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________________ षट्षष्टितम पर्व २३७ शून्यपञ्चमुनीन्दैकमनःपर्ययबोधनाः । चत्वारिंशत्सहस्राणि सर्वे सङ्कलनां श्रिताः ॥ ५७ ॥ खत्रयेन्द्रियपञ्चोक्ता बन्धुषेणादिकार्यिकाः । श्रावकाः लक्षमाः प्रोक्ताः श्राविकास्त्रिगुणास्ततः ॥ ५८ ॥ देवा देन्यस्स्त्वसहयाताः 3गण्या कण्ठीरवादयः । एवं द्वादशभिर्देवो गणैरेभिः परिष्कृतः ॥ ५९ ॥ मुक्तिमार्ग नयन भव्यपथिकान् प्रथितध्वनिः । विजहार महादेशान् भव्यसत्वानुरोधतः ॥ ६ ॥ ततो मासावशेषायुःसम्मेदाचलमाश्रितः । प्रतिमायोगमादाय मुनिभिः सह पञ्चभिः ॥ ६ ॥ सहानमास्थाय भरण्यां पूर्वरात्रतः। फाल्गुनोज्ज्वलपञ्चम्यां तनुवातं समाश्रयत् ॥ ६२ ॥ कल्पानिर्वाणकल्याण मन्वेत्यामरनायकाः । गन्धादिभिः समभ्यय॑ तत्क्षेत्रमपवित्रयन् ॥ ६३ ॥ मालिनी जननमृतितरङ्गाद् दुःखदुर्वारिपूर्णा दुपचितगुणरनो दुःस्पृहावर्तगर्तात् । स कुमतविधुवृद्धाद् ध्याति नावा भवाब्धे रभजत भुवनाग्रं विग्रहग्राहमुक्तः ॥ ६ ॥ स्वागता येन शिष्टमुरुवम विमुक्ते यं नमन्ति नमिताखिललोकाः । यो गुणैः स्वयमधारि समग्रैः ।। स श्रियं दिशतु मल्लिरशल्यः ॥ १५ ॥ द्रुतविलम्बितवृत्तम् अजनि वैश्रवणो धरणीश्वरः पुनरनुत्तरनाम्न्यपराजिते । पचास मनःपर्ययज्ञानी थे। इस प्रकार सब मिलाकर चालीस हजार मुनिराज उनके साथ थे ॥५४-५७॥ बन्धुषेणाको आदि लेकर पचपन हजार आर्यिकाएँ थीं, श्रावक एक लाख थे और श्राविकाएँ तीन लाख थीं, देव-देवियाँ असंख्यात थीं, और सिंह आदि तिर्यञ्च संख्यात थे। इस प्रकार मल्लिनाथ भगवान् इन बारह सभाओंसे सदा सुशोभित रहते थे ।। ५८-५६ ॥ जिनकी दिव्य ध्वनि अत्यन्त प्रसिद्ध है ऐसे भगवान् मल्लिनाथने भव्य जीवरूपी पथिकोंको मुक्तिमार्गमें लगाते हुए, भव्य जीवोंके अनुरोधसे अनेक बड़े-बड़े देशोंमें विहार किया था ।। ६०॥ जब उनकी माहकी बाकी रह गई तब वे सम्मेदाचल पर पहुंचे। वहाँ पाँच हजार मुनियोंके साथ उन्होंने प्रतिमायोग धारण किया और फाल्गुन शुक्ला सप्तमीके दिन भरणी नक्षत्र में सन्ध्याके समय तनुवात वलय-मोक्षस्थान प्राप्त कर लिया ।। ६१-६२ ॥ उसी समय इन्द्रादि देवोंने स्वर्गसे आकर निर्वाणकल्याणकका उत्सव किया और गन्ध आदिके द्वारा पूजा कर उस क्षेत्रको पवित्र बना दिया ।। ६३ ।। जिसमें जन्म-मरणरूपी तरङ्गे उठ रही हैं, जो दुःखरूपी खारे पानीसे लबालब भरा हुआ है, जिसमें खोटी इच्छाएँ रूपी भँवर पड़नेके गड्ढ हैं और जो मिथ्यामतरूपी चन्द्रमासे निरन्तर बढ़ता रहता है ऐसे संसार रूपी सागरसे,गुणरूपीरत्नोंका संचय करनेवाले मल्लिनाथ भगवान् शरीररूपी मगरमच्छको दूर छोड़कर ध्यानरूपी नावके द्वारा पार हो लोकके अग्रभाग पर पहुँचे थे ॥ ६४॥ जिन्होंने मोक्षका श्रेष्ठ मार्ग बतलाया था, जिन्हें समस्त लोग नमस्कार करते थे, और जो समग्रगुणोंसे परिपूण थे वे शल्य रहित मल्लिनाथ भगवान् तुम सबके लिए मोक्ष-लक्ष्मी प्रदान करें ॥६५॥ जो पहले वैश्रवण नामके राजा हुए, फिर अपराजित नामक अनुत्तर विमानमें अहमिन्द्र हुए और फिर अतिशय । १ मुनीन्दूक्त म०, ल०। २ स्मृताः ख०, ग०। ३ संख्याता: गुण्याः म०। ४-मत्रेत्यामर-ल ५ भुवनाग्रे ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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