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________________ ८४ महापुराणम् (त्रिकूट'मलयोत्सङगे गिरौ पाण्डयकवाटके । जगरस्य यशो मन्द्रमर्छनाः किन्नराडगनाः ॥२६॥ र मलयोपान्तकान्तारे सह्याचलवनेषु च । यशो वने चरस्त्रीभिः उज्जगेऽस्य जयाजितम् ॥२७॥ चन्दनोद्यानमाधुय मन्दं गन्धवहो ववौ । मलयाचलकुञ्जभ्यो हरनिर्भरशीकरान् ॥२८॥) विष्वग्विसारी दाक्षिण्यं समुज्झन्नपि सोऽनिलः । सम्भावयन्निवातिथ्यः विभोः श्रममपाहरत् ॥२६॥ एलालवङगसंवाससुरभिश्वसितैर्मुखैः। स्तनैरापाण्डुभिः सान्द्रचन्दनद्रवचितैः ॥३०॥ सलीलमदुभिर्या ते नितम्बभरमन्थरैः । स्मितैरनङगपुष्पास्त्रस्तबकोभेदविभमैः ॥३१॥ कोकिलालापमधुरैः ज्वलित (जल्पित) रनतिस्फुटः । मदुबाहुलतान्दोलसुभगश्च विचेष्टितः ॥३२॥ लास्यैः स्खलत्पदन्यासः मुक्ताप्रायविभूषणः । मदमञ्जुभिरुद्गीतैः जितालिकुलशिञ्जितः ॥३३॥ ( तमालवनवीथीष सञ्चरन्त्यो यदृच्छया। मनोऽस्य जहरारूढयौवनाः केरल स्त्रियः ॥३४॥ प्रसाध्य दक्षिणामाशां विभुस्त्रैराज्यपालकान् । समं प्रणमयामास विजित्य जयसाधनैः ॥३॥ कण्ठसे महाराज भरतका यश गा रही थीं ॥२५॥ त्रिकट पर्वतपर, मलय गिरिके मध्यभाग पर और पाण्डयकवाटक नामके पर्वतपर किन्नर जातिकी देवियाँ गंभीर स्वरसे चक्रवर्ती का यश गा रही थीं ॥२६।। इसी प्रकार मलय गिरिके समीपवर्ती वनमें और सह्य पर्वतके वनोंमें भीलोंकी स्त्रियां विजयसे उत्पन्न हुआ महाराजका यश जोर जोरसे गा रहीं थीं ॥२७॥ उस समय मलय गिरिके लतागृहोंसे झरनोंके जलके छोटे छोटे कण हरण करता हुआ तथा चन्दनके बगीचेको हिलाता हुआ वायु धीरे धीरे वह रहा था ।।२८। वह वायु दक्षिण दिशा को छोड़कर चारों ओर बह रहा था और ऐसा जान पड़ता था मानो अतिथि-सत्कारके द्वारा भरतका सन्मान करता हुआ ही उनका परिश्रम दूर कर रहा था। भावार्थ---इस श्लोकमें दाक्षिण्य शब्दके श्लेष तथा अपि शब्दके सन्निधानसे नीचे लिखा हुआ विरोध प्रकट होता है'वह वायु यद्यपि दाक्षिण्य (स्वामीके इच्छानुसार प्रवृत्ति करना) भावको छोड़कर स्वच्छन्दता पूर्वक चारों ओर घूम रहा था तथापि उसने एक आज्ञाकारी सेवककी तरह भरतका अतिथिसत्कार कर उनका सव परिश्रम दूर कर दिया था, जो स्वामीके विरुद्ध आचरण करता है वह उसकी सेवा क्यों करेगा? यह विरोध है परन्तु दाक्षिण्य शब्दका दक्षिण दिशा अर्थ लेनेसे वह विरोध दूर हो जाता है ('दक्षिणो दक्षिणोद्भूतसरलच्छन्दवतिषु' इति मेदिनी दक्षिणस्य भावो दाक्षिण्यम्, पक्षे दक्षिणैव दाक्षिण्यम् ) ।।२९।। तमाल वृक्षोंके वनकी गलियोंमें इच्छानुसार इधर-उधर घूमती हुई केरल देशकी तरुण स्त्रियाँ इलायची, लौंग आदि सुगन्धित वस्तुओंके सम्बन्धसे जिनके निःश्वास सुगन्धित हो रहे हैं ऐसे मुखोंसे, जो घिसे हुए चन्दनके गाढ़ लेपसे सुशोभित हो रहें हैं ऐसे स्तनोंसे, नितम्बोंके भारके साथ ईर्ष्या करनेवाले लीलासहित सुकोमल गमनसे, जो कामदेवके पुष्परूपी शस्त्रोंके गुच्छोंके खिलनेके समान सुशोभित हो रहे हैं ऐसे मन्द हास्यसे, कोयलकी कूकके समान मनोहर तथा अव्यक्त वाणीसे, सुकोमल बाहुरूपी लताओंके इधर उधर फिरानेसे सुन्दर चेष्टाओंसे, जिसमें स्खलित होते हुए पैर पड़ रहे हैं ऐसे नृत्योंसे, अधिकतर मोतियोंके बने हुए आभूषणोंसे, भूमरसमूहकी गुंजारको जीतनेवाले मदसे मनोहर उत्कृष्ट गीतोंसे चक्रवर्ती भरतका मन हरण कर रही थीं ॥३०-३४।। इस प्रकार महाराज भरतने अपनी विजयी सेनाके द्वारा दक्षिण दिशाको वश कर चोल, केरल और पाण्डच १ त्रिकुटे म०, द०, ल., अ०, प०, स० । त्रिकूटगिरिमलयाचलसानौ। २ वनचर-ल । ३ विसरणशीलः । ४ दक्षिणदिग्भागः । आनुकूल्येन च। ५ अतिथी साधुभिः उपचारैरित्यर्थः । ६ उच्छ्वासैः । ७ गमनैः। ८ मन्दैः । जल्पितः वचनैः । १० सिजनै: अ०, ५०, ब०, स० । ११ विराज्येषु जातान् । चोरकेरलपाण्डयान् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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