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________________ ४२६ महापुराणम् पुत्रबन्धुपदातीनाम् अपराधशतान्यपि । क्षमन्ते हि महात्मानस्तद्धि तेषां विभूषणम् ॥१२॥ भवेडेवादपि स्वामिन्यपराधविधायिनाम् । प्राकल्पमयशः पापं चानुबन्धनिबन्धनम् ॥१३॥ अपराधः कृतोऽस्माभिरेकोऽयमविवेकिभिः। वयं वो बन्धुभत्यास्त कुमार क्षन्तुमर्हसि ॥१४॥ एषा कीतिरघं चैतत् प्रसादात्ते प्रशाम्यति । शापान ग्रहयोः शक्तस्त्वं विशुद्धि विधेहि नः ॥१५॥ प्रणालोकनारोधि हन्यते जगतस्तमः । अस्माकं स भवानर्कस्तस्मादन्तस्तमो हरेत् ॥१६॥ प्रातिकूल्यं तवास्मासु स्तन्यस्येव स्तनन्धये । अस्मज्जन्मान्तरा वृष्टपरिपाकविशेषतः ॥१७॥ विश्वविश्वम्भराह्लादी यदि क्षिपति वारिदः। कदाऽज्यशनिमेक स्मिस्तत्तस्यैवाशुभोदयः ॥१८॥ हयेनेव दुरारोहाज्जयेनहासि पातितः। 'स ते प्रेष्यः किमत्रास्ति वैमनस्यस्य कारणम् ॥१६॥ सुलोचनेति का वार्ता सर्वस्वं नस्तवैव तत् । निषिद्धश्चेत्त्वया पूर्व क्रियते कि स्वयंवरः ॥२०॥ लक्ष्मीवती गहाणेमाम् अक्षमालापराभिधाम् । निर्मलां वा यशोमालां कि ते पाषाणमालया ॥२१॥ वंश दोनों ही आपके द्वारा बनाये गये हैं और आपके द्वारा ही बढ़ रहे हैं । विषका वृक्ष भी जिससे उत्पन्न होता है उससे फिर नाशको प्राप्त नहीं होता ॥११॥ महात्मा लोग पुत्र, बन्धु तथा पियादे लोगोंके सैकड़ों अपराध क्षमा कर देते हैं क्योंकि उनकी शोभा इसीमें है ॥१२॥ औरोंकी बात जाने दीजिये जो देवके भी अधीन होकर स्वामीका अपराध करते हैं उनका अपयश कल्पान्त कालतक बना रहता है और उनका यह पाप भी अनेक दोषोंका बढ़ानेवाला होता है ।।१३।। हम मूोंने आपका यह एक अपराध किया है। चूंकि हम लोग आपके भाइयों और भृत्यों में से हैं इसलिये हे कुमार, यह अपराध क्षमा कर देने योग्य है ॥१४॥ यह हमारी अपकीर्ति और पाप आपके प्रसादसे शान्त हो सकता है क्योंकि आप शाप देने तथा उपकार करने-दोनोंमें समर्थ हैं इसलिये हम लोगोंकी शुद्धता अवश्य कर दीजिये ॥१५।। प्रकाशको रोकनेवाला संसारका अन्धकार सूर्य के द्वारा नष्ट किया जाता है परन्तु हमारे लिये तो आप ही सूर्य हैं इसलिये हमारे अन्तःकरणके अन्धकारको आप ही नष्ट कर सकते हैं ॥१६॥ पूर्वजन्मके पाप कर्मोंके विशेष उदयसे हम लोगोंके लिये जो आपका यह विरोध उपस्थित हुआ है वह मानो पुत्रके लिये माताके दूधका विरोध उपस्थित हुआ है। भावार्थ-जिस प्रकार माताके दूधके बिना पुत्र नहीं जीवित रह सकता है उसी प्रकार आपकी अनुकूलताके बिना हम लोग जीवित नहीं रह सकते हैं ॥१७॥ समस्त पृथिवीको आनन्दित करनेवाला बादल यदि कदाचित् किसी एकपर वज्र पटक देता है तो इसमें बादलका दोष नहीं है किन्तु जिसपर पड़ा है उसीके अशुभ कर्मका उदय होता है ।।१८॥ चढ़ना कठिन होनेसे जिस प्रकार घोड़ा किसीको गिरा देता है उसी प्रकार जयकुमारने आपको गिरा दिया है परन्तु वह तो आपका सेवक है इसमें बुरा माननेका कारण ही क्या है ? ॥१९॥ सुलोचना, यह कितनी सी बात है ? हमारा जो सर्वस्व है वह आपका ही है। यदि आप पहले ही रोक देते तो स्वयंवर ही क्यों किया जाता ? ॥२०॥ जिसका दूसरा नाम अक्षमाला है ऐसी मेरी दूसरी पुत्री लक्ष्मीमतीको आप ग्रहण कीजिये। यह लक्ष्मीमती यशकी मालाके समान निर्मल है, पाषाण (रत्नों) की मालासे आपको क्या प्रयो १ अलब्धलाभः लब्धपरिरक्षणं रक्षितविवर्द्धनं चेत्यनुबन्धः ते एव निबन्धनं कारणं यस्य । २ युष्माकम् । ३ तत् कारणात् । ते द० । ४ स्तनक्षीरस्य । ५ शिशी। यथा स्तनक्षीरस्य प्रातिकूल्यं शिशोर्जीवनाय न स्यात् तथा तव प्रातिकूल्यमपि अस्माकम् । ६ अशुभकर्म । ७ एकस्मिन् पुंसि । ८ जयः । ६ तव किङ्करः । १० स्वयंवरे क्षिप्तपाषाणमालया। सुलोचनयाक्षिप्तरत्नमालया। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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