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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् धातकीखण्डप्राङ्मन्दरापरस्थविदेहगम् । नाम्नाशोकपुरं तत्र वास्तव्यो वणिजां वरः ॥ ४३२ ॥ आनन्दस्तस्य भार्यायां जातानन्दयशःश्रुतिः । दत्वा जात्वमितायक्तिसागराय तनुस्थितिम् ॥ ४३३ ॥ आश्चर्य पञ्चकं प्राप्य तत्पुण्याज्जीवितावधौ । उदक्कुरुषु सम्भूय भुक्त्वा तत्र सुखं ततः ॥४३४॥ भूत्वा भवनवासीन्द्रभायेंहास्मीति सम्मदात् । ततः कदाचित्सिद्धार्थवने सागरसञ्ज्ञकम् ॥ ४३५॥ गुरुमाश्रित्य सम्भावितोपवासा भवावधौ । देवी जाताऽऽदिमे कल्पे तत्र निर्वर्तितस्थितिः ॥ ४३६ ॥ द्वीपेऽस्मिन्नेव कौशाम्ब्यां सुमतिश्रेष्ठिनोऽभवत् । सुभद्रायां सुता धार्मिकीति संशब्दिता जनैः ॥४३७॥ पुनर्जिनमतिक्षान्तिदशां जिनगुणादिकाम् । सम्पत्तिं साधु निर्माप्य महाशुक्रेऽभवत्सुरी ॥४३८ ॥ चिरात्ततो विनिर्गत्य वीतशोकपुरेशिनः । महीशो मेरुचन्द्रस्य चन्द्रवत्यामजायत ॥४३९॥ गौरीति रूपलावण्यकान्त्यादीनामसौ खनिः । विजयाख्यपुराधीशो विभुर्विजयनन्दनः ॥ ४४०॥ वत्सलस्तुभ्यमानीय तामदरा त्वयापि सा । पट्टे १ नियोजितेत्याख्यचतो हरिरगान्मुदम् ॥ ४४१ ॥ ततः पद्मावतीजन्मसम्बन्धं गणनायकः । गुणानामाकरोऽवादीदित्थं जनमनोहरम् ॥ ४४२ ॥ भस्मिन्नेवोज्जयिन्याख्यनगरीनायको नृपः । विनयस्तस्य विक्रान्तिरिव देव्यपराजिता ॥ ४४३ ॥ विनयश्रीः सुता तस्या हस्तशीर्षपुरेशिनः । हरिषेणस्य देव्यासीद्दत्वा दानमसौ मुदा ॥४४४॥ समाधिगुप्तयोगीशे भूत्वा हैमवते चिरम् । भुक्त्वा भोगान्भवप्रान्ते जाता चन्द्रस्य रोहिणी ॥ ४४५ ॥ *पल्योपमायुष्कालान्ते विषये मगधाभिधे । वसतः शाल्मलिग्रामे पद्मदेवी सुताऽजनि ॥ ४४६ ॥ सती विजयदेवस्य देविलायां कदाचन । वरधर्मयतेः सन्निधाने सा व्रतमग्रहीत् ॥ ४४७॥ ४०४ धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व मेरुसे पश्चिम की ओर जो विदेह क्षेत्र हैं उसमें एक अशोकपुर नामका नगर है । उसमें आनन्द नामका एक उत्तम वैश्य रहता था उसकी स्त्रीके एक आनन्दयशा नामकी पुत्री उत्पन्न हुई। किसी समय आनन्दयशाने अमितसागर मुनिजके लिए आहार दान देकर पञ्चाश्वर्यं प्राप्त किये। इस दानजन्य पुण्यके प्रभावसे वह आयु पूर्ण होनेपर उत्तरकुरुमें उत्पन्न हुई, वहां सुख भोगनेके बाद भवनवासियोंके इन्द्रकी इन्द्राणी हुई और वहाँ से च्युत होकर यहाँ उत्पन्न हुई हूँ । इस प्रकार रानी यशस्वतीने अपने पति राजा हेमाभके लिए बड़े हर्ष से अपने पूर्वभव सुनाये । तदनन्तर, रानी यशस्वती किसी समय सिद्धार्थ नामक वनमें गई, वहाँ सागरसेन नामक मुनिराज के पास उसने उपवास ग्रहण किये। आयुके अन्त में मरकर प्रथम स्वर्ग में देवी हुई । तदनन्तर वहां की स्थिति पूरी होनेपर इसी जम्बूद्वीपकी कौशाम्बी नगरीमें सुमति नामक सेठकी सुभद्रा नामकी स्त्रीसे धार्मिकी नामकी पुत्री हुई ।। ४३२-४३७ ।। यहाँपर उसने जिनमति आर्थिक के दिये हुए जिनगुणसम्पत्ति नामके व्रतका अच्छी तरह पालन किया जिसके प्रभावसे मरकर महाशुक स्वर्ग में देवी हुई। बहुत समय बाद वहांसे चयकर वीतशोकनगरके स्वामी राजा मेरुचन्द्रकी चन्द्रवती रानीके रूप, लावण्य और कान्ति आदिकी खान यह गौरी नामकी पुत्री हुई है । स्नेहसे भरे, विजयपुर नगरके स्वामी राजा विजयनन्दनने यह लाकर तुझे दी है और तू ने भी इसे पट्टरानी बनाया है । इस प्रकार गणधर भगवान्‌ने गौरीके भवान्तर कहे जिन्हें सुनकर श्रीकृष्ण हर्षको प्राप्त हुए ।। ४३८-४४१ ॥ तदनन्तर- गुणोंकी खान, गणधर देव, लोगोंका मन हरण करने वाले पद्मावती के पूर्व भवों का सम्बन्ध इस प्रकार कहने लगे ।। ४४२ ।। इसी भरतक्षेत्रकी उज्जयिनी नगरी में राजा विजय राज्य करता था उसकी विक्रान्तिके समान अपराजिता नामकी रानी थी। उन दोनोंके विनयश्री नामकी पुत्री थी । वह हस्तशीर्षपुरके राजा हरिषेणको दी गई थी। विनयश्रीने एक बार समाधिगुप्त मुनिराजके लिए बड़े हर्षसे आहार दान दिया था जिसके पुण्यसे वह हैमवत क्षेत्र में उत्पन्न हुई । चिरकाल तक वहाँके भोग भोगकर आयुके अन्त में वह चन्द्रमाकी रोहिणी नामकी देवी हुई। जब एक पल्य प्रमाण वहांकी आयु समाप्त हुई तब मगध देशके शाल्मलि 1 १ पट्टेन योजिते ल० । २ पल्योपमायुषः सान्ते ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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