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________________ ३१६ महापुराणे उत्तरपुराणम कालमेघमहागन्धगजस्कन्धमधिष्ठितः । प्रतिवातहतप्रोचद्राक्षसध्वजराजितः ॥ ५४०॥ अग्रेसरस्फुरचक्रश्छन्नस्थगितभास्करः । नानानूनानकध्वानभिनाशानेकपतिः॥ ५४१ ॥ खेचराधीश्वरो योद्धं सन्नद्धोऽस्थान्मदोद्धतः । इतो रामस्तदायानकथाकर्णनघूर्णितः ॥ ५४२॥ दुनिवारो रिपुं कोपपावकेनेव निर्दहन् । चक्षुःप्रान्तविनिर्गच्छत्ज्वलद्वीक्षाशिखावलीः ॥ ५४३ ॥ उस्मुकालीरिवायोडं विक्षिपन् विक्षुमक्षु सः । महाविद्यासमूहासपञ्जामाबलान्वितः ॥ ५४४ ॥ तालध्वजः समारुह्य गजमानपर्वतम् । लक्ष्मणो 'वलयालम्बिविषद रुडध्वजः ॥ ५४५॥ उदयादिमिवारुह्य गजं विजयपर्वतम् । जिनेशिनं प्रणम्येतौ विश्वविप्नविनाशनम् ॥ ५४६॥ सुग्रीवानिलपुत्रादिखगेशैः परिवेष्टितौ । सूर्याचन्द्रमसौ वैरितमोहन्तं समुचतौ। ५४७ ॥ भासमानौ नयी वोभी सदुर्मतिघातिनी। रावणाभिमुखं योद्धं विभज्य ध्वजिनी निजाम् ॥ ५४८॥ युद्धभूमिमधिष्ठाय तस्थतुशासितद्विषो । तत्र तूर्यमहाध्वानाः प्रतिसेनानकध्वनिम् ॥ ५४९ १ निर्भर्त्सयन्तो वोद्दण्डनिष्ठरप्रहतेयान् । गुहागहरदेशादीन् विशन्तो वा समन्ततः ॥ ५५० ॥ गजबंहितवाहोरुहेषाघोषाविशेषतः । वईयन्तो भटानां च सुतरां शौर्यसम्पदम् ॥ ५५१ ॥ द्विषो भयं प्रकुर्वन्तो नभोभागमरोषयन् । तदाविष्कृतसंरम्भाः कलनाणीव दुर्जयाः । ५५२ ।। हस्ताग्रमितमध्यानि नवाम्भोदकलामि वा । सशराणि मनांसीव गुणनम्राणि धीमताम् ॥ ५५ ॥ बह रावण स्वयं कह रहा था॥ ५३४-५३६ ।। उस समय वह कालमेघ नामक महा मदान्मत्त हाथीके ऊपर सवार था, प्रतिकूल ( सामनेकी ओरसे आनेवाली) वायुसे ताड़ित होकर फहराती हुई राक्षसध्वजाओंसे सुशोभित था, उसके आगे-आगे चक्ररत्न देदीप्यमान हो रहा था, उसके छत्रसे सूर्य आच्छादित हो गया था-सूर्यका आताप रुक गया था और उसने अपने अनेक प्रकारके बड़े-बड़े नगाड़ोंके शब्दसे दिग्गजोंके कान बहिरे कर दिये थे। इस प्रकार उस ओर मदसे उद्धत हुआ रावण युद्धके लिए तैयार होकर खड़ा हो गया और इस ओर रामचन्द्र उसके आनेकी बात सुनकर क्रोधसे झूमने लगे ।। ५४०-५४२ ॥ वह उस समय अत्यन्त दुर्निवार थे और क्रोध रूपी अग्निके द्वारा मानी शत्रुको जला रहे थे। उनके नेत्रोंके समीपसे जो जलती हुई दृष्टि निकल रही थी वह वाणोंके समान जान पड़ती थी और उसे वे जलते हुए अंगारोंके समान युद्ध करनेके लिए दिशाओं में बड़ी शीघ्रतासे फेंक रहे थे । महाविद्याओंके समूहसे जो उन्हें सेनाका पाँचवाँ अङ्ग प्राप्त हुआ था वे उससे सुहित थे । उनकी तालकी ध्वजा थी और वे अञ्जनपर्वत नामक हाथी पर सवार होकर निकले थे । साथ ही, जिसकी ध्वजामें वलयाकार साँपको पकड़े हुए गरुड़का चिह्न बना है ऐसा लक्ष्मण भी विजयपर्वत नामक हाथी पर सवार होकर निकला। इन दोनोंने पहले तो समस्त विघ्न नष्ट करनेवाले श्री जिनेन्द्रदेवको नमस्कार किया और फिर दोनों ही सुग्रीव तथा अणुमान् आदि विद्याधरोंसे वटित हो सूर्य-चन्द्रमाके समान शत्रु रूपी अन्धकारको नष्ट करनेके लिए चल पड़े।५४३-५४७॥ वे दोनों भाई नयोंके समान सुशोभित थे और दृप्त तथा दुर्बुद्धियोंका घात करनेवाले थे। रावणके सामने युद्ध करनेके लिए उन्होंने अपनी सेनाका विभाग कर रक्खा था, इस प्रकार शत्रुओंको भयभीत करते हुए वे युद्ध-भूमिमें जाकर ठहर गये। वहाँ इनके नगाड़ाके बड़े भारी शब्द शत्रुओंके नगाड़ोंके शब्दोंको तिरस्कृत कर रहे थे सो ऐसा.जान पड़ता था कि मानो वे शब्द ऊँचे उठते हुए र प्रहारसे भयभीत हो गुहा अथवा गढ़े आदि देशमि सब बारसे प्रवेश कर रहे होंछिप रहे हों ।। ५४८-५५०॥ हाथियोंकी चिंघाड़ें और घोड़ोंके हींसनेके शब्द विशेष रूपसे योद्धाओं की शूर-वीरता रूप सम्पत्तिको अच्छी तरह बढ़ा रहे थे ।। ५५१ ।। उस समय जो आरम्भ प्रकट हो रहे थे वे शत्रुओंको भयभीत करते हुए आकाश-मार्गको रोक रहे थे और त्रियोंके समान दुर्जय थे ।। ५५२ ।। धनुष धारण करनेवाले लोग अपने-अपने धनुष लेकर निकले थे। उन धनुषोंका मध्यम १ अग्रसर घ०। २ 'वलयाकारसर्पसहितगरुडपताकाः' (म पुस्तके टिप्पणी) 'लक्ष्मणोऽपि मुखालम्बिषिषधृगगरूरध्वजः'ल.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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