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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् तेषां तदितं तस्य लोकस्येवांशुमालिनः । स चक्षुषो यथार्थावलोकेऽगात्सहकारिताम् ॥ ३५॥ सुतायाजितसेनाय राज्याभिषेकपूर्वकम् । दत्त्वा विवेकिनां त्याज्यं राज्यं भोज्यमिवोज्झितम् ॥ ३६॥ लब्धनिष्कान्तिकल्याणमहाभिषवसम्मदः। सुप्रभाशिबिकारूढो व्यूढो नरखगामरैः। ३७ ॥ माधे मासि सिते पक्षे रोहिण्यां नवमीदिने । सहेतुके वने सप्तपर्णद्रुमसमीपगः ॥ ३८ ॥ अपराहे सहस्रेण राज्ञामाज्ञाविधायिनाम् । सार्च २वष्ठोपवासेन उसमास्थित स संयमम् ॥ ३९॥ ४चतुर्थज्ञानसम्पनो द्वितीयेऽह्नि प्रविष्टवान् । साकेतं दानिनां तोषमपूर्वमुपपादयन् ॥ ४०॥ तत्र "ब्रह्मा महीपालस्तस्मै दानं यथाक्रमात् । दत्त्वा सातादिभिः पुण्यैः सहापाश्चर्यपञ्चकम् ॥ ११ ॥ छाद्मस्थ्येन नयनब्दान्पौषे द्वादशशुद्धधीः । शुक्कैकादश्यहःप्रान्ते रोहिण्यामाप्ततामगात् ॥ ४२ ॥ सिंहसेनादयस्तस्य नवतिः स्युर्गणाधिपाः । खपञ्चसप्तवयुक्तप्रमाणाः पूर्वधारिणः ॥ १३ ॥ शिक्षकाः खद्वयर्वेकद्विप्रमागणनाः क्रमात् । शून्यद्वयचतुरन्ध्रमितास्त्रिज्ञानलोचनाः ॥ ४४॥ केवलागवमास्तत्र ते सहस्राणि विंशतिः । चतुःशतैः सहस्राणां विंशतिविकृतयः ॥४५॥ शून्यपञ्चचतुर्थकमनःपर्ययवीक्षणाः । शून्यद्वयचतुर्थेकैस्तस्यानुत्तरवादिनः ॥ ४६॥ सर्वे ते पिण्डिताः सन्तो लक्षमेकं तपोधनाः । प्रकुब्जाद्यार्यिकाः शून्यचतुष्कद्वयग्निसम्मिताः ॥ ४७ ॥ श्रावकास्त्रीणि लक्षाणि श्राविकाः पञ्चलक्षिकाः । देवा देव्यस्त्वसङख्याताः सख्यातोद्वादश गणः ॥४८॥ एवं द्वादशभिर्देवो गणैरेभिः परिष्कृतः । संसारमोक्षतद्धतुफलभेदान् प्रपञ्चयन् ॥ ४५ ॥ जिस प्रकार लोग देखते तो अपने नेत्रोंसे हैं परन्तु सूर्य उसमें सहायक हो जाता है उसी प्रकार भगवान् यद्यपि स्वयं बुद्ध थे तो भी लौकान्तिक देवोंका कहना उनके यथार्थ अवलोकनमें सहायक हो गया ॥ ३५॥ उन्होंने जूंठनके समान विवेकी मनुष्योंके द्वारा छोड़नेयोग्य राज्य, राज्याभिषेकपूर्वक अजितसेन नामक पुत्रके लिए दे दिया ॥३६॥ देवोंने उनका दीक्षाकल्याणकसम्बन्धी महाभिषेक किया। अनन्तर वे सुप्रभा नामकी पालकीपर आरूढ़ होकर सहेतुक वनकी ओर चले । उनकी पालकीको सर्वप्रथम मनुष्योंने, फिर विद्याधरोंने और फिर देवोंने उठाया श। माघमासके शुक्लपक्षकी नवमीके दिन रोहिणी नक्षत्रका उदय रहते हुए उन्होंने सहेतुक वनमें सप्तपर्ण वृक्षके समीप जाकर सायंकालके समय एक हजार आज्ञाकारी राजाओंके साथ वेलाका नियम लेकर संयम धारण कर लिया-दीक्षा ले ली ॥ ३७-३६।। दीक्षा लेते ही वे मनःपर्यय ज्ञानसे सम्पन्न हो गये और दूसरे दिन दानियोंको अपूर्व आनन्द उपजाते हुए साकेतनगरीमें प्रविष्ट हुए ॥ ४० ॥ वहाँ ब्रह्मा नामक राजाने उन्हें यथाक्रमसे दान दिया और सातावेदनीय आदि पुण्यप्रकृतियोंका बन्धकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। ४१ ॥ शुद्धज्ञानके धारक भगवान्ने बारहवर्ष छमस्थ अवस्थामें बिताये। तदनन्तर पौषशक्ल एकादशीके दिन शामके समय रोहिणी नक्षत्रमें आप्तपना प्राप्त किया अर्थात् लोकालोकावभासी केवलज्ञानको प्राप्तकर सर्वज्ञ हो गये ॥४२।। उनके सिंहसेन आदि नब्बे गणधर थे । तीन हजार सात सौ पचास पूर्वधारी, इक्कीस हजार छह सौ शिक्षक, नौ हजार चार सौ अवधिज्ञानी, बीस हजार केवलज्ञानी, बीस हजार चार सौ विक्रियाऋद्धिवाले, बारह हजार चार सौ पचास मनःपर्ययज्ञानी और बारह हजार चार सौ अनुत्तरवादी थे। इस प्रकार सब मिलाकर एक लाख तपस्वी थे, प्रकुब्जा आदि तीन लाख बीस हजार आर्यिकाएँ थीं, तीन लाख श्रावकथे, पाँच लाख श्राविकाएँथीं, और असंख्यात देव देवियाँ थीं। इस तरह उनकी बारह सभाओकी संख्या थी ।।४३-४८॥ इस प्रकार बारह सभाओसे वेष्टित भगवान् अजितनाथ संसार, मोक्ष, उनके कारण तथा फलके भेदोंका विस्तारसे कथन करते १ उच्छिष्ट-भोजनमिव । २ दिनद्वयोपवासेन । '३ अङ्गीचकार । ४ मनःपर्ययज्ञानसहितः । ५ ब्रह्ममहीपाल क०, ग, घ । ६ यथाक्रमम् क०, ख०, ग०। ७ सह सार्धम् , अाप लेमे, आश्चर्यपश्चकम् पञ्चाश्चर्यान् इतिच्छेदः । ८ प्रान्त ग०।६ पञ्चलक्षकाः क०, ख०, ग०, घ०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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