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________________ त्रयस्त्रिंशत्तमं पर्व १३७ मन्दारकुसुमोद्गन्धिः अान्दोलितलतावनः । पवनस्तमभीयाय' प्रत्युद्यन्निव पावनः ॥६॥ सुमनोवृष्टिरापप्तद् आपूरितनभोडागणा। विरजीकृतभूलोकः समं शीतैरपा कणः ॥६६॥ 'शुश्रुवे ध्वनिरामन्द्रो दुन्दुभीनां नभोऽङगण । श्रुतः केकिभिरुग्रीवैः घनस्तनितशङकिभिः ॥७०॥ गुल्फदघ्न प्रसूनौघसम्मर्दमूदुना पथा। तमद्रिशेषमश्रान्तः प्रययौ स नृपापणीः ॥७१॥ ततोऽधिरुह्य तं शैलम् अपश्यत् सोऽस्य मूर्धनि । प्रागुक्तवर्णनोपेतं जैनमास्थानमण्डलम् ॥७२॥ समेत्या वसरावेक्षास्तिष्ठन्त्य स्मिन् सुरासुराः । इति तानिरुक्तं तत्सरणं समवादिकम् ॥७३॥ पाखण्डलवनुलेखाम् अखण्डपरिमण्डलाम् । जनयन्तं निजोद्योतः धूलीसालमथासदत् ॥७४॥ हेमस्तम्भाविन्यस्तरत्नतोरणभासुरम् । धुलोसालमतीत्यासौ मानस्तम्भमपूजयत् ॥७॥ मानस्तम्भस्य पर्यन्ते सरसीः ससरोरुहाः। जैनीरिव श्रुतीः स्वच्छशीतलापो ददर्श सः ॥७॥ धूलीसालपरिक्षेपस्यान्तर्भाग समन्ततः । वीथ्यन्तरेषु सोऽपश्यद् देवावासोचिता भुवः ॥७७॥ प्रतीत्य परतः किञ्चिद् ददर्श जलखातिकाम् । सुप्रसन्नामगाधां च मनोवृत्ति सतामिव ॥७॥ वल्लीवनं ततोऽद्राक्षीनानापुष्पलताततम् । पुष्पासवरसामत्तभूमद्भुमरसडाकुलम् ॥७॥ लिया था कि त्रिलोकीनाथ जिनेन्द्रदेव समीप ही विराजमान हैं ॥६७॥ मन्दार वृक्षोंके फूलों से सगन्धित और लताओंके वनको कम्पित करनेवाला वायु उनके सामने इस प्रकार आया था मानो उनकी अगवानी ही कर रहा हो ॥६८॥ जिन्होंने पृथिवीको धूलि रहित कर दिया है ऐसी जलकी शीतल बूंदोंके साथ साथ आकाशरूपी आँगनको भरती हुई फूलोंकी वर्षा पड़ रही थी ॥६९॥ जिन्हें मेषोंकी गर्जना समझनेवाले मयूर, अपनी गर्दन ऊँची कर सुन रहे हैं ऐसे आकाशरूपी आँगनमें होनेवाले दुन्दुभि बाजोंके गम्भीर शब्द भी महाराज भरतने सुने थे ॥७०॥ राजाओंमें श्रेष्ठ महाराज भरत, पैरकी गाँठौं तक ऊँचे फैले हुए फूलोंके संमर्दसे जो अत्यन्त कोमल हो गया है ऐसे मार्ग के द्वारा बिना किसी परिश्रमके बाकी बचे हुए उस पर्वत पर चढ़ गये थे ॥७१।। तदनन्तर उस पर्वतपर चढ़कर भरतने उसके मस्तकपर पहले कही हुई रचनासे सहित जिनेन्द्रदेवका समवसरणमण्डल देखा ॥७२॥ इसमें समस्त सुर और असुर आकर दिव्य ध्वनिके अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए बैठते हैं इसलिये जानकार गणधरादि देवोंने इसका समवसरण ऐसा सार्थक नाम कहा है ॥७३॥ अथानन्तर-महाराज भरत, जो अपने प्रकाशसे अखण्ड मण्डलवाले इन्द्रधनुषकी रेखा को प्रकट कर रहा है ऐसे धूलिसालके समीप जा पहुँचे ॥७४॥ सुवर्णके खंभोंके अग्रभागपर लगे हुए रत्नोंके तोरणोंसे जो अत्यन्त देदीप्यमान हो रहा है ऐसे धूलिसालको उल्लंघन कर उन्होंने मानस्तम्भकी पूजा की ॥७५।। जिनमें स्वच्छ और शीतल जल भरा हुआ है और कमल फूल रहे हैं ऐसी जिनेन्द्र भगवान्की वाणीके समान मानस्तम्भके चारों ओरकी बावड़ियाँ भी महाराज भरतने देखीं ॥७६॥ धूलिसालकी परिधिके भीतर चारों ओरसे गलियोंके बीच बीचमें उन्होंने देवोंके निवास करने योग्य पथिवी भी देखी ॥७७॥ कुछ और आगे चलकर उन्होंने जलसे भरी हुई परिखा देखी। वह परिखा सज्जन पुरुषोंके चित्तकी वृत्तिके समान स्वच्छ और गम्भीर थी ॥७८॥ तदनन्तर जो अनेक प्रकारके फूलोंकी लताओंसे व्याप्त हो रहा है और जो फूलोंके आसवरूपी रससे मत्त होकर फिरते हुए भूमरोंसे व्याप्त है ऐसा लता १ अभिमुख जगाम । २ जलानाम् । ३ भरतेन श्रूयते स्म । ४ घुण्टिकप्रमाण । 'तद् ग्रन्थी घु ण्टिके शुल्फौ' इत्यभिधानात् । ५ मार्गेण । ६ थमरहितः । ७ कैलासस्य । ८ समागत्य। ६ प्रभोरवसरमालोकपन्तः । १० समवसरणम् । ११ आगमत् । १२ पर्यन्तसरसी ल०। १३ शैत्यजला:, पक्षे शान्तिजलाः । १४ देवप्रासादभुमीः । १८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org,
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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