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________________ महापुराणम् द्वारा विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ किया । क्रमशः चलते हुए विजया राजा उनके साथ थे। पुरोहितके द्वारा पर्वतकी उपत्यकामें पहुँचे। वहां वे अपनी कैलास पर्वतका वर्णन । १३१-१३६ समस्त सेना ठहराकर निश्चिन्त हुए। समवशरणका संक्षिप्त वर्णन । १३७-१४० पता चलनेपर विजयार्धदेव अपने समस्त समवसरणमें स्थित श्री ऋषभ जिनेन्द्र परिकरके साथ इनके पास आया और का वर्णन । सम्राटके द्वारा भगवान्की स्तुति उनका प्राज्ञाकारी हुआ। विजयार्धको का वर्णन । १४१-१५० जीत लेनेसे इनकी दिग्विजयका अर्धभाग चतुस्त्रिशत्तम पर्व पूर्ण हो गया। अनन्तर उन्होंने उत्तरभारत कैलाससे उतरकर अयोध्या नगरीकी में प्रवेश करनेके अभिप्रायसे दण्डरत्न द्वारा ओर प्रस्थान । चक्ररत्न अयोध्या नगरीविजया पर्वतके गुहाद्वारका उद्घाटन के द्वारपर पाकर रुक गया, जिससे सबको किया। ६६-१११ प्राश्चर्य हश्रा । चक्रवर्ती स्वयं सोच-विचार द्वात्रिंशत्तम पर्व में पड़ गए। निमित्तज्ञानी पुरोहितने गर्मी शान्त होनेपर उन्होंने गुहाके बतलाया कि अभी आपके भाइयोंको वश मध्यमें प्रवेश किया। काकिणी रत्नके करना बाकी है। पुरोहितकी सम्मतिके द्वारा मार्गमें प्रकाश होता जाता था। अनुसार राजदूत भाइयों के पास भेजे गये। बीचमें उन्मग्नजला तथा निमग्नजला नाम उन्होंने भरतकी प्राज्ञामें रहना स्वीकार की नदियां मिलीं, उनके लटपर सेनाका नहीं किया और श्री ऋषभनाथ स्वामीके विश्राम हुअा। स्थपतिरत्नने अपने बुद्धि पास जाकर दीक्षा ले ली। १५१-१७१ बलसे पुल तैयार किया जिससे समस्त पञ्चत्रिंशत्तम पर्व सेना उस पार हुई। गुहागर्भसे निकलकर सब भाई तो दीक्षित हो चुके, परन्तु सेना सहित भरत उत्तर भरत-क्षेत्र में पहुंचे। बाहुबली राजदूतकी बात सुनकर क्षुभित चिलात और पावर्त नामके राजा बहुत हो उठे। उन्होंने कहा कि जब पिताजीने कुपित हुए। वे परस्परमें मिलकर चक्रवर्तीसे सबको समान रूपसे राजपद दिया है, तब युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए । नाग जाति एक सम्राट् हो और दूसरा उसके अधीन के देवोंकी सहायतासे उन दोनोंने चक्रवर्ती रहे यह संभव नहीं। उन्होंने दूतको फटकी सेनापर घनघोर वर्षा की जिससे ७ दिन कारकर वापिस कर दिया। अन्तमें दोनों तक चक्रवर्तीकी सेना चर्मरत्नके बीच में पोरसे युद्धकी तैयारियाँ हुई। १७२-१९६ नियन्त्रित रही। अनन्तर जयकुमारके त्रिंशत्तम पर्व प्राग्नेय बाणसे नाग जातिके देव भाग खड़े युद्धके लिए इस पोरसे भरतकी सेना हुए। और अब उपद्रव शान्त हुआ। आगे बढ़ी और उस पोरसे बाहुबलीकी चिलात और पावर्त दोनों ही म्लेच्छ राजा सेना आगे आई। बुद्धिमान् मंत्रियोंने निरुपाय होकर शरणमें पाये। क्रमशः विचार किया कि इस भाई-भाईकी लड़ाईभरतने उत्तरभरतके समस्त म्लेच्छ में सेनाका व्यर्थ ही संहार होगा। इसलिए खण्डोंपर विजय प्राप्त की। ११२-१३० अच्छा हो कि स्वयं ये दोनों भाई ही लड़ें। प्रयस्त्रिशत्तम पर्व सबने मिलकर नेत्रयुद्ध, जलयुद्ध और दिग्विजय करनेके बाद चक्रवर्ती सेना मल्लयुद्ध, ये तीन युद्ध निश्चित किये। सहित अपनी नगरीके प्रति वापिस लौटे। तीनों ही युद्धोंमें जब बाहबली विजयी मार्गमें अनेक देश, नदियों और पर्वतोंको हुए तब भरतने कुपित होकर चकरत्न उल्लंघन करते हुए कैलास पर्वतके समीप चला दिया, परन्तु उससे बाहुबलीकी कुछ पाए। वहांसे श्री ऋषम जिनेन्द्रकी पूजा भी हानि नहीं हुई। बाहुबली चक्रवर्तीके करनेके लिए कैलास पर्वतपर गए। अनेक इस व्यवहारसे बहुत ही विरक्त हुए और Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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