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________________ द्विषष्टितम पर्व १४६ ततो निःशेषमहांसि निहत्य निरुपोपधिः। निराकारोऽपि साकारो निर्वाणमगमत्परम् ॥ १६ ॥ त्रिपृष्ठो निष्ठुरारातिविजयो विजयानुगः। त्रिखण्डाखण्डगोमिन्याः काम कामान्समन्वभत् ॥१६॥ स कदाचित्स्वजामातुः सुतयाऽमिततेजसः। स्वयंवरविधानेन मालामासम्जयद्ले ॥ १६२ ॥ अनेनैव विधानेन सुतारा चानुरागिणी । स्वयं श्रीविजयस्यासीद्वक्षस्थलनिवासिनी ॥ १६३ ॥ इत्यन्योन्यान्वितापत्यसम्बन्धाः सर्वबान्धवाः। स्वच्छाम्भःपूर्णसम्फुल्लसरसः श्रियमभ्ययुः ॥ १६४॥ आयुरन्तेऽवधिस्थानप्राप्त भरतेशिनि । विजयो राज्यमायोज्य सुते श्रीविजये स्वयम् ॥ १६५॥ दत्वा विजयभद्राय यौवराज्यपदं च सः। चक्रिशोकसमाक्रान्तस्वान्तो हन्तुमघद्विषम् ॥ १६६॥ सहस्रः सप्तभिः साई राजभिः संयमं ययौ। सुवर्णकुम्भमभ्येत्य मुनिमभ्यर्णनिर्वृतिः ॥१६७ ॥ घातिकर्माणि निर्मूल्य कैवल्यं चोदपादयत् । अभूनिलिम्पसम्पज्यो व्यपेतागारकेवली ॥ १६८॥ सदाकार्ककीर्तिश्च निधायामिततेजसम् । राज्ये विपुलमत्याख्याचारणादगमत्तपः॥ १६९ ॥ नष्टकर्माष्टकोऽभीष्टामसावापाष्टमी महीम् । अनाप्य नाम किं त्यक्तं व्यक्तमाशावधीरिणाम् ॥१७॥ तयोरविकलप्रीत्या याति काले निराकुलम् । सुखेनामितशब्दादितेजःश्रीविजयाख्ययोः॥ १७॥ फश्चिच्छीविजयाधीश साशीर्वादः कदाचन । उपेत्य राजश्चितं त्वं प्रणिधेहि ममोदिते ॥ १७२ ॥ पोदनाधिपतेर्मूग्नि पतितेऽतोऽहि सप्तमे । महाशनिस्ततश्चिन्त्यः प्रतीकारोऽस्य सत्वरम् ॥१३॥ इत्यब्रवीचदाकये युवराजोऽरुणेक्षणः। वद किं पतिता सर्वविदस्ते मस्तके तदा ॥१७॥ इति नैमित्तिक दृष्टा प्राक्षीत्सोऽप्याह मूनिं मे । रत्नवृष्टिः पतेत्साकमभिषेकेण हीत्यदः ॥ १७५॥ क्रोधादिका त्याग करना, ज्ञानाभ्यास करना और ध्यान करना-इन सब गुणोंको वे प्राप्त हुए थे ॥ १५॥ वे समस्त पापोंका त्याग कर निर्द्वन्द्व हुए। निराकार होकर भी साकार हुए तथा उत्तम निर्वाण पदको प्राप्त हुए ॥१६०॥ इधर विजय बलभद्रका अनुगामी त्रिपृष्ठ कठिन शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता हुआ तीन खण्डकी अखण्ड पृथिवीके भोगोंका इच्छानुसार उपभोग करता रहा ॥ १६१॥ किसी एक दिन त्रिपृष्ठने स्वयंवरकी विधिसे अपनी कन्या ज्योति प्रभाके द्वारा जामाता अमिततेजके गलेमें वरमाला डलवाई ॥ १६२ ॥ अनुरागसे भरी सुतारा भी इसी स्वयंवरकी विधिसे श्रीविजयके वक्षःस्थल पर निवास करनेवाली हुई ।। १६३ ॥ इस प्रकार परस्परमें जिन्होंने अपने पुत्र-पुत्रियोंके सम्बन्ध किये हैं ऐसे ये समस्त परिवारके लोग स्वच्छन्द जलसे भरे हुए प्रफुल्लित सरोवरकी शोभाको प्राप्त हो रहे थे ॥ १६४ ।। आयुके अन्तमें अर्धचक्रवर्ती त्रिपृष्ठ तो सातवें नरक गया और विजय बलभद्र श्रीविजय नामक पुत्रके लिए राज्य देकर तथा विजयभद्रको युवराज बनाकर पापरूपी शत्रुको नष्ट करनेके लिए उद्यत हुए। यद्यपि उनका चित्त नारायणके शोकसे व्याप्त था तथापि निकट समयमें मोक्षगामी होनेसे उन्होंने सुवर्णकुम्भ नामक मुनिराजके पास जाकर सात हजार राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया ।। १६५-१६७ ।। घातिया कर्म नष्ट कर केवलज्ञान उत्पन्न किया और देवों के द्वारा पूज्य अनगारकेवली हुए ॥ १६८ ॥ यह सुनकर अर्ककीर्तिने अमित-तेजको राज्यपर बैठाया और स्वयं विपुलमति नामक चारणमुनिसे तप धारण कर लिया ॥ १६६ ॥ कुछ समय बाद उसने अष्ट कर्मोको नष्ट कर अभिवांछित अष्टम पृथिवी प्राप्त कर ली सो ठीक ही है क्योंकि इस संसारमें जिन्होंने आशाका त्याग कर दिया है उन्हें कौन-सी वस्तु अप्राप्य है ? अर्थात् कुछ भी नहीं॥ १७०।। इधर अमिततेज और श्रीविजय दोनोंमें अखण्ड प्रेम था, दोनोंका काल विना किसी आकुलताके सुखसे व्यतीत हो रहा था ।। १७१॥ किसी दिन कोई एक पुरुष श्रीविजय राजाके पास आया और आशीर्वाद देता हुआ बोला कि हे राजन् ! मेरी बात पर चित्त लगाइये ॥१७२ ।। आज से सातवें दिन पोदनपुरके राजाके मस्तक पर महावन गिरेगा, अतः शीघ्र ही इसके प्रतीकारका विचार कीजिये ॥ १७३ ।। यह सुनकर युवराज कुपित हुआ, उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गई। वह उस निमित्तज्ञानीसे बोला कि यदि तू सर्वज्ञ है तो बता कि उस समय तेरे मस्तक पर क्या पड़ेगा? ॥ १७४॥ निमित्तज्ञानीने भी कहा कि उस समय मेरे मस्तक पर अभि Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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