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________________ १४६ महापुराणे उत्तरपुराणम् अश्वग्रीवश सम्भ्रान्तः समन्त्रं पृष्टवान् पृथक् । शतबिन्दु निमित्तिशं किमेतदिति तत्फलम् ॥ ११५॥ येन सिंहो हतः सिन्धुदेशे रूढपराक्रमः । अहारि प्राभृतं येन त्वां प्रति प्रहितं हठात् ॥ ११६ ॥ रथनूपुरनाथेन भवद्योग्यं प्रदायि च । यस्मै स्त्रीरत्नमेतस्मात्संक्षोभस्ते भविष्यति ॥ ११७ ॥ तत्सूचकमिदं सर्व कुर्वतस्य' प्रतिक्रियाम् । इति नैमित्तिकेनोक्तं कृत्वा हृदि खगाधिपः ॥ ११८ ॥ अरेर्गदस्य चात्मज्ञः प्रादुर्भावनिषेधनम् । विदधाति तस्माभिविस्मृतं सस्मयैर्वृथा ॥ ११९॥ इदानीमप्यसौ दुष्टो युष्माभिरविलम्बितम् । विषाङ्करवदुच्छेद्य इत्यवादीत्स्वमन्त्रिणः ॥ १२० ॥ तेऽपि तत्सर्वमन्विष्य स्वगूढग्रहितैश्चरैः। नैमितिकोक्तं निश्चित्य तस्य सिंहवधादिकम् ॥ १२ ॥ त्रिपृष्ठो नाम दष्ठिः प्रजापतिसुतः क्षितौ । विश्वक्षितीशानाक्रम्य विक्रमाद्विजिगीषते ॥ १२२ ॥ परीक्षितव्यः सोऽस्मासु कीदृश इति दक्षिणैः । दूतैरिति खगाधीशमवोचन्मन्त्रिणः पृथक् ॥ १२३ ॥ तदाकर्ण्य तदैवासौ चिन्तागतिमनोगती । दूतौ सम्प्रेषयामास त्रिपृष्ठं प्रति विद्वरौ ॥ १२४ ॥ गत्वा तौ स्वागतिं पूर्व निवेद्यानुमतौ नृपम् । दृष्ट्वा यथोचितं दत्वा प्राभृतं विनयान्वितौ ।। १२५॥ अश्वग्रीवेण देवेन त्वमवाज्ञापितोऽस्यहम् । रथावर्ताद्रिमेष्यामि तमायातु भवानिति ॥ १२६ ॥ आवां त्वामागतौ नेतुमाज्ञामारोप्य मस्तकम् । आगन्तव्यं त्वयेत्युच्चैरूचतुः सोऽपि कोपवान् ॥ १२७ ॥ अश्वग्रीवाः खरग्रीवाः क्रौञ्चग्रीवास्तथापरे । दृष्टाः क्रमेलकग्रीवा नापूर्वो नः स पश्यताम् ॥ १२८ ॥ इत्याह तौ च किं युक्तमवमन्तुं खगेश्वरम् । विश्वरूपसमभ्ययं तं भवत्पक्षपातिनम् ॥ १२९ ॥ आठवाँ भाग बाकी रहने पर नई नई बातोंको देखकर भोगभूमिके लोग भयभीत होते हैं उसी प्रकार उन अभूतपूर्व उत्पातोंको देखकर वहांके मनुष्य सहसा भयभीत होने लगे ॥११४ ॥ अश्वग्रीव भी घबड़ा गया। उसने सलाह कर एकान्तमें शतबिन्दु नामक निमित्तज्ञानीसे 'यह क्या है ?? इन शब्दों द्वारा उनका फल पूछा ।। ११५ ॥ शतबिन्दुने कहा कि जिसने सिन्धु देशमें पराक्रमी सिंह मारा है, जिसने तुम्हारे प्रति भेजी हुई भेंट जबर्दस्ती छीन ली और रथनूपुर नगरके राजा ज्वलनजटीने जिसके लिए आपके योग्य स्त्रीरत्न दे दिया है उससे आपको क्षोभहोगा ॥११६-११॥ये सब उत्पात उसीके सूचक हैं। तुम इसका प्रतिकार करो। इस प्रकार निमित्तज्ञानीके द्वारा कही बातको हृदयमें रखकर अश्वग्रीव अपने मन्त्रियोंसे कहने लगा कि आत्मज्ञानी मनुष्य शत्रु और रोगको उत्पन्न होते ही नष्ट कर देते हैं परन्तु हमने व्यर्थ ही अहंकारी रहकर यह बात भुला दी ११८-११६ ॥ अब भी यह दृष्ट आप लोगोंके द्वारा विषके अंकुरके समान शीघ्र ही छेदन कर देनेके योग्य है॥ १२०।। उन मन्त्रियोंने भी गुप्त रूपसे भेजे हुए दूतोंके द्वारा उन सबकी खोज लगा ली और निमित्तज्ञानीने जिन सिंहवध आदिकी बातें कही थीं उन सबका पता चला कर निश्चय कर लिया कि इस पृथिवी पर प्रजापतिका पुत्र त्रिपृष्ठ ही बड़ा अहंकारी है। वह अपने पराक्रमसे सब राजाओं पर आक्रमणकर उन्हें जीतना चाहता है ।। १२१-१२२ ।। वह हम लोगोंके विषयमें कैसा है ?-अनुकूल प्रतिकूल कैसे विचार रखता है इस प्रकार सरल चित्त-निष्कपट दूत भेजकर उसकी परीक्षा करनी चाहिये। मन्त्रियोंने ऐसा पृथक-पृथक राजासे कहा ।। १२३ ।। उसी समय उसने उक्त बात सुनकर चिन्तागति और मनोगति नामके दो विद्वान् दूत त्रिपृष्ठके पास भेजे ।। १२४ ॥ उन दूतोंने जाकर पहले अपने आनेकी राजाके लिए सूचना दी, फिर राजाके दर्शन किये, अनन्तर विनयसे नम्रीभूत होकर यथा योग्य भेंट दी ।। १२५॥ फिर कहने लगे कि राजा अश्वग्रीवने आज तुम्हें आज्ञा दी है कि मैं रथावर्त नामके पर्वत पर जाता हूँ आप भी आइये ।। १२६ ।। हम दोनों तुम्हें लेनेके लिए आये हैं। आपको उसकी आज्ञा मस्तक पर रखकर आना चाहिये। ऐसा उन दोनोंने जोरसे कहा। यह सुनकर त्रिपृष्ठ बहुत क्रद्ध हुआ और कहने लगा कि अश्वग्रीव (घोड़े जैसी गर्दनवाले) खरग्रीव, (गधे जैसी गर्दन वाले) क्रौञ्चग्रीव (क्रौञ्च पक्षी जैसीगर्दन वाले ) और क्रमेलक ग्रीव (ऊँट जैसी गर्दनवाले ) ये सब मैंने देखे हैं। हमारे लिए वह अपूर्व आदमी नहीं जिससे कि देखा जावे ॥१२७-१२८।। जब वह त्रिपृष्ठ कह चुका तब दूतोंने फिरसे कहा कि वह अश्वग्रीव सब विद्याधरोंका स्वामी है, सबके १ कुरु एतस्य । २ तः ल० । अस्माकम । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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