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________________ सप्ततितम पर्व ३४१ तस्यामेवोसरश्रेण्यामरिन्दमपुरेश्वरात् । अरिक्षयाख्यादजितसेनायामभवत्सुता ॥ ३० ॥ सती प्रीतिमती मेरुगिरेः सकलखेचरान्। ।२त्रिन्त्यिा साऽजयचिन्तागतिं मुक्त्वा स्वविद्यया ॥३१॥ जित्वा चिन्तागतिवेगाचां पश्चादिति चाब्रवीत् । सम्भावय कनीयांसं मम त्वं रत्नमालया ॥३२॥ श्रुततद्वचना साह नाहं जितवतोऽपरैः । मालामिमां क्षिपामीति स तामित्यब्रवीत् पुनः ॥३३॥ गतियुद्धं त्वया पूर्वमनुजाभ्यां कृतं मम । अभिलाषाचतस्त्या त्वं मया तद्वचनश्रुतेः ॥३४॥ निविण्णा सानिवृत्चायिकाभ्यासेऽगारापः परम् । तद्वीक्ष्य बहवस्तत्र निर्विद्य तपसि स्थिताः ॥३५॥ अनुजाभ्यां समं चिन्तागतिश्चालोक्य साहसम् । कन्याया जातसंवेगो गुरुं दमवराभिधम् ॥३६॥ सम्प्राप्य संयमं प्राप्य शुद्धयष्टकमधिष्ठितः । प्रान्ते सामानिकस्तुर्य कल्पेऽजायत सानुजः ॥ ३७ ॥ तत्र भोगान्बहून् भुक्त्वा सप्तान्धिपरमायुषा । वतस्तावनुजौ जम्बूद्वीपपूर्वविदेहगे ॥३८ ॥ विषये पुष्कलाबत्यां विजयाङ्केत्तरे तटे । राजा गगनचन्द्राख्यः पुरे गगनवल्लभे ॥ ३९ ॥ सुतो गगनसुन्दर्या तस्यामितमतिस्ततः । आवाममिततेजाश्च जातौ विद्यावयान्वितौ ॥४०॥ अन्येषुः पुण्डरीकिण्यामावाभ्यां जन्मपूर्वजम् । आवयोः परिपृष्टेन जन्मत्रितयवृत्तकम् ॥ ४१ ॥ सर्व स्वयंप्रभाख्येन तीर्थनाथेन भाषितम् । ततोऽस्मदग्रजः क्कायेत्यावयोरनुयोजने ॥ ४२ ॥ भूमौ सिंहपुरे जातो राजते सोऽपराजित- नाना राज्यं समासाद्य स्वयमित्यर्हतोदितम् ॥ ४३ ॥ तत्समीपे समादाय संयम त्वां विलोकितुम् । त्वयि जन्मान्तरस्नेहादिहागमनमावयोः ॥ ४४ ॥ इस प्रकार तीन पुत्र हुए थे। धर्म, अर्थ और कामके समान इन तीनों पुत्रोंसे वे दोनों माता-पिता सदा प्रसन्न रहते थे सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम पुत्रोंसे कौन नहीं सन्तुष्ट होते हैं ? ।।२६-२६ ।। उसी विजया पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें अरिन्दमपुर नगरके राजा अरिञ्जय रहते थे उनकी अजितसेना नामकी रानी थी और दोनोंके प्रीतिमती नामकी सती पुत्री हुई थी। उसने अपनी विद्यासे चिन्तागतिको छोड़कर समस्त विद्याधरोंको मेरु पर्वतकी तीन प्रदक्षिणा देनेमें जीत लिया था ॥३०-३१।। तत्पश्चात् चिन्तागति उसे अपने वेगसे जीतकर कहने लगा कि तू रत्नोंकी मालासे मेरे छोटे भाईको स्वीकार कर । चिन्तागतिके वचन सुनकर प्रीतिमतीने कहा कि जिसने मुझे जीता है उसके सिवाय दूसरेके गलेमें मैं यह माला नहीं डालूंगी। इसके उत्तरमें चिन्तागतिने कहा कि चूंकि तूने पहले उन्हें प्राप्त करनेके इच्छासे ही मेरे छोटे भाइयों के साथ गतियुद्ध किया था अतः तू मेरे लिए त्याज्य है । चिन्तागतिके यह वचन सुनते ही वह संसारसे विरक्त हो गई और और उसने विवृत्ता नामकी आर्यिकाके पास जाकर उत्कृष्ट तप धारण कर लिया। यह देख वहाँ बहुतसे लोगोंने विरक्त होकर दीक्षा धारण कर ली ॥३२-३५॥ कन्याका यह साहस देख जिसे वैराग्य उत्पन्न हो गया है ऐसे चिन्तागतिने भी अपने दोनों छोटे भाइयोंके साथ दमवर नामक गुरुके पास जाकर संयम धारण कर लिया और पाठों शुद्धियोंको पाकर तीनों भाई चौथे स्वर्गमें सामाजिक जातिके देव हुए ॥३६३७ ।। वहाँ सात सागरकी उत्कृष्ट आयु पर्यन्त अनेक भोगोंका अनुभव कर च्युत हुए और दोनों छोटे भाइयोंके जीव जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्र सम्बन्धी पुष्कला देशमें जो विजयाधे पर्वत है उसकी उत्तर श्रेणीमें गगनवल्लभ नगरके राजा गगनचन्द्र और उनकी रानी गगनसुन्दरीके हम दोनों अमितमति तथा अमिततेज नामके पुत्र उत्पन्न हुए हैं। हम दोनों ही तीनों प्रकारकी विद्याओंसे युक्त थे॥ ३८-४०॥ किसी दूसरे दिन हम दोनों पुण्डरीकिणी नगरी गये । वहाँ श्री स्वयंप्रभ तीर्थकरसे हम दोनोंने अपने पिछले तीन जन्मोंका वृत्तान्त पूछा। तब स्वयंप्रभ भगवान्ने सब वृत्तान्त ज्योंका त्यों कहा। तदनन्तर हम दोनोंने पूछा कि हमारा बड़ा भाई इस समय कहाँ उत्पन्न है ? इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि वह सिंहपुर नगरमें उत्पन्न हुआ है, अपराजित उसका नाम है, और स्वयं राज्य करता हुआ शोभायमान है ।। ४१-४३ ॥ यह सुनकर हम दोनोंने उन्हीं स्वयं १ सकलखेचरात् ल० । २ त्रिस्यात्या (!) ल० । ३ सविद्यया ग०, घ०। ४ निवृत्तार्जिका ल.। ५ पूर्वकम् ग०, घ० । पूर्षजम् ख० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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