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________________ ३०२ महापुराणम् गर्भाधान मन्त्रः -- सज्जातिभागी भव सद्गृहिभागी भवेति च । पदद्वयमुदीर्यादौ पदानीमान्यतः पठेत् ॥६२॥ आदौ मुनीन्द्रभागीति भवेत्यन्ते पदं वदेत् । सुरेन्द्रभागी परमराज्यभागीति च द्वयम् ॥३॥ आर्हन्त्यभागी भवेति पदमस्मादनन्तरम् । ततः परमनिर्वाणभागी भव पदं भवेत् ॥ ६४॥ श्राधाने' मन्त्र एष स्यात् पूर्वमन्त्रपुरःसरः । विनियोगश्च मन्त्राणां यथाम्नायं प्रदर्शितः ॥६५॥ चूर्णि:- सज्जातिभागी भव, सद्गृहिभागी भव, मुनीन्द्रभागी भव, सुरेन्द्रभागी भव, परमराज्यभागी भव, आर्हन्त्यभागी भव, परमनिर्वाणभागी भव, ( प्रधानमन्त्रः ) स्यात्प्रीतिमन्त्रस्त्रैलोक्यनाथो भवपदादिकः । त्रैकाल्यज्ञानी भव त्रिरत्नस्वामी भवेत्ययम् ॥ ६६ ॥ चूणिः -लोक्यनाथो भव, त्रैलोक्यज्ञानी भव, त्रिरत्नस्वामी भव, ( प्रीतिमन्त्रः ) ? मन्त्रोऽवतार कल्याणभागी भवपदादिकः । सुप्रीतौ मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणवाक्परः ॥६७॥ भागीभव पदोपेतस्ततो निष्क्रान्तिवाक्परः । कल्याणमध्यमो भागो भवत्येतेन योजितः ॥ ६८ ॥ ततश्चार्हन्त्यकल्याणभागी भव पदान्वितः । ततः परमनिर्वाणकल्याणपद सङ्गतः ॥६॥ गर्भाधानके मन्त्र - प्रथम ही 'सज्जातिभागी भव' ( उत्तम जातिको धारण करनेवाला हो) और 'सद्गृहिभागी भव' (उत्तम गृहस्थ अवस्थाको प्राप्त होओ) इन दो पदोंका उच्चारण कर पश्चात् नीचे लिखे पद पढ़ना चाहिये ॥ ९२ ॥ पहले 'मुनीन्द्रभागी भव' ( महामुनिका पद प्राप्त करनेवाला हो ) यह पद बोलना चाहिये और फिर 'सुरेन्द्रभागी भव' (इन्द्र पदका भोक्ता हो ) तथा 'परमराज्यभागी भव' (उत्कृष्ट राज्यका उपभोग करनेवाला हो ) इन दो पदों का उच्चारण करना चाहिये ॥ ९३ ॥ तदनन्तर 'आर्हन्त्यभागी भव' ( अरहन्त पदका प्राप्त करनेवाला हो ) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये और फिर परमनिर्वाणभागी भव' (परम निर्वाण पदको प्राप्त करनेवाला हो), यह पद कहना चाहिये || १४ || गर्भाधानकी क्रियामें पहले के मन्त्रों के साथ साथ यह मन्त्र काममें लाना चाहिये इस प्रकार यह आम्नायके अनुसार मन्त्रोंका विनियोगका क्रम दिखलाया है ॥ ९५ ॥ गर्भाधानके समय काम आनेवाले विशेष मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है सज्जातिभागी भव, सद्गृहिभागी भव, मुनीन्द्रभागी भव, सुरेन्द्रभागी भव, परमराज्यभागी भव, आर्हन्त्यभागी भव, परमनिर्वाणभागी भव । अब प्रीतिमन्त्र कहते हैं- ' त्रैलोक्यनाथो भव' (तीनों लोकों के अधिपति होओ ) ' त्रैकाल्यज्ञानी भव' (तीनों कालका जाननेवाला हो) और 'त्रिरत्नस्वामी भव' (रत्नत्रयका स्वामी हो) ये तीन प्रीतिक्रिया के मन्त्र हैं ॥९६॥ संग्रह - ' त्रैलोक्यनाथो भव, त्रैकाल्यज्ञानी भव, त्रिरत्नस्वामी भव' । अब सुप्रीति क्रियाके मन्त्र कहते हैं- सुप्रीति क्रिया में 'अवतारकल्याणभागी भव' (गर्भकल्याकको प्राप्त करनेवाला हो), 'मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणभागी भव' (सुमेरु पर्वतपर इन्द्रके द्वारा जन्माभिषेक के कल्याणको प्राप्त हो), 'निष्क्रान्तिकल्याणभागी भव' (निष्क्रमण कल्याणको प्राप्त करनेवाला हो), 'आर्हन्त्यकल्याणभागी भव' (अरहन्त अवस्था - केवलज्ञानकल्याणकको प्राप्त करनेवाला हो), और 'परमनिर्वाणकल्याणभागी भव' (उत्कृष्ट निर्वाण कल्याणकको १ गर्भाधाने । २ पीठिकामन्त्रादिपुरःसरः । ३ अवतारादिकल्यारणादिपरमनिर्वाणपदान्तानां सर्वपदानाम् । मन्त्र इति पदं विशेष्यपदं भवति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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