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________________ ३४२ महापुराणम् गुरुसाक्षि तथा त्यक्तदेहाहारस्य तस्य वै। परीषहजयायत्ता सिद्धिरिष्टा महात्मनः ॥१२६॥ ततो ध्यायेदन प्रेक्षाः कृती जत परीषहान । विनाऽनुप्रेक्षणश्चित्तसमाधानं हि दुर्लभम् ॥१२७॥ 'प्राग्गभावितमेवाहं भावयामि न भावितम् । भावयामीति भावेन भावयेत्तत्त्वभावनाम् ॥१२८॥ समुत्सृजेदनात्मीयं शरीरादिपरिग्रहम् । आत्मीयं तु स्वसाकुर्याद् रत्नत्रयमनुत्तरम् ॥१२६॥ मनोव्यापरक्षार्थ ध्यायन्निति स धोरधीः। प्राणान् विसर्जयेदन्ते संस्मरन् परमेष्ठिनाम् ॥१३०॥ तथा विजितप्राणः प्रणिधानपरायणः' । शिथिलीकृत्य कर्माणि शुभां गतिमथाश्नुते ॥१३१॥ तस्मिन्नेव भवे शक्तः कृत्वा कर्मपरिक्षयम् । सिद्धिमाप्नोत्यशक्तस्तु त्रिदिवाग्रमवाप्नुयात् ॥१३२।। ततश्च्युतः परिप्राप्तमानुष्यः परमं तपः । कृत्वान्ते निति याति निर्दू ताखिलबन्धनः ॥१३३॥ क्षत्रियो यस्त्वनात्मज्ञः कुर्यानात्मानुपालनम् । विषशस्त्रादिभिस्तस्य दुर्मतिध वभाविनी ॥१३४॥ दुम॒तश्च दुरन्तेऽस्मिन् अवावर्ते दुरुत्तरे। पतित्वाऽत्र दुःखानां दुर्गतौ भाजनं भवेत् ॥१३॥ ततो मतिमताऽऽत्तीयविनिपातानुरक्षण । विधयोऽस्मिन् महायनो लोकद्वयहितावहे ॥१३६॥ कृतात्मरक्षणश्चैव प्रजानामनुपालने। राजा यत्नं प्रकुर्वीत राज्ञां मौलो ह्ययं गुणः ॥१३७॥ चाहिये ॥१२५॥ इस प्रकार जिसने गुरुकी साक्षीपूर्वक शरीर और आहारका त्याग कर दिया है ऐसे महात्मा पुरुषकी इष्टसिद्धि परीषहोंके विजय करनेके आधीन होती है अर्थात् जो परीषह सहन करता है उसीके इष्टकी सिद्धि होती है ॥१२६।। इसलिये निपुण पुरुषको परीषह जीतने के लिये अनुप्रेक्षाओंका चिन्तवन करना चाहिये क्योंकि अनुप्रेक्षाओंके चिन्तवन किये बिना चित्तका समाधान कठिन है ।।१२७।। जिसका पहले कभी चिन्तवन नहीं किया था ऐसे सम्यक्त्व आदिका चिन्तवन करता हूं और जिसका पहले चिन्तवन किया था ऐसे मिथ्यात्व आदिका चिन्तवन नहीं करता इस प्रकारके भावोंसे तत्त्वोंकी भावनाओंकाचिन्तवन करना चाहिये ।।१२८॥ जो अत्माके नहीं है ऐसे शरीर आदि परिग्रहका त्याग कर देना चाहिये और जो आत्मा के हैं ऐसे सर्वोत्कृष्ट रत्नत्रयका ग्रहण करना चाहिये ॥१२९॥ धीर वीर बुद्धिको धारण करनेवाले पुरुषको मनकी चंचलता नष्ट करने के लिये इस प्रकार ध्यान करते हुए और पंचपरमेष्ठियों का स्मरण करते हुए आयुके अन्तमें प्राणत्याग करना चाहिये ॥१३०।। जो पुरुष ध्यान में तत्पर रहकर ऊपर लिखे अनुसार प्राणत्याग करता है वह कर्मोको शिथिल कर शुभ गतिको प्राप्त होता है ॥१३१॥ जो समर्थ है वह उसी भवमें कर्मोंका क्षय कर मोक्षको प्राप्त होता है और जो असमर्थ है वह स्वर्गके अग्रभाग अर्थात् सर्वार्थसिद्धिको प्राप्त होता है ।।१३२॥ वह वहांसे च्युत हो मनुष्यपर्याय प्राप्त कर और परम तपश्चरण कर आयुके अंत में समस्त कर्मबंधनको नष्ट करता हुआ निर्वाणको प्राप्त होता है ॥१३३॥ आत्माका स्वरूप न जाननेवाला जो क्षत्रिय अपने आत्माकी रक्षा नहीं करता है उसकी विष, शस्त्र आदिसे अवश्य ही अपमृत्यु होती है ॥१३४॥ और अपमृत्युसे मरा हुआ प्राणी दुःखदायी तथा कठिनाईसे पार होने योग्य इस संसाररूप आवर्तमें पड़कर परलोकमें दुर्गतियोंके दुःखका पात्र होता है ।।१३५।। इसलिये बुद्धिमान् क्षत्रियको दोनों लोकोंमें हित करनेवाले, आत्मा के इस विघ्नबाधाओंसे रक्षा करनेमें महाप्रयत्न करना चाहिये ।।१३६।। इस प्रकार जिसने आत्माकी रक्षा की है ऐसे राजाको प्रजाका पालन करने में प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि यह राजाओंका मौलिक गुण है ।।१३७।। १ सम्यक्त्वादिकम् । २ मिथ्यात्वादिकम् । ३ मानसबाधाया नाशार्थम् । ४ एकाग्रतां गतः । ५ -मुपाश्नुते अ०, प०, स०, इ०, ल०, म० । ६ प्रजापालनयत्नः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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