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________________ पञ्चषष्टितमं पर्व सरतारं परं सारं 'नरनाथकृतानतिम् । अगाधासारसंसारसागरोत्सारकारणम् ॥१॥ द्वीपे जम्बूद्रमख्याते सीतोत्तरतटाश्रिते। कच्छाख्यविषये क्षेमपुराधीशो महीपतिः ॥ २॥ नाम्ना धनपतिः पाता प्रजानां जनताप्रियः । धात्री धेनुः स्वयं तस्य दुग्धे स्म प्रस्नुतानिशम् ॥३॥ विनाथिभिरपि त्यागी विनाप्यरिभिरुद्यमी। तपिंतार्थिनि धृतारौ तस्मिस्तौ सहजौ गुणौ ॥४॥ स्ववृत्त्यनुगमेनैव वर्गत्रयनिषेविणः । राजा प्रजाश्च राज्येऽस्मिस्तम धर्मव्यतिक्रमः ॥ ५॥ कदाचिद्धरणीधर्ता पीत्वानन्दतीर्थकृद् । दिव्यध्वनिसमुद्भूतं धर्मसाररसायनम् ॥ ६॥ विरज्य राज्यभोगापरसाद्राज्यं निजात्मजे । नियोज्य मंक्षु प्रव्रज्यां जैनी जन्मान्तकारिणीम् ॥ ७॥ आसाथैकादशाङ्गोरुपारावारस्य पारगः । द्वयष्टकारणसम्बद्धतीर्थकृनामपुण्यकृत् ॥८॥ ४प्रायोपगमनेनापत्स जयन्तेऽहमिन्द्रताम् । त्रयस्त्रिंशत्समुद्रोपमायुर्हस्ततनुप्रमः॥ ९॥ शुक्ललेश्यादयः सार्थैर्मासैः षोडशभिः श्वसन् । त्रयस्त्रिंशत्सहस्रोक्तवर्मानसमाहरन् ॥१०॥ अमृतं निःप्रवीचारसुखसागरपारगः । स्वावधिज्ञाननिर्णीतलोकनाड्यर्थविस्तृतिः॥१॥ स्वावधिक्षेत्रनिर्णीतप्रकाशबलविक्रियः । अतिप्रशान्तरागादिरासन्नीकृतनिर्वृतिः ॥ १२ ॥ सद्वद्योदयसम्भूतमन्वभूत् भोगमुत्तमम् । उदितोदितपर्याप्तिपर्यन्तोपान्तमास्थितः ॥ १३ ॥ अथानन्तर जो अगाध और असार संसाररूपी सागरसे पार कर देनेमें कारण हैं, अनेक राजा जिन्हें नमस्कार करते हैं और जो अत्यन्त श्रेष्ठ हैं ऐसे अरनाथ तीर्थंकरकी तुम सब लोग सेवा करो-उनकी शरणमें जाओ ॥ १॥ इस जम्बूद्वीपमें सीता नदीके उत्तर तटपर एक कच्छ नामका देश है । उसके क्षेमपुर नगरमें धनपति नामका राजा राज्य करता था। वह प्रजाका रक्षक था और लोगोंको अत्यन्त प्यारा था । पृथिवीरूपी धेनु सदा द्रवीभूत होकर उसके मनोरथ पूर्ण किया करती थी॥ २-३ ॥ याचकोंको संतुष्ट करनेवाले और शत्रुओंको नष्ट करनेवाले उस राजामें ये दो गुण स्वाभाविक थे कि वह याचकोंके विना भी त्याग करता रहता था और शत्रुओंके न रहने पर भीउद्यम किया करता था ।।४।। उसके राज्यमें राजा-प्रजा सब लोग अपनी-अपनी वृत्तिके अनुसार त्रिवर्गका सेवन करते थे इसलिए धर्मका व्यतिक्रम कभी नहीं होता था ॥ ५॥ किसी एक दिन उस राजाने अईन्नन्दन तीर्थंकरकी दिव्यध्वनिसे उत्पन्न हुए श्रेष्ठधर्मरूपी रसायनका पान किया जिससे राज्यसम्बन्धी भोगोंसे विरक्त होकर उसने अपना राज्य अपने पुत्रके लिए दे दिया और शीघ्र ही जन्ममरणका अन्त करनेवाली जैनी दीक्षा धारण कर ली ।। ६-७ ।। ग्यारह अङ्गरूपी महासागरके पारगामी होकर उसने सोलह कारणभावनाओंके द्वारा तीर्थंकर नामक पुण्य कर्मका बन्ध किया । अन्तमें प्रायोपगमन संन्यासके द्वारा उसने जयन्त विमानमें अहमिन्द्र पद प्राप्त किया। वहाँ तैंतीस सागर प्रमाण उसकी आयु थी, एक हाथ ऊँचा शरीर था, द्रव्य और भावके भेदसे दोनों प्रकारकी शुक्ल लेश्याएँ थीं, वह साढ़े सोलह माहमें एक बार श्वास लेता था, और तैंतीस हजार वर्षमें एक बार मानसिक अमृतमय आहार ग्रहण करता था। प्रवीचाररहित सुखरूपी सागरका पारगामी था, अपने अवधिज्ञानके द्वारा वह लोकनाड़ीके भीतर रहने वाले पदार्थोक विस्तारको जानता था। ॥-११॥ उसके अवधिज्ञानका जितना क्षेत्र था उतने ही क्षेत्र तक उसका प्रकाश, बल और विक्रिया ऋद्धि थी। उसके राग-द्वेष आदि अत्यन्त शान्त हो गये थे और मोक्ष उसके निकट आ चुका था ॥ १२॥ वह साता वेदनीयके उदयसे उत्पन्न हुए उत्तम भोगोंका उपभोग करता था। १ नरनाथाकृतानतिम् प० । २ स्ववृत्त्यानु-ल०। । समुद्भूत-ल। ४ प्रायोपगमनादापत् म०, ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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