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________________ षट्पञ्चाशत्तमं पर्व ७३ प्रविशन्तं गजं चास्ये भूपतेस्तत्फलाम्यवैत्' । तदाद्याषाठनक्षत्रे कृष्णाष्टम्यां दिवश्च्युतः ॥ २६ ॥ चैत्रे स देवः स्वर्गाप्रात् गुणैः सद्वृत्ततादिभिः । भावी शुक्तिपुटे तस्या वार्बिन्दुर्वोदरेऽभवत् ॥ २७ ॥ आदिकल्याणसत्पूजां प्रीत्यैत्य विदधुः सुराः । द्वादश्यामसिते माघे विश्वयोगेऽजनि क्रमात् ॥ २८ ॥ तदैवागत्य तं नीत्वा २ महामेरुं महोत्सवाः । देवा महाभिषेकान्ते व्याहरन्ति स्म शीतलम् ॥ २९ ॥ नवकोव्यब्धिमानोक्तपुष्पदन्तान्तरान्तिमे । पल्योपमचतुर्भागे म्युच्छिले धर्मकर्मणि ॥ ३० ॥ तदभ्यन्तरवर्थ्यायुरुत्पन्नः कनकच्छविः । खपञ्चकैकपूर्वायुर्धनुर्नवतिविग्रहः ॥ ३१ ॥ गते स्वायुश्चतुर्भागे कौमारे स्वपितुः पदम् । प्राप्य प्रधानसिद्धिं व पालयामास स प्रजाः ॥ ३२ ॥ गत्यादिशुभनामानि सद्वेद्यं गोत्रमुत्तमम् । आयुस्तीर्थकरोपेतमपवर्तविवर्जितम् ॥ ३३ ॥ सर्वाण्येतानि सम्भूय स्वोत्कृष्टानुभवोदयात् । सुखदानि ततस्तस्य सुखं केनोपमीयते ॥ ३४ ॥ स्वायुश्वतुर्थभागावशेषे हासितसंसृतिम् । प्रत्याख्यानकषायोदयावसाने प्रतिष्टितम् ॥ ३५ ॥ तं कदाचिद्विहारार्थं वनं यातं महौजसम् । हिमानीपटल सद्यः प्रच्छाद्य विलयं गतः ॥ ३६ ॥ स तद्धेतुसमुद्भूतबोधिरित्थमचिन्तयत् । क्षणं प्रत्यर्थपर्यायैरिदं विश्वं विनश्वरम् ॥ ३७ ॥ दुःखदुःखिनिमित्ताख्यत्रितयं निश्चितं मया । सुखादित्रयविज्ञानमेतन्मोहानुबन्धजात् ॥ ३८ ॥ अहं किल सुखी सौख्यमेतत् किल पुनः सुखम् । पुण्यात्किल महामोहः काललब्ध्या विनाभवत् ॥ ३९ ॥ घर भर दिया । मानवती सुनन्दाने भी रात्रि के अन्तिम भागमें सोलह स्वप्न देखकर अपने मुखमें - प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा । प्रातःकाल राजासे उनका फल ज्ञात किया और उसी समय चैत्रकृष्ण अष्टमी के दिन पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में सद्वृत्तता - सदाचार आदि गुणोंसे उपलक्षित वह देव स्वर्गसे च्युत होकर रानीके उदरमें उस प्रकार अवतीर्ण हुआ जिस प्रकार कि सद्वृत्तता — गोलाई आदि गुणोंसे उपलक्षित जलकी बूँद शुक्तिके उदरमें अवतीर्ण होती है ।। २२-२७ ।। देवोंने आकर बड़े प्रेमसे प्रथम कल्याणककी पूजा की। क्रम-क्रम से नव माह व्यतीत होनेपर माघकृष्ण द्वादशीके दिन विश्वयोगमें पुत्र जन्म हुआ ॥ २८ ॥ उसी समय बहुत भारी उत्सवसे भरे देव लोग आकर उस बालकको सुमेरु पर्वत पर ले गये । वहाँ उन्होंने उसका महाभिषेक किया और शीतलनाथ नाम रक्खा ||२६|| भगवान् पुष्पदन्तके मोक्ष चले जानेके बाद नौ करोड़ सागरका अन्तर बीत जानेपर भगवान् शीतलनाथका जन्म हुआ था। उनकी आयु भी इसी में सम्मिलित थी । उनके जन्म लेनेके पहले पल्यके चौथाई भाग तक धर्म-कर्मका विच्छेद रहा था । भगवान् के शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी, आयु एक लाख पूर्वकी थी और शरीर नब्बे धनुष ऊँचा था ।। ३०-३१ ॥ जब आयुके चतुर्थभाग के प्रमाण कुमारकाल व्यतीत हो गया तब उन्होंने अपने पिताका पद प्राप्त किया तथा प्रधान सिद्धि प्राप्त कर प्रजाका पालन किया || ३२ || गति आदि शुभ नामकर्म, साता वेदनीय, उत्तम गोत्र और अपघात मरणसे रहित तथा तीर्थकर नामकर्मसे सहित आयु-कर्म ये सभी मिलकर उत्कृष्ट अनुभाग-बन्धका उदय होनेसे उनके लिए सब प्रकारके सुख प्रदान करते थे अतः उनके सुखकी उपमा किसके साथ दी जा सकती है ? ॥। ३३ - ३४ ॥ इस प्रकार जब उनकी आयुका चतुर्थ भाग शेष रह गया, तथा संसार भ्रमण अत्यन्त अल्प रह गया तब उनके प्रत्याख्यानावरण कषायका अन्त हो गया। महातेजस्वी भगवान् शीतलनाथ किसी समय विहार करनेके लिए वनमें गये । वहाँ उन्होंने देखा कि पालेका समूह जो क्षण भर पहले समस्त पदार्थोंको ढके हुए था शीघ्र ही नष्ट हो गया है। ।। ३५-३६ ।। इस प्रकरणसे उन्हें आत्म-ज्ञान उत्पन्न हो गया और वे इस प्रकार विचार करने लगे कि प्रत्येक पदार्थ क्षण-क्षण भरमें बदलते रहते हैं उन्हींसे यह सारा संसार विनश्वर है ॥ ३७ ॥ श्राज मैंने दुःख, दुःखी और दुःखके निमित्त इन तीनोंका निश्चय कर लिया। मोहके अनुबन्धसे मैं इन तीनोंको सुख, सुखी और सुखका निमित्त समझता रहा ॥ ३८ ॥ 'मैं सुखी हूँ, यह सुख है और यह सुख पुण्योदयसे फिर भी मुझे मिलेगा' यह बड़ा भारी मोह है जो कि काललब्धिके बिना हो रहा १ न्यौत् ( १ ) ल० | २ महामेरु ल० १० Jain Education International । ३ संसृतिः ल० । ४ प्रलयं ल० । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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