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________________ १६२ महापुराणे उत्तरपुराणम् दत्वान्नदानमेताभ्यामवाप्याश्चर्यपञ्चकम् । उदक्कुर्वायुरग्रन्थात् दशाङ्गतरुभागदम् ॥ ३४९॥ देव्यौ दानानुमोदेन सत्यभामा च सक्रिया। तदेवायुरवापुस्ताः किं न स्यात्साधुसङ्गमात् ॥ ३५० ॥ अथ कौशाम्ब्यधीशस्य महाबलमहीपतेः । श्रीमत्याश्च सुता नान्ना श्रीकान्ता कान्ततावधिः ॥३५१ ॥ राजा तामिन्द्रसेनस्य विवाहविधिना ददौ । तया सहागतानन्तमतिः सामान्यकामिनी ॥ ३५२ ॥ एतयोपेन्द्रसेनस्य साङ्गत्यं स्नेहनिर्भरम् । अभूदभूच्च तद्धतोस्तयोरुद्यानवतिनोः ॥ ३५३ ॥ युद्धोद्यमस्तदाकर्ण्य तौ निवारयितं नृपः । गत्वा कामातुरौ क्रुद्धावसमर्थः प्रियात्मजः ॥३५४ ॥ सोढुं तनुजयोर्दुःखमाशयतया स्वयम् । अशक्नुवन् समाधाय विषपुष्पं मृतिं ययौ ॥ ३५५ ॥ तदेव पुष्पमाघ्राय 'समीयुविंगतासुताम् । तद्देव्यौ सत्यभामा च विचित्रा विधिचोदना ॥ ३५६ ॥ धातकीखण्डपूर्वार्द्धकुरुधुरारनामसु । दम्पती नृपतिः सिंहनन्दिता च बभूवतुः ।। ३५७ ।। अभूदनिन्दिताऽऽर्योऽयं सत्यभामा च वल्लभा । तस्थुः सर्वेऽपि ते तत्र भोगभूभोगभागिनः ॥३५८॥ अथ कश्चित्खगो मध्ये प्रविश्य नृपपुत्रयोः। वृथा किमिति युद्धथतामनुजा युवयोरियम् ॥ ३५९ ॥ इत्याह तद्वचः श्रुत्वा कुमाराभ्यां सविस्मयम् । कथं तदिति सम्पृष्टः प्रत्याह गगनेचरः ॥ ३६० ॥ धातकीखण्डप्राग्भाग3मन्दरप्राच्यपुष्कला-वती खगाद्यपाक श्रेणीगतादित्याभपूर्भुजः॥ ३६१ ॥ तनूजो मित्रसेनायां सुकुण्डलिखगेशिनः । मणिकुण्डलनामाहं कदाचित्पुण्डरीकिणीम् ॥ ३६२ ॥ गतोऽमितप्रभार्हद्भ्यः श्रुत्वा धर्म सनातनम् । मत्पूर्व भवसम्बन्धमप्राक्षमवर्दश्च ते ॥ ३६३ ॥ और दश प्रकारके कल्पवृक्षोंके भोग प्रदान करने वाली उत्तरकुरुकी आयु बांधी। राजाकी दोनों रानियोंने तथा उत्तम कार्य करनेवाली सत्यभामाने भी दानकी नुमोदनासे उसी उत्तरकुरुकी आयुका बन्ध किया सो ठीक ही है क्योंकि साधुओंके समागमसे क्या नहीं होता ? ॥ ३४८-३५०।। अथानन्तर कौशाम्बी नगरी में राजा महाबल राज्य करते थे, उनकी श्रीमती नामकी रानी थी और उन दोनोंके श्रीकान्ता नामकी पुत्री थी। वह श्रीकान्ता मानो सुन्दरताकी सीमा ही थी ॥३५१ ।। राजा महाबलने वह श्रीकान्ता विवाहकी विधिपूर्वक इन्द्रसेनके लिए दी थी। श्रीकान्ताके साथ अनन्तमति नामकी एक साधारण स्त्री भी गई थी। उसके साथ उपेन्द्रसेनका स्नेहपूर्ण समागम हो गया और इस निमित्तको लेकर बगीचामें रहनेवाले दोनों भाइयोंमें युद्ध होनेकी तैयारी हो गई। जब राजाने यह समाचार सुना तब वे उन्हें रोकनेके लिए गये परन्तु वे दोनों ही कामी तथा क्रोधी थे अतः राजा उन्हें रोकनेमें असमर्थ रहे। राजाको दोनों ही पुत्र अत्यन्त प्रिय थे। साथ ही उनके परिणाम अत्यन्त आर्द्र-कोमल थे अतः वे पुत्रोंका दुःख सहनमें समर्थ नहीं हो सके। फल यह हुआ कि वे विष-पुष्प सूंघ कर मर गये ।। ३५२-३५५ ॥ वही विष-पुष्प सूंघकर राजाकी दोनों स्त्रियाँ तथा सत्यभामा भी प्राणरहित हो गई सो ठीक ही है क्योंकि कर्मोकी प्रेरणा विचित्र होती है ।। ३५६ ।। धातकीखण्डके पूर्वार्ध भागमें जो उत्तरकुरु नामका प्रदेश है उसमें राजा तथा सिंहनन्दिता दोनों दम्पती हुए और अनिन्दिता नामकी रानी आर्य तथा सत्यभामा उसकी स्त्री हुई। इस प्रकार वे सब वहाँ भोगभूमिके भोग भोगते हुए सुखसे रहने लगे ॥ ३५७-३५८॥ अथानन्तर कोई एक विद्याधर युद्ध करनेवाले दोनों भाइयोंके बीच प्रवेश कर कहने लगा कि तुम दोनों व्यर्थ ही क्यों युद्ध करते हो ? यह तो तुम्हारी छोटी बहिन है। उसके वचन सुनकर दोनों कुमारोंने आश्चर्य के साथ पूछा कि यह कैसे ? उत्तरमें विद्याधरने कहा ॥ ३५६-३६० ॥ कि धातकीखण्ड द्वीपके पूर्वभागमें मेरुपर्वतसे पूर्वकी ओर एक पुष्कलावती नामका देश है। उसमें विजया पर्वतकी दक्षिण श्रेणी पर आदित्याभ नामका नगर है। उसमें सुकुण्डली नामका विद्याधर राज्य करता है। सुकुण्डलीकी स्त्रीका नाम मित्रसेना है। मैं उन दोनोंका मणिकुण्डल नामका पुत्र हैं। मैं किसी समय पुण्डरीकिणी नगरी गया था, वहाँ अमितप्रभ जिनेन्द्रसे सनातनधर्मका स्वरूप १ - रग्रन्थत् ग०।-रग्रस्थान् ल० । २ समापुविंगतासुताम् ख० । समीयुर्विगतामुकाम ल० । ३ प्राग्भागे ख०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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