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________________ अष्टपश्चाशत्तमं पर्व मालिनी सदसदुभयमेतेनैकशब्देन वाच्ये त्रितयमपि पृथक्तत्तुर्यभङ्गेन युज्यात् । इति सकलपदार्थासप्तभङ्गी त्वयोक्ता कथमवितथवाक्त्वं वासुपूज्यो म पूज्यः ॥ ५६ ॥ वसन्ततिलका धर्मो दया कथमसौ सपरिग्रहस्य वृष्टिर्धरातलहिता किमवग्रहेऽस्ति । तस्मात्त्वया द्वयपरिग्रहमुक्तिरुक्ता तद्वासनासुमहितो जिन वासुपूज्यः ॥ ५५ ॥ पनोचरः प्रथमजन्मनि पार्थिवेशः शुक्र महत्यमरषट्पदपद्मपादः। यो वासुपूज्ययुवराट् त्रिजगत्प्रपूज्यः राज्ये जिनः स दिशतादतुलं सुखं वः ॥ ५८ ॥ अनुष्टुप् तीर्थे श्रीवासुपूज्यस्य द्विपृष्ठो नाम भूपतिः। त्रिखण्डाधिपतिर्जातो द्वितीयः सोऽर्द्धचक्रिणाम् ॥ ५९॥ वृत्तकं तस्य वक्ष्यामो जन्मत्रयसमाश्रितम् । श्रुतेन येन भव्यानां भवेद् भूयो भवाद्यम् ॥ ६०॥ द्वीपेऽस्मिन् भारते वर्षे कनकादिपुराधिपः । सुषेणो नाम तस्यासीनर्तकी गुणमञ्जरी ॥ ६१ ॥ रूपिणी 'सुभगानृत्यगीतवाद्यादिविश्रुता । सरस्वती द्वितीयेव सर्वभूपाभिवान्छिता ॥ १२ ॥ अस्ति तत्रैव देशोऽन्यो मलयाख्यो मनोहरः । विन्ध्यशक्तिः पतिस्तस्य नृपो विन्ध्यपुरे वसन् ॥ ६३ ॥ पदार्थ कथंचित् सत् है, कथंचित् असत् है, कथंचित् सत्-असत् उभयरूप है, कचित् अवक्तव्य है, कथंचित् सत् अवक्तव्य है, कथंचित् असत् अवक्तव्य है, और कथंचित् सदसद्वक्तव्य है. इस प्रकार हे भगवन् , आपने प्रत्येक पदाथके प्रति सप्तभङ्गीका निरूपण किया है और इसीलिए आप सत्यवादी रूपसे प्रसिद्ध हैं फिर हे वासुपूज्य देव ! आप पूज्य क्यों न हों ? अवश्य हों ।। ५६ ।। धर्म दया रूप है, परन्तु वह दयारूप धर्म परिग्रह सहित पुरुषके कैसे हो सकता है ? वर्षा पृथिवीतलका कल्याण करनेवाली है परन्तु प्रतिबन्धके रहते हुए कैसे हो सकती है ? इसीलिए आपने अन्तरङ-बहिरङ-दोनों परिग्रहोंके त्यागका उपदेश दिया है। हे वासुपूज्य जिनेन्द्र ! आप इसी परिग्रह-त्यागकी वासनासे पूजित हैं ।। ५७ ।। जो पहले जन्ममें पद्मोत्तर राजा हुए, फिर महाशुक्र स्वर्गमें इन्द्र हुए, वह इन्द्र, जिनके कि चरण, देवरूपी भ्रमरोंके लिए कमलके समान थे और फिर त्रिजगत्पूज्य वासुपूज्य जिनेन्द्र हुए, वह जिनेन्द्र, जिन्होंने कि बालब्रह्मचारी रह कर ही राज्य किया था, वे बारहवें तीर्थकर तुम सबके लिए अतुल्य सुख प्रदान करें ॥५॥ अथानन्तर-श्री वासुपूज्य स्वामीकेतीर्थमें द्विपृष्ठ नामका राजा हुआ जो तीन खण्डका स्वामी था और दूसरा अर्धचक्री (नारायण ) था ॥५६॥ यहाँ उसका तीन जन्म सम्बन्धी चरित्र कहता हूँ जिसके सुननेसे भव्य-जीवोंको संसारसे बहुत भारी भय उत्पन्न होगा ॥६०॥ इसी जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें एक कनकपुर नामका नगर है। उसके राजाका नाम सुषेण था। सुषेणके एक गुणमंजरी नामकी नृत्यकारिणी थी॥६१ ॥ वह नृत्यकारिणी रूपवती थी, सौभाग्यवती थी, गीत नृत्य तथा बाजे बजाने आदि कलाओंमें प्रसिद्ध थी, और दूसरी सरस्वतीके समान जान पड़ती थी, इसीलिए सब राजा उसे चाहते थे॥ ६२॥ उसी भरतक्षेत्रमें एक मलय नामका मनोहर देश था, उसके विन्ध्य १ सुभमागीतकृत्य ख। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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