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________________ वि० संज्ञक । स्व-संग्रह, पत्र ८, त्रिपाठ, शुद्धप्रति, लेखन प्रशस्ति इस प्रकार है - "लिखित श्री वीसलनयरे । सं० १६४५ वर्षे ।" २१. वीरचरितम् अभययसिंह ज्ञान भंडार बीकानेर, पोथी १६, प्रति २१८, पत्र सं० २३०, लेखन १५वीं शती, सुंदर और शुद्ध, प्रतिक्रमणादि स्तोत्र संग्रह। २२. चतुर्विंशतिजिनस्तुतयः - श्री विजयधर्म लक्ष्मी ज्ञानमन्दिर, आगरा की हस्तलिखित प्रति के आधार से श्री भंवरलालजी नाहटा द्वारा लिखित प्रतिलिपि। २३. चतुर्विंशतिजिनस्तोत्राणि जे० संज्ञक । श्री जिनभद्रसूरि ज्ञान भंडार, जैसलमेर की प्रति के आधार से मुनिपुंगव श्री रमणीकविजयजी महाराज लिखित प्रेस कॉपी। का० संज्ञक । प्रवर्तक श्री कांतिविजयजी संग्रह, बड़ौदा, प्रति सं० २०८३, पत्र सं० १४, लेखन २० वीं सदी। छा० संज्ञक । प्रवर्तक कांतिविजयजी संग्रह, छाणी, प्रति सं० ६१, पत्र सं० ६, ले० २०वीं शती। प्र० संज्ञक । ‘सिरिपयरणसंदोह' प्रकाशित। २४. सर्वजिनपंचकल्याणकस्तोत्र संज्ञक । अभय जैन ग्रंथालय, बीकानेर, स्वाध्याय पुस्तिका, पत्र सं० १३१-१३३, लेखन १५वीं शती, शुद्धतम। संज्ञक । अभय जैन ग्रंथालय बीकानेर, स्वाध्याय पुस्तिका, पत्र सं० २२३-२२४, लेखन १६वीं शती। प्रस्तावना Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002681
Book TitleJinvallabhsuri Granthavali
Original Sutra AuthorVinaysagar
Author
PublisherPrakrit Bharti Academy
Publication Year2004
Total Pages398
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size12 MB
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