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________________ २७० महापुराणे उत्तरपुराणम् अहि किं कर्म पुण्यं मे पापं चेदं विचार्य तत् । इत्यवोचदसौ चाह धर्मशास्त्रबहिःकृतम् ॥३६७॥ एतदेव विधातारं ससमी प्रापयेक्षितिम् । तस्याभिज्ञानमप्यस्ति दिनेऽस्मिन् सप्तमे शनिः ॥३६८॥ पतिष्यति ततो यिद्धि सप्तमी धरणीति ते । तदुक्तं भूपतिर्मत्वा ब्राह्मणं तं न्यवेदयत् ॥३६९॥ तन्मृषा किमसौ वेचि नन्नः क्षपणकस्ततः । १शङ्कास्ति चेत्तवैतस्या शान्तिरत्र विधीयते ॥३७०॥ इत्युक्तिभिर्मनस्तस्य सन्धार्य शिथिलीकृतम् । यज्ञं पुनस्तमारब्ध' स ततः सप्तमे दिने ॥३७॥ माययाऽसुरपापस्य सुलसा नभसि स्थिता । देवभावं गता प्राच्यपशुभेदपरिष्कृता ॥३७२॥ यागमृत्युफलेनैषा' लब्धा देवगतिर्मया । तं प्रमोद तवाख्या विमानेऽहमिहागता ॥३७३॥ यज्ञेन प्रीणिता देवाः पितरश्चेत्यभाषत । तद्वचःश्रवणाद् दृष्टं प्रत्यक्ष यागमृत्युजम् ॥३७४।। फलं जैनमुनेर्वाक्यमसत्यमिति भूपतिः । तीब्रहिंसानुरागेण सद्धर्मद्वेषिणोदयात् ॥३७५॥ सम्भतपरिणामेन मूलोचरविकल्पितात् । तत्प्रायोग्यसमुत्कृष्टदुष्टसंक्लेशसाधनात् ॥३७६॥ नरकायुःप्रभृत्यष्टकर्मणां स्वोचितस्थितेः । अनुभागस्य बन्धस्य निकाचितनिबन्धने ॥३७७॥ विभीषणशनित्वेन तत्काले "पतिते रिपौ! 'तत्कर्मणि प्रसक्ताखिलाङ्गिभिः सगरः सह ॥३७८॥ रौरवेऽजनि दुष्टात्मा महाकालोऽपि तत्क्षणे । स्वचैरपवनापूरणेन गत्वा रसातलम् । ३७९॥ तं दण्डयितुमुत्क्रोधस्तृतीयनरकावधौ । अन्विष्यानवलोक्यैनं विश्वभप्रभृतिद्विषम् ॥३८०॥ मृतिप्रयोगसम्पादी ततो निर्गस्य निघृणः । पर्वतस्य प्रसादेन सुलसासहितः सुखम् ॥३८१॥ प्राप्तोऽहमिति शंसन्तं विमानेऽरिमदर्शयत् । तं दृष्ट्वा तत्परोक्षेऽत्र विश्वभूः सचिवः स्वयम् ॥३८२॥ वह यतिवर नामक मुनिके पास गया और नमस्कार कर पूछने लगा कि हे स्वामिन् ! मैंने जो कार्य प्रारम्भ किया है वह आपको ठीक-ठीक विदित है । विचार कर आप यह कहिये कि मेरा यह कार्य पुण्य रूप है अथवा पाप रूप ? उत्तरमें मुनिराजने कहा कि यह कार्य धर्मशास्त्रले बहिष्कृत है, यह कार्य ही अपने करनेवालेको सप्तम नरक भेजेगा। उसकी पहिचान यह है कि आजसे सातवें दिन वन गिरेगा उससे जान लेना कि तुझे सातवीं पृथिवी प्राप्त हुई है। मुनिराजका कहा ठीक मान कर राजाने उस ब्राह्मण-पर्वतसे यह सब बात कही ।। ३६६-३६६ ॥ राजाकी यह बात सुनकर पर्वत कहने लगा कि वह मठ है. वह नंगा साधु क्या जानता है? फिर भी तुझे यदि शंका है तो इसकी भी शांति कर डालते हैं ॥ ३७० ॥ इस तरहके वचनोंसे राजाका मन स्थिर किया और जो यज्ञ शिथिल कर दिया था उसे फिरसे प्रारम्भ कर दिया। तदनन्तर सातवें दिन उस पापी असुरने दिखलायाँ कि सुलसा देव पर्याय प्राप्त कर आकाशमें खड़ी है, पहले जो पशु होमे गये थे वे भी उसके साथ हैं। वह राजा सगरसे कह रही है कि यज्ञमें मरनेके फलसे ही मैंने यह देवगति पाई है, मैं यह सब हर्षकी बात आपको कहनेके लिए ही विमानमें बैठ कर यहाँ आई हूँ। यज्ञसे सब देवता प्रसन्न हुए हैं और सब पितर तृप्त हुए हैं। उसके यह वचन सुनकर सगरने विचार किया कि यज्ञमें मरनेका फल प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है अतः जैन मुनिके वचन असत्य हैं। उसी समय अनुराग रखनेसे एवं सद्धर्मके साथ देष करने वाले कर्मकी मूल-प्रकृति तथा उत्तर प्रकृतियोंके भेदसे उत्पन्न हुए परिणामोंसे. नरकायुको आदि लेकर आठों कर्मोंका अपने योग्य उत्कृष्ट स्थितिबन्ध एवं उत्कृष्ट अनुभागबन्ध पड़ गया। उसी समय भयङ्कर वज्रपात हुआ, वह उन सब शत्रुओं पर पड़ा और उस कार्यमें लगे हुए सब जीवोंके साथ राजा सगर मर कर रौरव नरक-सातवें नरकमें उत्पन्न हुआ। अत्यन्त दुष्ट महाकाल भी तीव्र क्रोध करता हुआ अपने वैररूपी वायुके भैंकोरेसे उसे दण्ड देनेके लिए नरक गया परन्तु उसके नीचे जानेकी अवधि तीसरे नरक तक ही थी। वहाँ तक उसने उसे खोजा परन्तु जब पता नहीं चला तब वह निर्दय वहाँसे निकला और विश्वभू मंत्री आदि शत्रुओंको मारनेका उपाय करने लगा। उसने मायासे दिखाया कि राजा सगर सुलसाके साथ विमानमें बैठा हुआ कह रहा है कि मैं पर्वतके १ शङ्काचेत्तवैतरया ल० । २ समारब्धः ल०। ३ पुरस्कृत म०, ल०। ४ फलेनैव ल०। ५ पतितौ ६ तत्कर्मणि तत्तत्कर्मप्रसक्ता ल। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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