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________________ २१० महापुराणे उत्तरपुराणम् 'चतुःसहस्रसङ्ख्योतकेवलावगमेश्वराः । षट्सहस्त्राणि सम्प्रोक्तविक्रियांद्धावभूषिताः ॥ ४९१ ॥ मनः पर्ययसद्बोधसहस्राणां चतुष्टयम् । शून्यद्रयचतुः पक्षलक्षिताः पूज्यवादिनः ॥ ४९२ ॥ ते द्विषष्टिसहस्राणि सर्वेऽपि मुनयो मताः । आर्थिका हरिषेणायाः खद्वयत्रिखषडूमिताः ॥ ४९३ ॥ श्रावकाः सुरकिीर्त्याद्या लक्षद्वयनिरूपिताः । अर्हहास्यादिकाः प्रोक्ताः श्राविका द्विगुणास्ततः ॥ ४९४ ॥ देवा देव्योऽप्यसङ्ख्यातास्तिर्यक्जा: ' सङ्ख्ययामिताः । इति द्वादशभिः सार्द्धं गणैः सद्धर्ममादिशत् ४९५ विहरन्मासमात्रायुः सम्मेदाचलमागतः । व्यपेतव्याहृतिर्योगमास्थायाचलितं विभुः ॥ ४९६ ॥ ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां पूर्वरात्रेः कृतक्रियः । तृतीयशुक्लध्यानेन रुद्धयोगो विबन्धनः ॥ ४९७ ॥ * अकारपञ्चकोच्चारमात्रकाले वियोगकः । चतुर्थशुक्रुध्यानेन निराकृततनुत्रयः ॥ ४९८ ॥ अगाद्भरणिनक्षत्रे लोकाप्रं गुणविग्रहः । अतीतकाले ताः सिद्धा यत्रानन्ता निरन्जनाः ॥ ४९९ ॥ चतुविधामराः सेन्द्राः निस्तन्द्रा रुन्द्रभक्तयः । कृत्वान्त्येष्टि तदागत्य स्वं स्वमावासमाश्रयन् ॥ ५०० ॥ चक्रायुधादयोप्येवमाध्यायान्त्यतनुत्रयम् । हित्वा नव सहस्राणि निवृतिं यतयोऽगमन् ॥ ५०१ ॥ मालिनी इति परममवाप्य ज्ञानदृक्सौख्यवीर्यस्फुरिततनुनिवासव्याहृतिस्थानमुच्चैः । सुरपतिदृढपूज्यः शान्तिभट्टारको वो दिशतु परमसप्तस्थान सम्प्राप्तिमासः ॥ ५०२ ॥ Jain Education International शार्दूलविक्रीडितम् कर्माण्यष्ट सकारणानि सकलान्युन्मूल्य नैर्मल्यवान् सम्यक्त्वादिगुणाष्टकं निजमजः स्वीकृत्य कृत्यान्तगः । ।। ४८६-४६० ।। वे चार हजार केवलज्ञानियोंके स्वामी थे और छह हजार विक्रियाऋद्धिके धारकोंसे सुशोभित थे । ४६१ ।। चार हजार मनःपर्यय ज्ञानी और दो हजार चार सौ पूज्यवादी उनके साथ थे ॥ ४६२ || इस प्रकार सब मिलाकर बासठ हजार मुनिराज थे, इनके सिवाय साठ हजार तीन सौ हरिषेणा आदि आर्यिकाएँ थीं, सुरकीर्तिको आदि लेकर दो लाख श्रावक थे, अर्हद्दासीको आदि लेकर चार लाख श्राविकाएँ थीं, असंख्यात देव देवियाँ थीं और संख्यात तिर्यश्व थे । इस प्रकार बारह के साथ-साथ वे समीचीन धर्मका उपदेश देते थे ।। ४६३ - ४६५ ।। विहार करते-करते जब एक माहकी आयु शेष रह गई तब वे भगवान् सम्मेदशिखर पर आये और विहार बन्द कर वहाँ अचल योगसे विराजमान हो गये ।। ४६६ ॥ ज्येष्ठ कृण चतुर्दशीके दिन रात्रिके पूर्व भागमें उन कृतकृत्य भगवान् शांतिनाथने तृतीय शुक्लध्यानके द्वारा समस्त योगोंका निरोध कर दिया, बन्धका अभाव कर दिया और कार आदि पाँच लघु अक्षरोंके उच्चारणमें जितना काल लगता है उतने समय तक अयोगकेवली अवस्था प्राप्त की। वहीं चतुर्थ शुक्लध्यानके द्वारा वे तीनों शरीरोंका नाश कर भरणी नक्षत्र में लोकके अग्रभाग पर जा विराजे । उस समय गुण ही उनका शरीर रह गया था । श्रतीत कालमें गये हुए कर्ममलरहित अनंत सिद्ध जहाँ विराजमान थे वहीं जाकर वे विराजमान हो गये ॥ ४६७-४६६ ।। उसी समय इन्द्र सहित, आलस्यरहित और बड़ी भक्तिको धारण करनेवाले चार प्रकारके देव आये और अन्तिम संस्कार - निर्वाणकल्याणककी पूजा कर अपने-अपने स्थान पर चले गये ॥ ५०० ॥ चक्रायुधको आदि लेकर अन्य नौ हजार मुनिराज भी इस तरह ध्यान कर तथा औदारिक तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंको छोड़ कर निर्वाणको प्राप्त हो गये ।। ५०१ ॥ इस प्रकार जिन्होंने उत्तम ज्ञान दर्शन-सुख और वीर्यसे सुशोभित परमौदारिक शरीरमें निवास तथा परमोत्कृष्ट विहारके स्थान प्राप्त किये, जो अरहन्त कहलाये और इन्द्रने जिनकी दृढ़ पूजा की ऐसे श्री शान्तिनाथ भट्टारक तुम सबके लिए सात परम स्थान प्रदान करें ।। ५०२ ॥ जो १ तिर्यक्काः ल० । २ इकार ख० म०, ल० । ३ सफलान्यु-ख०, ग०, म०, ल०, । 2 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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