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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् तदुक्तमतिलण्याज्ञः पोतेनागाहताम्बुधिम् । तदा रनानि तद्गेहात् न्यपेतान्यखिलान्यपि ॥ १६६ ॥ सहस्रयक्षरक्षाणि प्रत्येकं निधिभिः समम् । तद्विदित्वा वणिग्वैरी नीत्वा मध्येऽम्बुधिं द्विषम् ॥ १६७ ॥ स्वप्राग्जन्माकृतिं तस्य प्रकटीकृत्य दुर्वचः । उक्त्वा वैरानुबन्धं च क्रूरचित्रवधं व्यधात् ॥ १६८ ॥ सुभौमोsपि विपद्यान्ते रौद्रध्यानपरायणः । श्वाश्रीं गति समापन्नो दौर्मत्यात्किन्न जायते ॥ १६९ ॥ लोभात्सहसूबाहुश्च प्राप तिर्यग्गतिं सतुक् । जमदग्निसुतौ हिंसापरतन्त्रौ गतावधः ॥ १७० ॥ तत एव त्यजन्त्येतौ रागद्वेषौ मनीषिणः । तत्त्यागादामुवन्त्यापन्नाप्स्यन्ति च परं पदम् ॥ १७१ ॥ २३० वसन्ततिलका एकोऽपि सिंहसदृशः सकलावनीशो हत्वा पितुर्वधकृतौ जमदभिसूनू । की स्वया धवलिताऽखिलदिक् सुभौम श्चक्री सुदुर्नयव' शानरकेऽष्टमोऽभूत् ॥ १७२ ॥ भूपाल भूपतिरसह्यतपोविधायी शुक्लेऽभवन्महति षोडशसागरायुः । च्युत्वा ततः सकलचक्रधरः सुभौमो रामान्तकृनरकनायकतां जगाम ॥ १७३ ॥ नन्दिषेणो बल: पुण्डरीकोऽर्द्ध भरताधिपः । राजपुत्राविमौ जातौ तृतीयेऽत्र भवान्तरे ॥ १७४ ॥ सुकेत्वाश्रयशल्येन तपः कृत्वायुषोऽवधौ । भाये कल्पे समुत्पद्य ततः प्रच्युत्य चक्रिणः ॥ १७५ ॥ पश्चात्पट् छतकोट्यब्दातीतौ तत्रैव भारते । राज्ञश्चक्र पुराधीशादिक्ष्वाकार्वरसेनतः ॥ १७६ ॥ कर क्यों नष्ट होते हो तथापि उस मूर्खने एक न मानी। वह उनके वचन उल्लंघन कर जहाज द्वारा समुद्र में जा घुसा। उसी समय उसके घरसे जिनमें प्रत्येककी एक-एक हजार यक्ष रक्षा करते थे ऐसे समस्त रन निधियों के साथ-साथ घरसे निकल गये । यह जानकर वैश्यका वेष रखनेवाला शत्र भूतदेव अपने शत्रु राजाको समुद्रके बीचमें ले गया ।। १६५ - १६७ ।। वहाँ ले जाकर उस दुष्टने पहले जन्मका अपना रसोइयाका रूप प्रकट कर दिखाया और अनेक दुर्वचन कह कर पूर्वबद्ध वैरके संस्कारसे उसे विचित्र रीतिसे मार डाला ॥ १६८ ॥ सुभौम चक्रवर्ती भी अन्तिम समय रौद्रध्यानसे मर कर नरकगतिमें उत्पन्न हुआ सो ठीक ही है क्योंकि दुर्बुद्धिसे क्या नहीं होता है ? ॥ १६६ ॥ सहस्रबाहु लोभ करने से अपने पुत्रके साथ-साथ तिर्यञ्च गतिमें गया और हिंसामें तत्पर रहनेवाले जमदग्नि ऋषिके दोनों पुत्र अधोगति - नरकगतिमें उत्पन्न हुए ।। १७० ॥ इसीलिए बुद्धिमान् लोग इन राग-द्वेष दोनोंको छोड़ देते हैं क्योंकि इनके त्यागसे ही विद्वान् पुरुष वर्तमानमें परमपद प्राप्त करते हैं, भूतकालमें प्राप्त करते थे और आगामी कालमें प्राप्त करेंगे ।। १७१ ।। देखो, आठवाँ चक्रवर्ती सुभौम यद्यपि सिंहके समान एक था - अकेला ही था तथापि वह समस्त पृथिवीका स्वामी हुआ । उसने अपने पिताका वध करनेवाले जमदग्निके दोनों पुत्रों को मारकर अपनी कीर्तिसे समस्त दिशाएँ उज्ज्वल कर दी थीं किन्तु स्वयं दुर्नीतिके वश पड़कर नरकमें उत्पन्न हुआ था ॥ १७२॥ सुभौम चक्रवर्तीका जीव पहले तो भूपाल नामका राजा हुआ फिर असह्य तप-तपकर महाशुक्र स्वर्गमें सोलह सागरकी युवाला देव हुआ । वहाँसे च्युत होकर परशुरामको मारनेवाला सुभौम नामका चक्रवर्ती और अन्तमें नरकका अधिपति हुआ ।। १७३ ॥ सकल Jain Education International हुआ अथानन्तर इन्हीं के समय नन्दिषेण बलभद्र और पुण्डरीक नारायण ये दोनों ही राजपुत्र हुए हैं। इनमें से पुण्डरीकका जीव तीसरे भवमें सुकेतुके आश्रयसे शल्य सहित तप कर आयुके अन्तमें पहले स्वर्गमें देव हुआ था, वहाँसे च्युत होकर सुभौम चक्रवर्तीके बाद छह सौ करोड़ वर्ष बीत जाने १ द्विषः ल० । २ - वैधकृते क०, घ० । ३ वशो ल० । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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