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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम राज्यमस्यैव मे स्नेहाद् भात्राऽदायीस्यतर्कयन् । वनार्थमतिसन्धिसुरभूतं घिग्दुराशयम् ॥१..॥ ततः स्वानुमते तस्मिन् स्वबलेन सम रिपून् । निर्जेतुं विहितोद्योगं गते विक्रमशालिनि ॥१०॥ वन विशाखनन्दाय स्नेहादन्यायकांक्षिणे । विशाखभूतिरुल्लङ्घ्य क्रमं गतमतिर्ददौ ॥१.२॥ विश्वनन्दी तदाकर्ण्य सद्यः क्रोधाग्मिदीपितः । पश्य मामतिसन्धाय प्रत्यन्तनृपतीन्प्रति ॥ १.३॥ प्रहित्य मद्नं दतं पितृव्येनात्मसूनवे । देहीति वचनान्नाह किं ददामि कियद्वनम् ॥ १०४ ॥ विदधात्यस्य दुश्चेष्टा मम सौजन्यमानम् । इति मत्वा निवृत्त्यासौ हन्तुं स्ववनहारिणम् ॥ १०५॥ प्रारब्धवान् भयाद्गत्वा स कपित्थमहीरुहम् । कृत्वावृतिं स्थितः स्फीतं कुमारोऽपि महीरुहम् ॥१०६ ॥ समुन्मूल्य निहन्तुं तं तेनाधावत्ततोऽप्यसौ । अपसृत्य शिलास्तम्भस्यान्तर्धानं ययौ पुनः ॥१०७ ॥ बली तलप्रहारेण स्तम्भश्चाहत्य स तम् । पलायमानमालोक्य तस्मादप्यपकारिणम् ॥ १०८॥ मा भैषीरिति सौहार्दकारुण्याभ्यां प्रचोदितः। समाहूय वन तस्मै दत्वा संसारदुःस्थितिम् ॥ १०९ ॥ भावयित्वा ययौ दीक्षां सम्भूतगुरुसन्निधौ । भपकारोऽपि नीचानामुपकारः सतां भवेत् ॥१०॥ नदा विशाखभूतिश्च सजातानुशयो मया । कृतं पापमिति प्रायश्चित्तं वा प्राप संयमम् ॥ ११ ॥ कुर्वन् घोरं तपो विश्वनन्दी देशान्परिश्रमन् । कृशीभतः क्रमाप्राप्य मथुरा स्वतनुस्थितेः ॥१२॥ प्रविष्टवान् विनष्टात्मबलश्चलपदस्थितिः। तदा व्यसनसंसर्गाद् अष्टराज्यो महीपतेः ॥१३॥ कस्यचिहूतभावेन २मथुरां पुरमागतः। विशाखनन्दो वेश्यायाः प्रासादतलमाश्रितः ॥ १४ ॥ बनाये लाता हूँ॥६६-६६ ।। आचार्य कहते हैं कि देखो राजाने यह विचार नहीं किया कि राज्य तो इसीका है, भाईने स्नेह वश ही मुझे दिया है। केवल वनके लिए ही वह उस श्रेष्ठ पुत्रको ठगनेके लिए उद्यत हो गया सो ऐसे दुष्ट अभिप्रायको धिक्कार है॥१०॥ तदनन्तर पराक्रमसे सुशोभित विश्वनन्दी जब काकाकी अनुमति ले, शत्रुओंको जीतनेके लिए अपनी सेनाके साथ उद्यम करता हुआ चला गया तब बुद्धिहीन विशाखभूतिने क्रमका उल्लंघनकर वह वन अन्यायकी इच्छा रखनेवाले विशाखनन्दके लिए दे दिया ॥१०१-१०२।। विश्वनन्दीको इस घटनाका तत्काल ही पता चल गया। वह क्रोधाग्निसे प्रज्वलित हो कहने लगा कि देखो काकाने मुझे तो धोखा देकर शत्रु राजाओंके प्रति भेज दिया और मेरा वन अपने पुत्रके लिए दे दिया । क्या 'देओ' इतना कहनेसे ही मैं नहीं दे देता ? वन है कितनी-सी चीज ? इसकी दुचेष्टा मेरी सज्जनताका भङ्ग कर रही है। ऐसा विचारकर वह लौट पड़ा और अपना धन हरण करनेवालेको मारनेके लिए उद्यत हो गया। इसके भयसे विशाखनन्द बाड़ी लगाकर किसी चे कैथाके वृक्षपर चढ़ गया। कुमार विश्वनन्दीने वह कैंथाका वृक्ष जड़से उखाड़ डाला और उसीसे मारनेके लिए वह उद्यत हुा । यह देख विशाखनन्द वहांसे भागा और एक पत्थरके खम्भाके पीछे छिप गया परन्तु बलवान् विश्वनन्दीने अपनी हथेलियोंके प्रहारसे उस पत्थरके खम्भाको शीघ्र ही तोड़ डाला। विशाखनन्द वहांसे भी भागा। यद्यपि वह कुमारका अपकार करनेवाला था परन्तु से इस तरह भागता हुआ देखकर कुमारको सौहार्द और करुणा दोनोंने प्रेरणा दी जिससे प्रेरित होकर कुमारने उससे कहा कि डरो मत । यही नहीं, उसे बुलाकर वह वन भी दे दिया तथा स्वयं संसारकी दुःखमय स्थितिका विचारकर सम्भूत नामक गुरुके समीप दीक्षा धारण कर ली सो ठीक ही है क्योंकि नीचजनों के द्वारा किया हुआ अपकार भी सज्जनोंका उपकार करनेवाला ही होता है ।। १०३-११० ।। उस समय विशाखभूतिको भी बड़ा पश्चात्ताप हुआ। 'यह मैंने बड़ा पाप किया है। ऐसा विचारकर उसने प्रायश्चित्त स्वरूप संयम धारण कर लिया ।। १११ ॥ इधर विश्वनन्दी सब देशोंमें विहार करता हुआ घोर तपश्चरण करने लगा। उसका शरीर अत्यन्त कृश होगया। अनुक्रमसे वह मथुरा नगरीमें पहुंचा और आहार लेनेके लिए भीतर प्रविष्ट हा। उस समय उसकी निजकी शक्ति नष्ट हो चुकी थी और पैर डगमग पड़ रहे थे। ब्यसनोंके १ व्यसनसंसंगो ल० । व्यसनसञ्जात इत्यपि कचित् । २ तदेव पुर इत्यपि कचित् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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