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________________ १५२ महापुराणे उत्तरपुराणम् श्मशाने राक्षसः पापी तस्मिन्नेवोपपद्यत । तत्पुराधीशिनौ कुम्भभीभौ कुम्भस्य पाचकः ॥ २०५॥ रसायनादिपाकाख्यस्तभोग्यपिशितेऽसति । शिशोय॑सोस्तदा मांसं स कुम्भस्य न्ययोजयत् ॥ २०६॥ तत्स्वादलोलुपः पापी तदाप्रभृति खादितुम् । मनुष्यमांसमारब्ध सम्प्रेप्सु रकी गतिम् ॥ २० ॥ प्रजानां पालको राजा तावत्तिष्ठतु पालने । खादत्ययमिति स्यक्तः स त्याज्यः सचिवादिभिः २०८ ॥ तन्मांसजीवितः क्रूरः कदाचिनिजपाचकम् । हत्वा साधिततद्विद्यः संक्रान्तप्रोक्तराक्षसः॥२०९ ॥ प्रजाः स भक्षायामस प्रत्यहं परितो भ्रमन् । ततः सर्वेऽपि सन्त्रस्ताः पौराः सन्त्यज्य तत्पुरम् ॥२१॥ नगरं प्राविशन् कारकटं नाम महाभिया । तत्राप्यागत्य पापिष्ठः कुम्भाख्योऽभक्षयत्तराम् ॥ ११ ॥ ततः प्रभृति तत्प्राहुः कुम्भकारकर्ट पुरम् । यथादृष्टनृभक्षित्वाभीत्वैकशकटौदनम् ॥ २१२॥ खादैकमानुषं चेति प्रजास्तस्य स्थितिं व्यधुः । तत्रैव नगरे चण्डकौशिको नाम विप्रकः ॥२३॥ सोमश्रीस्तत्प्रिया भूतसमुपासनतश्चिरम् । मौण्डकौशिकनामानं तनयं ताववापतुः॥ २१४ ॥ कुम्भाहाराय यातं तं कदाचिन्मुण्डकौशिकम् । शकटस्योपरि क्षिप्तं नीत्वा भूतैः प्रयायिभिः॥ २१५॥ कुम्भेनानुयता दण्डहस्तेनाक्रम्य तजितैः । भयाद्विले विनिक्षितं जगाराजगरो द्विजम् ॥ २१६॥ विजया गुहायां तनिक्षेपणमयुक्तकम् । पर्थ्य तद्वचनं श्रुत्वा सूक्ष्मधीमतिसागरः ॥ २१७॥ भूपतेरशनेः पातो नोक्तो नैमित्तिकेन तत् । पोदनाधिपतिः कश्चिदन्योऽवस्थाप्यतामिति ॥ २१८॥ पालकोंने उसकी उपेक्षा कर दी-खाना-पीना देना भी बन्द कर दिया । कारण वश उसे जाति-स्मरण हो गया और वह नगर भरके साथ वैर करने लगा। अन्तमें मर कर वहींके श्मशानमें पापी राक्षस हा। उस नगरके कुम्भ और भीम नामके दो अधिपति थे। कुम्भके रसोइयाका नाम रसायनपाक था, राजा कुम्भ मांसभोजी था, एक दिन मांस नहीं था इसलिए रसोइयाने कुम्भको मरे हए बच्चेका मांस खिला दिया ।। २०४-२०६॥ वह पापी उसके स्वादसे लुभा गया इसलिए उसी समयसे उसने मनुष्यका मांस खाना शुरू कर दिया, वह वास्तवमें नरक गति प्राप्त करनेका उत्सुक था ॥ २०७॥राजा प्रजाका रक्षक है इसलिए जब तक प्रजाकी रक्षा करने में समर्थ है तभी तक राजा रहता है परन्तु यह तो मनुष्योंको खाने लगा है अतः त्याज्य है ऐसा विचार कर मन्त्रियोंने उस राजाको छोड़ दिया ।। २०८ ।। उसका रसोइया उसे नर-मांस देकर जीवित रखता था परन्तु किसी समय उस दुष्टने अपने रसोइयाको ही मारकर विद्या सिद्ध कर ली और उस राक्षसको वश.कर लिया ।। २०६ ।। अब वह राजा प्रतिदिन चारों ओर घूमता हुआ प्रजाको खाने लगा जिससे समस्त नगरवासी भयभीत हो उस नगरको छोड़कर बहुत भारी भयके साथ कारकट नामक नगरमें जा पहुँचे परन्तु अत्यन्त पापी कुम्भ राजा उस नगरमें भी आकर प्रजाको खाने लगा ॥२१०-२११।। उसी समयसे लोग उस नगरको कुम्भकारकटपुर कहने लगे। मनुष्योंने देखा कि यह नरभक्षी है इसलिए डर कर उन्होंने उसकी व्यवस्था बना दी कि तुम प्रति दिन एक गाड़ी भात और एक मनुष्यको खाया करो। उसी नगरमें एक चण्डकौशिक नामका ब्राह्मण रहता था। सोमश्री उसकी स्त्री थी, चिरकाल तक भतोंकी उपासना करनेके बाद उन दोनोंने मौण्डकौशिक नामका पुत्र प्राप्त किया ॥ २१२-२१४॥ किसी एक दिन कुम्भके आहारके लिए मौण्डकौशिककी बारी आई। लोग उसे गाड़ी पर डाल कर ले जा रहे थे कि कुछ भूत उसे ले भागे, कुम्भने हाथमें दण्ड लेकर उन भूतोंका पीछा किया, भूत उसके आक्रमणसे डर गये, इसलिए उन्होंने मुण्डकौशिकको भयसे एक बिलमें डाल दिया परन्तु एक अजगरने वहाँ उस ब्राह्मणको निगल लिया ॥२१५-२१६ ।। इसलिए महाराजको विजयार्धकी गुहामें रखना ठीक नहीं है। बुद्धिसागरके ये हितकारी वचन सुनकर सूक्ष्म बुद्धिका धारी मतिसागर मंत्री कहने लगा कि निमित्तज्ञानीने यह तो कहा नहीं है कि महाराजके ऊपर ही वन गिरेगा। उसका तो कहना है कि जो पोदनपुरका राजा होगा उस पर वज्र गिरेगा इसलिए किसी दूसरे मनुष्यको पोदनपुरका राजा बना देना १ तत्प्रभृति तत्प्राहुः ज० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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