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________________ त्रयस्त्रिंशत्तमं पर्व शाखामृगा' मगेन्द्राणां गजितरिह तजिताः । पुजीभूता निकुञ्जधु पश्य तिष्ठन्ति साध्वसात् ॥४६॥ मुनीन्द्रपाठनिषिरितो रम्यमिदं धनम् । तृणानकवलग्रासिकुरङगकुलसडाकुलम् ॥४७॥ इतश्च हरिगाराति कठोरारयभीषणम् । विमुक्तकवलच्छेदप्रपलायितकुञ्जरम् ॥४८॥ जरजरन्त ऋडगाग्रक्षतवल्मीफरोधसः । इतो रम्या वनोद्देशा वराहोत्खातपल्वलाः ॥४६॥ मगैः प्रविष्टवेशन्त वंशस्तम्बोपगै जैः। सूच्यते हरिणाकान्तं बनमतद् भयानकम् ॥५०॥ वनप्रवेशिभिनित्यं नित्यं स्थण्डिलशायिभिः। न मुच्यतेऽयमद्रीन्द्रो मगर्मुनिगणरपि ॥५॥ इति प्रशान्तो रोद्रश्च सदैवायं धराधरः। सन्निधानाज्जिनेन्द्रस्य शान्त एवाधुना पुनः ॥५२॥ गजः पश्य भृगेन्द्रागां संवासमिह कानने । नखरक्षतमार्गेषु स्वैरमारपशतामिमान् ॥५३॥ १°चारणाध्युषितानेते गुहोसडागानशडिकताः। विशन्त्यनु गताः शावैः पाकसत्त्वैः१२ समं मृगाः१३ ॥५४॥ अहो परममाश्चर्य तिरश्चामपि यद्गणैः । अनुयात मुनीन्द्राणाम् अज्ञातभयसम्पदाम् ॥५५॥ (सोऽयमष्टापदैर्जुष्टो५ गैरन्वर्थनामभिः । पुनरष्टापदख्याति पुरैति" स्वदुषक्रमम् ॥५६॥) "स्फरन्मणितटोपान्तं तारकाचक्रमापतत् । न याति व्यक्तिमस्यास्तद्रोचिश्छन्नमण्डलम् ॥१७॥ गई है और जो मदरूपी जलसे मलिन हो रहे हैं ऐसे इस वनके वृक्ष हाथियोंकी वनक्रीड़ाको साफ साफ सूचित कर रहे हैं ॥४५॥ इधर देखिये, सिंहोंकी गर्जनासे डरे हुए ये बन्दर भयसे इकटठे होकर लतामण्डपोंमें बैठे हए हैं॥४६॥ यह वन इधर तो बड़े बडे मनियोंके पाठ करने के शब्दोंसे रमणीय हो रहा है और इधर तृणोंके अग्रभागका ग्रास खानेवाले हरिणों के समहसे व्याप्त हो रहा है ॥४७॥ इधर सिंहोंके कठोर शब्दोंसे भयंकर हो रहा है और इधर खाना-पीना छोड़कर हाथियों के समूह भाग रहे हैं ।।४८।। इधर, जिनमें वृद्ध जंगली भैंसाओंने सींगोंकी नोकसे बामियोंके किनारे खोद दिये हैं और सूअरोंने छोटे छोटे तालाब खोद डाले हैं ऐसे ये सुन्दर सुन्दर बनके प्रदेश हैं ।।४९।। छोटे छोटे तालाबोंमें घुसे हुए हरिणों और बाँसकी झाड़ियोंके समीप छिपकर खड़े हुए हाथियोंसे साफ साफ सूचित होता है कि इस भयंकर वनपर अभी अभी सिंहने आक्रमण किया है ॥५०॥ सदा वनमें प्रवेश करनेवाले और सदा जमीनपर सोनेवाले हरिण और मुनियोंके समूह इस बनको कभी नहीं छोड़ते हैं ॥५१॥ इस प्रकार यह पर्वत सदा शान्त और भयंकर रहता है परन्तु इस समय श्री जिनेन्द्रदेवके सन्निधानसे शान्त ही है ।।५२।। इधर, इस वनमें सिंहोंका हाथियोंके साथ सहवास देखिये, ये सिंह अपने नखोंसे किये हुए हाथियोंके धावोंका इच्छानुसार स्पर्श कर रहे हैं ॥५३॥ जिनके पीछे पीछे बच्चे बल रहे हैं ऐसे हरिण, सिंह, व्याधू आदि दुष्ट जीवोंके साथ साथ चारण-मुनियोंसे अधिष्ठित गुफाओंमें निर्भय होकर प्रवेश करते हैं ॥५४।। अहा, बड़ा आश्चर्य है कि पशुओं के समह भी, जिन्हें बनके भय और शोभाका कछ भी पता नहीं है ऐसे मनियोंके पीछे पीछे फिर रहे हैं ।।५५।। सार्थक नामको धारण करनेवाले अष्टापद नामके जीवोंसे सेवित हुआ यह पर्वत आपके चढ़नेके बाद अष्टापद नामको प्राप्त होगा ॥५६॥ जिसपर अनेक मणि देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसे इस पर्वतके किनारेके समीप आता हुआ नक्षत्रोंका समूह उन मणियोंकी किरणोंसे अपना मण्डल तिरोहित हो जानेसे प्रकटताको प्राप्त नहीं हो रहा है। भावार्थ १ मऊंटा: । २ सिह । ३ वृद्धमहिष । ४ वामलूरतटाः । 'वामलूरश्च नाकुश्च वल्मीक पुन्नपुंसकम्' इत्यभिधानात् । ५ अल्पसरोवराः । ६ पल्वलैः । 'वेशन्तं पल्वलञ्चाल्पसर' इत्यभिधानात् । ७ वेणुपुञ्जसमीपगैः। ८ सहवासम् । ६ नख रक्षतकीर्णपंक्तिषु । १० चारणमुनिभिराश्रितान् । ११ गृहामध्यान् । १२ सिंहशार्दूलादिक्रूरमृगैः। १३ हरिणादयः । १४ अनुगतम् । १५ सेवितः । १६ सार्थाऽभिधानः । १७ भविष्यकाले आगमिष्यति । १८ त्वया प्रथमोपक्रम यथा भवति तथा। १९ आगच्छत् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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