्यानं विविक्तस्थो ध्यायन् दशविधं मुहुः ॥ ३३० ॥ उज्जयिन्यामथान्येास्तं श्मशानेऽतिमुक्तके । वर्धमानं महासत्त्वं प्रतिमायोगधारिणम् ॥ ३३१ ॥ निरीक्ष्य स्थाणुरेतस्य दौष्ठ्याद्धयं परीक्षितुम् । उत्कृत्य कृत्तिकास्तीक्ष्णाः प्रविष्टजठराण्यलम् ॥ ३३२ ॥ ध्यात्ताननाभिभीष्माणि नृत्यन्ति विविधैर्लयैः। तर्जयन्ति स्फुरद्ध्वानैः साहासैर्दुरीक्षणैः ॥ ३३३ ।। स्थूलवेतालरूपाणि निशि कृत्वा समन्ततः । पराण्यपि फणीन्द्रभसिंहवह्वयानिलैः समम् ॥ ३३४ ॥ किरातसैन्यरूपाणि पापैकार्जनपण्डितः । विद्याप्रभावसम्भावितोपसगैंर्भयावहैः ॥ ३३५॥ स्वयं स्खलयितुं चेतः समाधेरसमर्थकः। स महतिमहावीराख्यां कृत्वा विविधाः स्तुतीः ॥ ३३६ ॥ यह तो तुम्हारे दानका आनुषङ्गिक फल है परन्तु इसका होनहार फल बहुत बड़ा है यही कहनेके लिए मानो उसके घर पञ्चाश्चर्योंकी वर्षा हुई ॥ ३१८-३२२ ॥ तदनन्तर शिष्योंका पुण्य बढ़ाने बाले वे भगवान् एकान्त स्थानों में विधिपूर्वक तप करनेकी इच्छासे उसके घरसे निकले ।।३२३॥ जो विषयरूपी वृक्षोंसे सङ्कीर्ण है, इन्द्रिय रूपी व्याधोंसे भरा हुआ है, परीषह रूपी महाभयंकर सब प्रकारके दुष्ट जीवोंसे सहित है, कषाय रूपी मदोन्मत्त हाथियोंके सैकड़ों समूहसे व्याप्त है, मुँह फाड़े हुए यमराज रूपी अनन्त अजगरोंसे भयंकर है, चार प्रकारके उपसर्ग रूपी दुष्ट सिंहोंसे कठोर है, और विनोंके समूह रूपी चोरोंसे घिरा हुआ है ऐसे संसार रूपी वनको धीरे-धीरे छोड़कर उन परम पुरुष भगवान्ने, जो सज्जनोंके द्वारा सेवन करने योग्य है, जिसमें अव्याबाध-बाधारहित सुख भरा हुआ है, जो उत्तम मनुष्योंसे व्याप्त है, विस्तीर्ण है और सब तरहके उपद्रवोंसे रहित है ऐसे तपोवनमें, महाव्रत रूपी महा सामन्तों सहित, उत्तम नयोंकी अनुकूलता धारणकर, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र रूपी प्रकट हुई तीन शक्तियोंसे अत्यन्त बलवान् , शील रूपी आयुध लेकर, गुणोंके समूहका कवच पहिनकर, शुद्धता रूपी मार्गसे चलकर और उत्तम भावनाओं की सहायता लेकर प्रवेश किया ।। ३२४-३२६ ॥ वहाँपर निःशङ्क रीतिसे रहकर उन्होंने अनेक योगोंकी प्रवृत्ति की और एकान्त स्थानमें स्थित होकर बार-बार दश प्रकारके धर्म्यध्यानका चिन्तवन किया ।। ३३०॥ अथानन्तर-किसी एक दिन अतिशय धीर वीर वर्धमान भगवान् उज्जयिनीके अतिमुक्तक नामक श्मशानमें प्रतिमा योगसे विराजमान थे। उन्हें देखकर महादेव नामक रुद्रने अपनी दुष्टतासे उनके धैर्यकी परीक्षा करनी चाही। उसने रात्रिके समय ऐसे अनेक बड़े-बड़े वेतालोंका रूप बनाकर उपसर्ग किया कि जो तीक्ष्ण चमड़ा छीलकर एक दूसरेके उदरमें प्रवेश करना चाहते थे, खोले हुए मुंहासे अत्यन्त भयंकर दिखते थे, अनेक लयोंसे नाच रहे थे तथा कठोर शब्दों, अट्टहास विकराल दृष्टि से हरा रहे थे। इनके सिवाय उसने सर्प, हाथी, सिंह, अग्नि और वायुके साथ भीलों की सेना बनाकर उपसर्ग किया। इस प्रकार एक पापका ही अर्जन करनेमें निपुण उस रुद्रने, अपनी विद्याके प्रभाव से किये हुए अनेक भयंकर उपसर्गोसे उन्हें समाधिसे विचलित करनेका प्रयत्न १ विभक्तेषु कचित् । २ विविधं तपः कचित् । ३ करणाटविधोत्कटम् ल०।४ व्यक्ति ल०। ५ भाव यंस्तत्र क, ख, ग, घ, म०।६व्यात्ताननानि भीष्माणि कचित । ७ पापोपार्जनपण्डितः क्वचित । ५६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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