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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् परप्रेरितवृत्तीनां तीक्ष्णानामीदृशी गतिः । 'खगाः खगैः खगान् जनुर्बद्धवैराः खगा इव ॥ ५९३ ॥ तृणाव मन्यमानाः स्वान् प्राणान् पापाः परस्परम् । २ लक्ष्यबद्धात्मदृष्टान्विताशुपातिशितैः शरैः ॥५९४॥ धन्विनः पातयन्ति स्म गिरीन्वा करिणो बहून् । एकेनैकः शरेणेभमवधीन्मर्मभेदिना ॥ ५९५ ॥ स्वीकुर्वन्त्यत एवान्यममंशान् विजिगीषवः । प्रघातमूर्च्छितः कश्चित्प्रवहलोहितो भटः ॥ ५९६ ॥ आपतद् गृद्धपक्षानिलोत्थितोऽहम्बहून् पुनः । नीयमानमिवात्मानं वीक्ष्यान्यो देवकन्यया ॥ ५९७ ॥ सोत्सवः सहसोदस्थात्सहासो दरमूर्च्छितः । वाणाङ्किते रणत्तूर्यरणरङ्गे निरन्तरम् ॥ ५९८ ॥ नृत्यत्कबन्धके सद्यः शरच्छादितमण्डपे । बद्धान्त्रजालमालोऽम्यो "बहलालासवार्चितः ॥ ५९९ ॥ राक्षसेन विवाहेन वीरलक्ष्मीं समाक्षिपत् । डाकिन्यश्चटुलं नेटुरारुवन् भैरवं शिवाः ॥ ६०० ॥ ऊर्ध्ववक्त्रवमवह्निविस्फुल्लिङ्गविभीषणाः" । उत्क्षिप्त कर्तिकाजालश्चललोलकपालभृत् ॥ ६०१ ॥ अतिपातनिपीतास्त्रमवमीद्राक्षसीगणः । निशातशरनाराचचक्रायुपनिपातनात् ॥ ६०२ ॥ निःप्रभं निःप्रतापं च तदाभूदर्कमण्डलम् । स्याद्वादिभिः समाक्रान्तकुमादिकुलवत्सदा ॥। ६०३ ॥ दशाननबलान्यापन् भङ्गं राघवसैनिकैः । इति प्रवृत्ते संग्रामे सुचिरं सव्रणाङ्गणे ॥ ६०४ ॥ मृताः केचित्पुनः केचित् प्रहताः प्राणमोक्षणे । अक्षमाः पापकर्माणः स्थिताः कण्ठगतासवः ॥ १०५ ॥ समवर्तीनरान् सर्वान् प्रस्तान् जरयितुं तदा । निःशक्तिर्वान्तवानेतानिति शङ्काविधायिनः ॥ ६०६ ॥ ३२० जिनकी वृत्ति दूसरोंके द्वारा प्रेरित रहती है ऐसे तीक्ष्ण ( पैने - कुटिल ) पदार्थोंकी ऐसी ही अवस्था होती है । जिनका परस्पर वैर बँधा हुआ है ऐसे अनेक विद्याधर पक्षियोंके समान अपने प्राणोंको तृणके समान मानते हुए बाणोंके द्वारा परस्पर विद्याधरोंका घात कर रहे थे ।। ५६२-५६४ ॥ धनुष धारण करनेवाले कितने ही योद्धा लक्ष्य पर लगाई हुई अपनी दृष्टिके साथ ही साथ शीघ्र पड़ने वाले तीक्ष्ण बाणोंके द्वारा पर्वतोंके समान बहुतसे हाथियों को मारकर गिरा रहे थे। किसी एक योद्धाने अपने मर्मभेदी एक ही बाणसे हाथीको मार गिराया था सो ठीक ही है क्योंकि इसीलिए तो विजयकी इच्छा करनेवाले शूर-वीर दूसरेका मर्म जाननेवालोंको स्वीकार करते हैं-अपने पक्षमें मिलाते हैं । कोई एक योद्धा चोटसे मूर्च्छित हो खून से लथपथ हो गया था तथा आये हुए गृद्ध पक्षियोंके पंखोंकी वायुसे उठकर पुनः अनेक योद्धाओंको मारने लगा था । कोई एक अल्प मूर्च्छित योद्धा. अपने आपको देवकन्या द्वारा ले जाया जाता हुआ देख उत्सवके साथ हँसता हुआ अकस्मात् उठ खड़ा हुआ। जो बाणोंसे भरा हुआ है, जिसमें रणके मारू बाजे गूँज रहे हैं, जिसमें निरन्तर शिर रहित धड़ नृत्य कर रहे हैं, और जिसमें बाणोंका मण्डप छाया हुआ है ऐसे युद्ध-स्थलमें जिसकी सब अंतड़ियों का समूह बँध रहा है और जो बहुतसे खूनके प्रवाहसे पूजित है ऐसे किसी एक योद्धाने राक्षस विवाह के द्वारा वीर-लक्ष्मीको अपनी ओर खींचा था । उस युद्धस्थल में डाकिनियाँ बड़ी चपलता नृत्य कर रही थीं और शृगाल भयङ्कर शब्द कर रहे थे। वे शृगाल ऊपरकी ओर किये हुए मुखोंसे निकलनेवाले अग्नि तिलगोंसे बहुत ही भयङ्कर जान पड़ने थे। जिसकी कैंचियों का समूह ऊपर की ओर उठ रहा है और जो चश्चल कपालोंको धारण कर रहा है ऐसा राक्षसियोंका समूह बहुत अधिक पिये हुए खूनको उगल रहा था । अत्यन्त तीक्ष्ण बाण नाराच और चक्र आदि शस्त्रोंके पढ़नेसे उस समय सूर्यका मण्डल भी प्रभाहीन तथा कान्ति रहित हो गया था। जिस प्रकार स्याद्वादियोंके द्वारा आक्रान्त हुआ मिथ्यावादियोंका समूह पराजयको प्राप्त होता है उसी प्रकार उस समय रामचन्द्रजीके सैनिकों के द्वारा आक्रान्त हुई रावणकी सेनाएँ पराजयको प्राप्त हो रही थीं। इस प्रकार उस रणाङ्गणमें संग्राम प्रवृत्त हुए बहुत समय हो गया ।। ५६५ - ६०४ ।। उस युद्ध में कितने ही लोग मर गये, कितने ही घायल हो गये, और कितने ही पापी, प्राण छोड़नेमें असमर्थ हो कण्ठगत प्राण हो गये || ६०५ ।। उस समय वे मरणासन्न पुरुष ऐसा सन्देह उत्पन्न कर रहे थे कि यमराज ग० । १ नाना स्वयाः खगैः ल० । २ लक्ष्यानडा ख०, ख०, ब०, ग०, म० । ३ निरन्तरे ख०, ४ प्रचुररुधिरचरणचर्चितः । ५ विभीषणः ज्ञ० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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