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________________ ४०८ महापुराणम् जयोऽपि सुचिरात्प्राप्त प्रतिपक्षो व्यदीप्यलम् ।लब्धव र धनं वह्निः उत्साहाग्निसखोच्छितः ॥२२१॥ सदोभयबलख्यातगजादिशिखरस्थिताः। योद्धमारेभिरे राजराजसिंहाः परस्परम् ॥२२२॥ अन्योन्यरवनोदभिन्नौ तत्र कौचिद् व्यस' गजौ। चिरं परस्पराधारौ पायातां यमलाद्रिवत् ॥ समन्ततः शरैश्च्छना रेजराजौ गजाधिपाः। क्षुद्रवेणुगणाकीर्णसञ्चरद गिरिसनिभाः ॥२२४॥ दानिनो मानिनस्तुङगाः 'कामवन्तोऽन्तकोपमाः। महान्तः सर्वसत्त्वेभ्यो न यद्धचन्तां कथं गजाः।२२५॥ मृगर्म गरिवापात मात्रभग्नर्भयाद् द्विपैः । स्वसैन्यमेव सडक्षुण्णं धिक् स्थौल्यं भीतचेतसाम् ॥२२६॥ निःशक्तीन शक्तिभिः५ शक्ता:१६ १"शक्तांश्चक्रुरशक्तकान् । "शक्तियुक्तानशक्तांश्च निःशक्तीन दिग्धिगूनताम्० ॥२२७॥ शस्त्रनिभिन्नसडिगा निमीलितविलोचनाः। सम्यक संहतसंरम्भाः सम्भावितपराक्रमाः ॥२२८।। बुद्ध्यवर बद्धपल्यडकास्त्यक्तसर्वपरिच्छदाः । समत्याक्षरसंच्छ रा" निधाय हृदयेऽर्हतः ॥२२६॥ जयकुमारको रोकने लगे ॥२२०॥ जिस प्रकार बहुतसे इन्धनको पाकर वायुसे उद्दीपित हुई अग्नि देदीप्यमान हो उठती है उसी प्रकार उत्साहरूपी वायसे बढ़ा हआ वह जयकुमार भी बहत देर में शत्रको पाकर अत्यन्त देदीप्यमान हो रहा था ॥२२॥ उस समय दोनों से में प्रसिद्ध हाथीरूपी पर्वतोंकी शिखरपर बैठे हुए अनेक राजारूपी सिंहोंने भी परस्पर युद्ध करना प्रारम्भ कर दिया था ॥२२२॥ उस युद्ध में एक दूसरेके दांतोंके प्रहारसे विदीर्ण होकर मरे हुए कोई दो हाथी मिले हुए दो पर्वतोंके समान एक दूसरेके आधारपर ही चिरकाल तक खड़े रहे थे ॥२२३॥ चारों ओरसे बाणोंसे ढके हुए बड़े बड़े हाथी उस युद्ध में छोटे छोटे बांसों से व्याप्त और चलते हुए पर्वतों के समान सुशोभित हो रहे थे ॥२२४॥ जो दानी है-जिनसे मद कर रहा है, मानी हैं, ऊंचे हैं, यमराजके समान हैं और सब जीवोंसे बड़े हैं ऐसे भद्र जातिके हाथी भला क्यों न युद्ध करते ? ॥२२५।। जिस प्रकार हरिण भयभीत होकर भागते हैं उसी प्रकार मृगजातिके हाथी भी प्रारम्भमें ही पराजित होकर भयसे भागने लगे थे और उससे उन्होंने अपनी ही सेनाका चूर्ण कर दिया था इससे कहना पड़ता है कि भीरु हृदयवाले मनुष्यों के स्थूलपनको धिक्कार हो ॥२२६॥ शक्तिशाली (सामर्थ्यवान्) योद्धा अपने शक्ति नामक शस्त्रसे, जिनके पास शक्ति नामक शस्त्र नहीं है ऐसे शक्तिशाली (सामर्थ्यवान्) योद्धाओंको शक्तिरहित-सामर्थ्य हीन कर रहे थे और जिनके पास शक्ति नामक शस्त्र था किन्तु स्वयं अशक्त-सामर्थ्य रहित थे उन्हें भी शक्तिरहित-शक्ति नामक शस्त्रसे रहित कर रहे थे-उनका शस्त्र छुड़ा रहे थे इसलिये आचार्य कहते हैं कि ऊनता अर्थात् आवश्यक सामग्रीकी कमीको धिक्कार हो ॥२२७॥ जिनके समस्त अंग शस्त्रोंसे छिन्न भिन्न हो गये हैं, नेत्र बन्द हो गये हैं, जिन्होंने यद्धकी इच्छाका अच्छी तरह संकोच कर लिया है, जो अपना पराक्रम दिखा चके हैं, जिन्होंने बुद्धिसे ही पल्यंकासन बांध लिया है और सब परिग्रह छोड़ दिये हैं ऐसे कितने ही १ रन्धनम् इन्धनम् । लब्धेर्बद्धन्धनं ल०, म०, अ०, ५०, स०, इ०, द०। २ उत्साहवायुना समृद्धः । ३ राजराजमुख्याः । सिंहाः इति ध्वनिः । ४ विगतप्राणौ। ५ अन्योन्यावलम्बनौ । ६ यमकगिरिवत् । ७ सञ्चलगिरि-ल०, अ०, ५०, स०, इ०, म०। ८ आरोहकानुकला इत्यर्थः । युद्ध्यन्ते ल०। १० मृगजातिभिः । भक्त्यान्वेषणीयैर्वा । ११ हरिणैरिव । १२ प्रथमदिशायामेव । १३ संचूर्णमभवत्। १४ शक्त्यायुधरहितम् । १५ शक्त्यायुधैः । १६ समर्थाः । १७ समर्थान् । १८ शक्त्यायुधयुक्तान्। १६ शक्त्यायुधरहितान् । २० सामग्रीविकलताम् । २१ सम्यगुत्सृष्टसमारम्भाः। २२ मनसैव कृतपर्यङकासनाः । २३ सम्यक् त्यक्तवन्तः । २४ प्राणान् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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