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________________ २५० महापुराणे उत्तरपुराणम् अत्र का गतिरन्येषां प्राले कालेऽविलहिनि । विधौ विलसतीत्यातनिर्वेदो भरताधिपः॥ ८२॥ अनुप्रेक्षास्वरूपाख्या मुखेन स्वसभास्थितान् । धर्मसारं निरूप्याशु कृत्वा तत्त्वार्थवेदिनः ॥ ८३॥ दत्त्वा राज्यं सतां पज्यो महासेनाय सूनवे । तत्प्रार्थितेन सन्तप्यं दीनानाथवनीपकान् ॥ ८ ॥ श्रीनागजिनमासाद्य सीमन्ताचलसुस्थितम् । यथोक्तविधिना त्यक्त्वा सङ्ग व्यङ्गमनङ्गजित् ॥ ८५॥ 'बहुभिः सह सम्प्राप्य संयम शमसाधनम् । क्रमेण 'प्रासबहदिरायुरन्ते चतुर्विधाम् ॥ ८६ ॥ आराधनां समाराध्य प्रायोपगमनं श्रितः । क्षीणपापः कृपामूतिरापान्तिममनुत्तरम् ॥ ८॥ भूपः कोऽपि पुरा श्रिया श्रितवपुः पापोपलेशाद् भृश बिभ्यत्प्राप्य तपो भवस्य शरणं मत्वा तृतीयेऽभवत् । कल्पेऽन्ते भुवमेत्य चक्रिपदवीं सम्प्राप्य भुक्त्वा सुर्ख स श्रीमान् हरिषेणराजवृषभः सर्वार्थसिद्धिं ययौ । ८८ ॥ तीर्थेऽस्मिन्नेव सम्भूतावष्टमौ रामकेशवौ। रामलक्ष्मणनामानौ तत्पुराणं निगचते ॥८९॥ इहैव भारते क्षेत्रे राष्ट्र मलयनामनि । प्रजापतिमहाराजोऽजनि रत्नपुराधिपः ॥१०॥ 'तुक् तस्य गुणकान्तायां चन्द्रचूलसमावयः। विजयाख्येन तस्यासीसम्प्रीतिर्मन्त्रिसूनुना ॥ ९ ॥ पितृसल्लालितौ बालौ कुलादिमदचोदितौ । अभूतां दुष्टचारित्रौ दन्तिनौ वा निवर्तिनौ ॥ १२ ॥ भन्येचुस्तत्पुरे गौतमा वैश्रवणसम्भव । श्रीदत्ताख्याय मुख्याय कुबेरेणात्मजां सतीम् ॥ १३ ॥ दीयमानां समालोक्य पाण्यम्भासेकपूर्वकम् । कुबेरदत्ता केनाऽपि महापापविधायिना ॥ ९ ॥ प्रकार चन्द्रग्रहण देखकर चक्रवर्ती हरिषेणको वैराग्य उत्पन्न हो गया। उसने अनुप्रेक्षाओंके स्वरूप का वर्णन करते हुए अपनी सभामें स्थित लोगोंको श्रेष्ठ धर्मका स्वरूप बतलाया और शीघ्र ही उन्हें तत्त्वार्थका ज्ञाता बना दिया ॥८१-८३ ।। सत्पुरुषों के द्वारा पूजनीय हरिषेणने अपने महासेन नामक पुत्रके लिए राज्य दिया, मनोवाञ्छित पदार्थ देकर दीन अनाथ तथा याचकोंको संतुष्ट किया। तदनन्तर कामको जीतने वाले उसने सीमन्त पर्वतपर स्थित श्रीनाग नामक मुनिराजके पास जाकर विविध प्रकारके परिग्रहका विधिपूर्वक त्याग कर दिया। उसने अनेक राजाओंके साथ शान्ति प्राप्त करनेका साधनभूत संयम धारण कर लिया, क्रम-क्रमसे अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त की और आयुके अन्त में चार प्रकारकी आराधनाएं आराध कर प्रायोपगमन नामक संन्यास धारणाकर लिया। जिसके समस्त पाप क्षीण हो गये हैं तथा जो दयाकी मूर्ति स्वरूप हैं ऐसा वह चक्रवर्ती अन्तिम अनुत्तर विमान-सर्वार्थसिद्धिमें उत्पन्न हुआ॥८४-८७ ॥ श्रीमान् हरिषेण चक्रवर्तीका जीव पहले जिसका शरीर राजलक्ष्मीसे आलिंगित था ऐसा कोई राजा था, फिर पापसे अत्यन्त भयभीत हो उसने संसारका शरण मानकर तप धारण कर लिया जिससे तृतीय स्वर्गमें देव हुआ, फिर आयुके अन्त में वहाँसे पृथिवीपर आकर हरिषेण चक्रवर्ती हुआ और सुख भोगकर सर्वार्थसिद्धिमें अहमिन्द्र हुआ ॥८॥ अथानन्तर–इन्हीं मुनिसुव्रतनाथ तीर्थंकरके तीर्थमें राम और लक्ष्मण नामके आठवें बलभद्र और नारायण हुए हैं इसलिए यहाँ उनका पुराण कहा जाता है॥८६॥ उसी भरतक्षेत्रके मलय नामक राष्ट्रमें रनपुर नामका एक नगर है । उसमें प्रजापति महाराज राज्य करते थे ॥६०॥ उनकी गुणकान्ता नामकी स्त्रीसे चन्द्रचूल नामका पुत्र हुआ था। उन्हीं प्रजापति महाराजके मंत्रीका एक विजय नामका पुत्र था। चन्द्रचूल और विजयमें बहुत भारी खेह था। ये दोनों ही पुत्र अपने-अपने पिताओंको अत्यन्त प्रिय थे, बड़े लाड़से उनका लालन-पालन होता था और कुल आदिका धर्मद सदा उन्हें प्रेरित करता रहता था इसलिए वे दुर्दान्त हाथियों के समान दुराचारी होगये थे॥१-२॥ किसी एक दिन उसी नगरमें रहनेवाला कुबेर सेठ, उसी नगरमें रहने वाले वैश्रवण सेठकी गोतमा स्त्रीसे उत्पन्न श्रीदत्त नामक श्रेष्ठ पुत्रके लिए हाथमें जलधारा छोड़ता हुआ अपनी कुबेरदत्ता नामकी १ बाहुभिः ल०।२ प्राप्तससर्द्धि म० । ३ उक्तस्य ल। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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