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________________ अष्टपष्ट पर्व २६९ मीलादिमिव गडोरुतरङ्गश्च महीरुहै। दोधूयमानमालोक्य रावणं रावितद्विषम् ॥ ३.१॥ अहो पापस्य कोऽप्येष विपाकोऽयमपीडशः । किल धिग्धर्ममुल्लक्ष्य परदाराभिलाषुकः ॥ ३०२ ।। ध्रुवं तन्नारदेनोक्तमकालमरणं ध्रुवम् । भावीति भावयन् सीतां तत्सभायामलक्षयन् ॥ ३०३ ॥ मन्दमन्दप्रभे भानौ दीने सति दिनात्यये । सहायसम्पदं प्रायो मन्वानः सम्पदावहाम् ॥ ३०४ ॥ उदयास्तमयौ नित्यं देहिनामिति रावणम् । रविर्ययौ निरूप्येव समन्तादिति चिन्तयन् ॥ ३०५॥ दूतो रामस्य गत्वाऽन्तःपुरपश्चिमगोपुरम् । आरुह्य लोकमानोऽयं भरारावराजितम् ॥ ३०६ ॥ वनं सर्वत्कं नाम नन्दनं नन्दनोपमम् । फलप्रसवभारावनम्रकम्रमहीरुहैः ॥ ३० ॥ मन्दगन्धवहाछूतनानाप्रसवपांशुभिः । कृतकाद्रिसरोवापीलतालालितमण्डपैः ॥ ३०८॥ मदनोद्दीपनैर्देशैरन्यैश्वातिमनोहरम् । दृष्ट्रा तत्र मनाक स्थित्वा सप्रमोदः सकौतुकः ॥ ३०९॥ तत्रैकस्मिन् समासनदेशे विद्याधरीजनैः । सामादिभिर्वशीकतु मिङ्गिताकारवेदिभिः ॥ ३१० ॥ परीतां शिशिपाक्षमाजमले शोकाकुलीकृताम् । ध्यायन्ती निभृतां मृत्वा शीर्वापि कुलरक्षणे ॥ सयन शीलमालां वा समालोक्य धरात्मजाम् । इयं सा रावणानीता सीता ज्ञाताभिवर्णितः ॥ ३१२ ॥ अभिज्ञानैर्नृपेन्द्रेण मम पुण्योदयादिति । तदर्शनसमुत्पनरागो रावणपापिना ॥ ३१३ ॥ कल्पवल्लीव दावेन तापितेयं सतीत्यलम् । शोकाभितप्तचित्तोऽपि नीतिमार्गविशारदः ॥ ३४ ॥ कमल पूजित हैं, जो सिंहासनके मध्यमें बैठा है, सिंहके समान पराक्रमी है, इन्द्रके समान है, दुरते हुए चमरोंसे जो ऐसा जान पड़ता है मानो गङ्गाकी विशाल तरङ्गोंसे सुशोभित नीलाचल ही हो और जिसने समस्त शत्रुओंको रुला दिया है ऐसे रावणको देखकर अणुमान्ने सोचा कि इस पापीके यह ऐसा ही विचित्र कर्मका उदय है निससे प्रेरित हो इसने धर्मका उल्लंघनकर परस्त्रीकी इच्छा की ।। ३००-३०२॥ नारदने जो कहा था कि इसका अकालमरण होनेवाला है सो ठीक ही कहा था। इस प्रकार विचार करते हए अणमान्ने रावणकी सभामें सीता नहीं देखी ॥३०३ ॥ धीरेधीरे सूर्यकी प्रभा मन्द पड़ गई, दिन अस्त हो गया और सूर्य रावणके लिए यह सूचना देता हुआ ही मानो अस्ताचलकी ओर चला गया कि संसारमें जितने सहायक हैं वे सब प्रायः सम्पत्तिशालियोंकी ही सहायता करते हैं और संसारमें जितने प्राणी हैं उन सबका उदय और अस्त नियमसे होता है ॥ ३०४-३०५ ॥ इस प्रकार सब ओरसे चिन्तवन करता हुआ वह रामचन्द्रका दूत अणुमान् अन्तःपुरके पश्चिम गोपुरपर चढ़कर नन्दन नामका वन देखने लगा। वह नन्दन वन भ्रमरों के शब्दसे सुशोभित था, उसमें समस्त ऋतुओंकी शोभा बिखर रही थी, साथ ही नन्दन-वनके समान जान पड़ता था, फल और फूलोंके बोझसे झुके हुए सुन्दर सुन्दर वृक्षों, मन्दमन्द वायुसे उड़ती हुई नाना प्रकारके फूलोंकी परागों, कृत्रिम पर्वतों, सरोवरों, बावलियों, तथा लताओंसे सुशोभित मण्डपों और कामको उद्दीपित करनेवाले अन्य अनेक स्थानोंसे अन्यन्त मनोहर था। उसे देख वह अणुमान् कुछ देर तक हर्ष और कौतुकके साथ वहां खड़ा रहा ।। ३०६-३०६॥ वहीं किसी समीपवर्ती स्थानमें उसने सीताको देखा । उस सीताको साम आदि उपायोंके द्वारा वश करनेके लिए अभिप्रायानुकूल चेष्टाओंको जानने वाली अनेक विद्याधरियाँ घेरे हुई थीं। वह शिंशपा वृक्षके नीचे शोकसे व्याकुल हुई बैठी थी, चुप चाप ध्यान कर रही थी, मरकर अथवा जीर्ण शीर्ण होकर भी कुलकी रक्षा करने में प्रयत्नशील थी, तथा ऐसी जान पड़ती थी मानो शीलकी-पातिव्रत्य धर्मकी माला ही हो । ऐसी सीताको देख अणुमान्ने विचार किया कि यह वही सीता है जिसे रावण हरकर लाया है । उसने राजा रामचन्द्रजीके द्वारा बतलाये हुए चिह्नोंसे उसे पहिचान लिया और साथ ही यह विचार किया कि मेरे पुण्योदयसे ही मुझे आज इस सतीके दर्शन हुए हैं । दर्शन करनेसे उसे बड़ा मनुराग उत्पम हुआ। उसने समझा कि जिस प्रकार दावानलके द्वारा कल्पलता संतापित होती है उसी प्रकार पापी रावणके द्वारा यह सती सन्तापित की गई है। इस प्रकार उसका चित्त यद्यपि शोकसे सन्तप्त हो १ बुधूयमान ब. (१)। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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