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________________ २४२ महापुराणे उत्तरपुराणम् इति प्रत्याहतुः कर्णकटुकं तदुदीरितम् । समाकर्ण्य बलीन्द्राख्यो विभत्कालानुकारिताम् ॥ १३॥ योधुमाभ्यां समं भीमकोपः सनद्धवाँस्तदा । खगेन्द्रो दक्षिणश्रेण्यां' सुरकान्तारपू:पतिः ॥१४॥ केशवत्या महाभाता सम्मेदाद्रौ सुसाधिते । सिंहपक्षीन्द्रवाहिन्यौ महाविद्ये यथाविधि ॥ ११५॥ दत्वा ताभ्यां कुमाराभ्यां नाना केसरिविक्रमः । तदीयकायंसाहाय्यं बधुत्वेनावमन्यत ॥१६॥ तयोस्तुमुलयुद्धेन बलयोईलिनोरभूत् । संग्रामः क्षयकालो वा संहरन् सकलाः प्रजाः ॥११॥ तत्र मायामये युद्ध बलीन्द्रतनयं क्रुधा। मुखं शतवलिं मृत्योः सीरपाणिरनीनयत् ॥ ११ ॥ बलीन्द्रेणापि तं दृष्टा समुत्पनरुषात्मनः। प्रहितं चक्रमु"दिश्य केशवं कौशिकोपमम् ॥ ११९॥ . तत्तं प्रदक्षिणीकृत्य दक्षिणं, बाहुमाश्रितम् । तदेवादाय दत्तोऽपि हत्वा तं तच्छिरोऽग्रहीत् ॥ १२० यद्धान्ते तौ तदा वीरो प्रदचाभयघोषणौ । त्रिखण्डधरणीचक्र सचक्र' चक्रतुः स्वकम् ॥ १२१॥ चिरं राज्यसुखं भुक्त्वा स्वायुरन्ते स चक्रभृत् । बद्ध्वायुर्नारकं घोरम वधिस्थानमेयिवान् ॥ १२२ ॥ तन्निदेन रामोऽपि सम्भूतजिनसन्निधौ । दीक्षित्वा बहुभिर्भूपैरभूद गृहकेवली ॥ १२३ ॥ स्रग्धरा जातौ साकेतपुर्या प्रथितनृपसुतौ तौ समादाय दीक्षा प्रान्ते सौधर्मकल्पे प्रणिहितमनसौ देवभावप्रयातौ। वाराणस्यामभूतां पुरुकुलतिलको नन्दमित्रश्च दो दचोऽसौ सप्तमी क्ष्मा समगमदपरोऽप्याप कैवल्यलक्ष्मीम् ॥ १२४॥ दोनोंके लिए अपनी पुत्रियाँ देवे तो उसे यह गन्धगज दिया जा सकता है अन्यथा नहीं दिया जा सकता ॥ ११२॥ इस प्रकार कानोंको अप्रिय लगनेवाला उनका कहना सुनकर बलीन्द्र अत्यन्त कुपित हुआ। वह यमराजका अनुकरण करता हुआ उन दोनोंके साथ युद्ध करनेके लिए तैयार हो गया। उस समय दक्षिणश्रेणीके सुरकान्तार नगरके स्वामी केसरिविक्रम नामक विद्याधरोंके राजाने जो कि दत्तकी माता केशवतीका बड़ा भाई था सम्मेदशिखर पर विधिपूर्वक सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी नामकी दो विद्याएँ उक्त दोनों कुमारोंके लिए दे दी और भाईपना मानकर उनके कार्यमें सहायता देना स्वीकृत कर लिया ॥ ११३-११६ ॥ तदनन्तर उन दोनोंकी बलवान सेनाओंकाप्रलयकालके समान समस्त प्रजाका संहार करनेवाला भयङ्कर संपाम हुआ ॥ ११७ ॥ बलीन्द्र के पुत्र शतबलि और बलभद्र में खूब ही मायामयी युद्ध हुआ। उसमें बलभद्रने शतबलिको क्रोधवश यमराजके मुखमें पहुंचा दिया ॥ ११८ ।। यह देख, बलीन्द्रको क्रोध उत्पन्न हो गया। उसने इन्द्रके तुल्य नारायणदत्तको लक्ष्य कर अपना चक्र चलाया परन्तु वह चक्र प्रदक्षिणा देकर उसकी दाहिनी भजा पर आ गया। दत्तनारायणने उसी चक्रको लेकर उसे मार दिया और उसका शिर हाथमें ले लिया ॥११६-१२० ॥ युद्ध समाप्त होते ही उन दोनों वीरोंने अभय घोषणा की और चक्र सहित तीनों खण्डोंके पृथिवी-चक्रको अपने आधीन कर लिया ॥ १२१ ।। चिरकाल तक राज्य सुख भोगनेके बाद चक्रवर्ती-नारायणदत्त, नरकगति सम्बन्धी भयङ्कर आयुका बन्ध कर सातवें नरक गया ॥ १२२ ।। भाइके वियोगसे बलभद्रको बहुत वराग्य हुआ अतः उसने सम्भूत जिनेन्द्रके पास अनेक साथ दीक्षा ले ली तथा अन्तमें केवली होकर मोक्ष प्राप्त किया ॥ १२३ ॥ जो पहले अयोध्यानगरमें प्रसिद्ध राजपुत्र हुए थे, फिर दीक्षा लेकर आयुके अन्तमें सौधर्मस्वर्गमें देव हुए, वहाँसे च्युत होकर जो बनारस नगरमें इक्ष्वाकु वंशके शिरोमणि नन्दिमित्र और दत्त नामके बलभद्र तथा नारायण हुए। उनमेंसे दत्त तो मर कर सातवीं भूमिमें गया और नन्दिषेण १ दक्षिणाश्रेण्या क०, ५०। २ महाविद्यौ ल.। ३ बलिनोलिनोरभूत् ल०।४ मुखे म०। ५-मुद्यम्य ल०।६-मनधिस्थान-ल०। ७-रभूदगृह-ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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