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________________ में ई. स. 1615 के आसपास में आलू भारत लाया गया । अतः आलू | अनंतकाय है ऐसा कथन केवली का नहीं है किन्तु किसी छद्मस्थ की छोड़ी | हुई गप है। मुनि नंदीघोषविजय : नहीं, यह बात सही नहीं है । शास्त्रों में सभी प्रकार के अनंतकाय के नामों का उल्लेख संभवित नहीं है किन्तु अनंतकाय के लक्षण ही शास्त्र में पाये जाते हैं । उसी लक्षण के आधार पर हमारे प्राचीन आचार्यों ने आलू आदि को अनंतकाय बताया है । सेब (सफरजन) आदि भी भारत की पैदाइश नहीं है और शास्त्र में कहीं उसका नाम भी नहीं है तथापि अपने प्राचीन/अर्वाचीन किसी भी आचार्य ने उसका निषेध नहीं किया है । डॉ. नंदलाल जैन : आपके साथ इस चर्चा से बहत साल से मेरे मन में आलू इत्यादि के बारे में जो शंकाएँ थी उसका अच्छा समाधान हुआ | बहुबीज के बारे में भी लोग बार बार प्रश्न पूछते हैं । उसके बारे में| इसरो के विज्ञानी डॉ रजनीभाई दोशी के साथ निम्नोक्त बात हुई । डॉ. रजनीभाई दोशी : बैगन, अंजीर, अमरूद आदि में बहुबीज हैं अतः वह अभक्ष्य है तो ककड़ी, भिंडी, आरिया आदि बहुबीज नहीं है ? मुनि नंदीघोषविजय : " धर्मसंग्रह " नामक ग्रंथ के अनुसार बहुबीज वनस्पति के बीज के ऊपर पारदर्शी सूक्ष्म अस्तर नहीं होता है । जबकि ककड़ी इत्यादि के बीज के ऊपर पारदर्शी सूक्ष्म अस्तर होता है । अतः वह बहबीज नहीं है । दूसरी बात उसके बीज के प्रकार पर भी उसका आधार है || जिन वनस्पति के बीज रसोई के दौरान निर्जीव हो जाते हो वही वनस्पति भक्ष्य है । जबकि जिन वनस्पति के बीज रसोई के दौरान निर्जीव नहीं होते हैं ऐसी वनस्पति अभक्ष्य है, उदा. अमरूद आदि । जबकि अंजीर आदि तो कच्चे ही खाये जाते हैं । अतः वे अभक्ष्य हैं । आधुनिक विज्ञान के अनुसार बैगन में विषमय द्रव्य ज्यादा प्रमाण में है अतः वह अभक्ष्य है । | जैन परंपरा में "यतना (जयणा)" ही मुख्य धर्म है | दशवकालिक सूत्र में जब शिष्य को कहा गया कि चलने से हिंसा होती है, खड़े रहने से, बैठने से, सोने से, बोलने से, अरे ! आहार करने से भी हिंसा होती है तो शिष्य प्रश्न पूछता है कि यदि चलने से, खड़े रहने से बैठने से, सोने से, 77 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002549
Book TitleJain Dharma Vigyana ki Kasoti par ya Vigyana Jain Dharma ki Kasoti par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNandighoshvijay
PublisherBharatiya Prachin Sahitya Vaigyanik Rahasya Shodh Sanstha
Publication Year2005
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Science
File Size6 MB
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