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________________ २५३ अष्टत्रिंशत्तम पर्व विषयेष्वनभिष्वडगो' नित्यस्वाध्यायशीलता। नानाविधोपवासश्च वृत्तिरिष्टा प्रशान्तता ॥१४६॥ इति प्रशान्तिः । ततः कृतार्थमात्मानं मन्यमानो गहाश्रमे । यदोद्यतो गृहत्यागे तदाऽस्यैष क्रियाविधिः ॥१५०॥ सिद्धार्चनां पुरस्कृत्य सर्वानाहूय सम्मतान् । तत्साक्षि सूनवे सर्व निवेद्यातो गृहं त्यजेत् ॥१५॥ (कलक्रमस्त्वया तात सम्पाल्योऽस्मत्परोक्षतः । त्रिधा कृतं च नो द्रव्यं त्वयेत्थं विनियोज्यताम् ॥१५२॥ एकोऽशो धर्मकार्येऽतो द्वितीयः स्वगृहव्यये । तृतीयः संविभागाय भवेत्त्वत्सहजन्मनाम् ॥१५३॥ पुण्यश्च संविभागार्हाः समं पुत्रैः समांशकैः। त्वं तु भूत्वा कुलज्येष्ठः सन्ततिं नोऽनुपालय ॥१५४॥ श्रुतवृत्तक्रियामन्त्रविधिज्ञस्त्वमतन्द्रितः। प्रपालय कुलाम्नायं गुरुं देवांश्च पूजयन् ॥१५॥ इत्येवमनुशिष्य स्वं ज्येष्ठं सूनुमनाकुलः । ततो दीक्षामुपादातुं द्विजः स्वं गृहमुत्सृजेत् ॥१५६॥ _ इति गृहत्यागः । त्यक्तागारस्य सदृष्टः प्रशान्तस्य गृहीशिनः । प्राग्दीक्षौपयिकात् कालाद् एकशाटकधारिणः ॥१५७॥ 'यत्पुरश्चरणं दीक्षाग्रहणं प्रति धार्यते । दीक्षाद्यं नाम तज्ज्ञेयं क्रियाजातं द्विजन्मनः ॥१५८॥ इति दीक्षाद्यम् । त्यक्तचेलादिसडगस्य जैनी दीक्षामयुषः । धारणं जातरूपस्य यत्तत् स्याज्जिनरूपता ॥१५॥ गृहस्थीका भार सौंप दे और आप स्वयं उत्तम शान्तिका आश्रय ले॥१४८॥ विषयोंमें आसक्त नहीं होना, नित्य स्वाध्याय करने में तत्पर रहना तथा नाना प्रकारके उपवास आदि करते रहना प्रशान्त वृत्ति कहलाती है ॥१४९॥ यह इक्कीसवीं प्रशान्ति क्रिया है। तदनन्तर गृहस्थाश्रममें अपने आपको कृतार्थ मानता हुआ जब वह गृहत्याग करनेके लिये उद्यत होता है तब उसके यह गृहत्याग नामकी क्रियाकी विधि की जाती है ॥१५०॥ इस क्रियामें सबसे पहले सिद्ध भगवानका पूजन कर समस्त इष्टजनोंको बुलाना चाहिये और फिर उनकी साक्षीपूर्वक पुत्रके लिये सब कुछ सौंपकर गृहत्याग कर देना चाहिये ।।१५१।। गृहत्याग करते समय ज्येष्ठ पुत्रको बुलाकर उससे इस प्रकार कहना चाहिये कि पुत्र, हमारे पीछे यह कुलक्रम तुम्हारे द्वारा पालन करने योग्य है। मैंने जो अपने धनके तीन भाग किये हैं उनका तुम्हें इस प्रकार विनियोग करना चाहिये कि उनमेंसे एक भाग तो धर्मकार्य में खर्च करना चाहिये, दूसरा भाग अपने घर खर्चके लिये रखना चाहिये और तीसरा भाग अपने भाइयोंमें बांट देनेके लिये है। पुत्रोंके समान पुत्रियोंके लिये भी बराबर भाग देना चाहिये। हे पुत्र, तू कुलका बड़ा होकर मेरी सब संतानका पालन कर। तू शास्त्र, सदाचार, क्रिया, मन्त्र और विधिको जाननेवाला है इसलिये आलस्यरहित होकर देव और गुरुओंकी पूजा करता हुआ अपने कुलधर्मका पालन कर । इस प्रकार ज्येष्ठ पुत्रको उपदेश देकर वह द्विज निराकुल होवे और फिर दीक्षा ग्रहण करनेके लिये अपना घर छोड़ दे ॥१५२-१५६॥ यह बाईसवीं गृहत्याग नामकी क्रिया है। जिसने घर छोड़ दिया है, जो सम्यग्दृष्टि है, प्रशान्त है, गृहस्थोंका स्वामी है और दीक्षाधारण करनेके समयके कुछ पहले जिसने एक वस्त्र धारण किया है उसके दीक्षाग्रहण करनेके पहले जो कुछ आचरण किये जाते हैं उन आचरणों अथवा क्रियाओंके समूहको द्विजकी दीक्षाद्य क्रिया कहते हैं ॥१५७-१५८॥ यह तेईसवीं दीक्षाद्य क्रिया है। जिसने वस्त्र आदि सब परिग्रह छोड़ दिये हैं और जो जिनदीक्षाको प्राप्त करना चाहता है ऐसे पुरुषका दिगम्बररूप धारण करना जिनरूपता नामकी क्रिया कहलाती है ॥१५९॥ १ निष्प्रभः । २ अस्माकम् । ३ कुलपरम्पराम् । ४ दीक्षास्वीकारात् प्राक् । ५ क्रियासमूहः । ६ गतस्य। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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