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________________ एकोनपञ्चाशत्तम पर्व श्रियं क्रियात्स मे निघ्नन् सम्भवो दम्भजम्भणम् । सम्मुखीनायते' यस्य सद्बोधः २सम्मुखेऽखिले ॥१॥ द्वीपेऽस्मिन्नादिमे पूर्व विदेहे नधुदक्तटे । कच्छाख्ये विषये क्षेमपुरे विमलवाहनः ॥२॥ नाना नरपतिस्तस्य सद्यः केनापि हेतुना । सति उत्रिभेदे निर्वेदे स समासननिर्वृतिः ॥३॥ जन्तुरन्तकदन्तस्थो हन्त जीवितमीहते। मोहात्तनिर्गमोपायं न चिन्तयति धिक तमः॥४॥ आयुः परमसङ्ख्याताः क्षणास्ते शरणीकृताः। प्राणिभिनिये चेमानर्पयन्त्यन्तकप्रभोः॥५॥ अभिलापातपातप्ताश्छायां भोग्यस्य संश्रिताः । जीर्णकूलस्य वासोऽमून हि क्षेमेण ४पालयेत् ॥ ६॥ इत्यादि चिन्तयन् राज्यं दत्त्वा विमलकीर्तये। स्वयम्प्रभजिनस्यान्तेवासित्वं प्रतिपन्नवान् ॥७॥ एकादशाङ्गधारी सन् त्रैलोक्यक्षोभकारणम् । भावनाभिनिवृत्यान्त्यनामतीर्थकराह्वयम् ॥ ८॥ संन्यासविधिना त्यक्तदेहो प्रैवेयकादिमे । "सुदर्शने विमानेऽभूदहमिन्द्रो महर्द्धिकः ॥९॥ त्रयोविंशतिवाायुः स षष्ठयङ्गलमानभाक । शरीरो लेश्यया शुक्लः श्वसन पक्षोनवत्सरे ॥१०॥ खत्रयाग्निद्विवर्षान्ते भोजनं मनसा स्मरन् । निःप्रवीचारभोगोऽन्त्यनरकान्तगतावधिः ॥११॥ स्वावधिक्षेत्रसञ्चारसमर्थस्तत्प्रमप्रभः । प्राग्देहोत्थतनुब्याप्तया स्वावधिक्षेत्रपूरकः ॥ १२ ॥ जिनका ज्ञान सामने रखे हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेके लिए दर्पणके समान है तथा जो सब प्रकारके पाखण्डोंके विस्तारको नष्ट करनेवाले हैं ऐसे सम्भवनाथ तीर्थंकर मेरा कल्याण करें ॥१॥ इसी पहले जम्बूद्वीपके पूर्व विदेहक्षेत्रमें सीता नदीके उत्तर तटपर एक कच्छ नामका देश है। उसके क्षेमपुर नगरमें राजा विमलवाहन राज्य करता था ॥ २ ॥ जिसे निकट भविष्यमें मोक्ष प्राप्त होनेवाला है ऐसा वह राजा किसी कारणसे शीघ्र ही विरक्त हो गया। वह विचार करने लगा कि इस संसारमें वैराग्यके तीन कारण उपस्थित हैं ॥ ३ ॥ प्रथम तो यह कि यह जीव यमराजके दाँतोंके बीचमें रहकर भी जीवित रहनेकी इच्छा करता है और मोहकर्मके उदयसे उससे निकलनेका उपाय नहीं सोचता इसलिए इस अज्ञानान्धकारको धिक्कार हो ॥४॥ वर कारण यह है कि इस जीवकी आयु असंख्यात समयकी ही है उन्हें ही यह शरण माने हुए है परन्तु आश्चर्य है कि ये आयुके क्षण ही इन जीवोंको नष्ट होनेके लिए यमराजके समीप पहुँचा देते हैं ॥५॥ तीसरा कारण यह है कि ये जीव अभिलाषारूपी धूपसे संतप्त होकर विषयभोगरूपी किसी नदीके जीर्णशीर्ण तटकी छायाका आश्रय ले रहे हैं सो उनका यह आश्रय कुशलतापूर्वक उनकी रक्षा का ॥६॥ इत्यादि विचार करते हुए विमलवाहन राजाने अपना राज्य विमलकीर्ति नामके पत्रके लिए देकर स्वयंप्रभ जिनेन्द्रकी शिष्यता स्वीकार कर ली अर्थात् उनके पास दीक्षा धारण कर ली ।।७ ॥ ग्यारह अङ्गोंका जानकार होकर उसने सोलह कारण भावनाओंके द्वारा तीनों लोको क्षोभ उत्पन्न करनेवाला तीर्थंकर नामक नामकर्मका बन्ध किया ॥ ८ ॥ अन्तमें संन्यासकी विधिसे शरीर छोड़कर प्रथम ग्रेवयकके सुदर्शन विमानम बड़ी-बड़ी ऋद्धियाका धारण करनवाला' हुआ ॥६॥ तेईस सागरकी उसकी आयु थी, साठ अङ्गुल ऊँचा उसका शरीर था, शुक्ल लेश्या थी, साढ़े ग्यारह माहमें एकबार श्वास लेता था, तेईस हजार वर्ष बाद मनसे आहारका स्मरण करता था, उसके भोग प्रवीचारसे रहित थे, सातवें नरकके अन्त तक उसका अवधिज्ञान था, अवधिज्ञानके क्षेत्रमें गमन करनेकी शत्ति थी, उतनी ही उसके शरीरकी प्रभा थी और उतनी ही दूर तक उसका १-जायते ख०, ग०। सम्मुखे पुरस्ताद् भवतीति सम्मुखीनो दर्पणस्तदवदाचरतीति सम्मुखीनायते । २ सन्मुखोऽखिले ख० । ३ त्रिभेद क०, ख०, ग०, घ०, म० । ४ यापयेत् ख०, ग०। ५ सुदर्शनविमाने क., ख०, ग०, ५०, म०।६ अर्धर्चादित्वात्पुंस्त्वम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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