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________________ सिर्फ मननीय ही नहीं, दिशादर्शक भी मनीषी मुनि-कृतिकारजैनतत्त्वदर्शन परसमय-समय पर अपने तर्कसंमत विचारप्रस्तुत करते रहे हैं। मुनि नन्दीघोषविजयजी एक प्रखर-तेजोमय चिन्तक हैं। उन्होंने जैनधर्म/दर्शन के वैज्ञानिक पक्ष का गहन अध्ययन किया है तथा किसी भी वैचारिक उलझन अथवा शंका को उस सीमा तक ले जाने की कोशिश की है, जहाँ पहुँचकर उसका कोई असंदिग्ध समाधान संभव हो / लेखक पूर्वग्रहमुक्त निर्मल मन-मानस के धनी हैं, उसके चित्त परकोई धुंआ कोहरा नहीं है। विज्ञान के पक्ष में उसकी जानकारी अचूक है, जिसका उसने कदम-दर-कदम फूंक फूंक कर उपयोग किया है। निश्चय ही किसी भी तुलनात्मक अध्ययन लेखन की अपनी सीमाएँ होती है तथापि विद्वान् लेखक ने अत्यन्त निर्मल-निर्धान्त दृष्टि से जैनाध्यात्म/जैनाचार के उन तमाम पक्षों की तर्कसंगत समीक्षा की है, जिन पर उनसे पहले विचार-विमर्श तो हुआ था किन्तु संभवतः इतनी पारदर्शिता से नहीं / किसी भी प्रश्न को उसके बहुआयामी वजूद में देखना, उसका तुलनात्मक अध्ययन करना और पाठक-के तल पर उसे सरल शब्दों में प्रस्तुत करना एक मुश्किल काम था, तथापि मुनिश्री ने उसे संपूर्ण निर्विघ्नता के साथ संपन्न किया है। कुल मिलाकर प्रस्तुत कृति न केवल मननीय है, वरन् एक योग्य/समर्थ मार्गदर्शक भी है। जो भी व्यक्ति जैनधर्म को सिर्फ अध्यात्म मानकर चल रहा है, उसे इसके वैज्ञानिक आधार को पुष्ट करने के लिये प्रस्तुत कृति से काफी युक्तियुक्त जानकारी मिल सकेगी। - डॉ. नेमिचंद जैन (संपादक-पत्रकार : तीर्थंकर, अप्रैल, 1995, पृ.17) 'प्राचीन ग्रंथों के वैज्ञानिक तथ्यों के साथ आधुनिक विज्ञान के तथ्यों की कसौटी क्यों न की जाय?"विचारके साथ मुनि नन्दीघोषविजयजी का विज्ञान व अध्यात्म का प्रवास शुरु हुआ।शुरु में वे अकेले ही थे, बाद में विज्ञानजगत के बडे बडे विज्ञानी उसमें सम्मिलित होते रहें। उसके फल स्वरुप उनकी प्रेरणा से “भारतीय प्राचीन साहित्य वैज्ञानिक रहस्य अनुसंधान संस्था" (Research Institute of Scientific Secrets from Indian Oriental ScripturesRISSIOS) की स्थापना की गई है। इस संस्था की एक वेबसाईट भी है, जिसका नाम हैhttp//www.jainscience-rissios.org दीक्षा लेने के बाद शुरु में उन्हों ने संस्कृत-प्राकृत का अध्ययन किया फिर जैन आगमो की दृष्टि से आधुनिक विज्ञान का अध्ययन शुरु किया। उसके परिणामतः उन्हों ने “जैनदर्शन के वैज्ञानिक रहस्य''नामक गुजराती किताब लिखी। इसकी प्रस्तावना भी गुजरात के नामी गणितविज्ञानी डॉ. प्र.चु. वैद्य ने लिखी है। मुनिश्री के इसी पुस्तक की अंग्रेजी आवृत्ति भी प्रकाशित की गई है, जिसकी प्रस्तावना लिखने के लिये उन्होंने वर्तमान राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कमाल को लिखा था तो उन्हों ने नम्रता के साथ लिखा कि खगोल का उसको ज्यादा अभ्यास नहीं है, अतः खभौतिकी के विख्यात विज्ञानी डॉ. जयंत नारलीकर के पास प्रस्तावना लिखाने का अनुरोध किया औरउन्हों ने अंग्रेजी आवत्तिकी काँमेन्ट्स लिखी। - तुषार भट्ट (रेतीमां रेखाचित्रो, गुजरात टाईम्स, सप्तक पूर्ति, पृ. 4 न्यूयोर्क, दि.17,जनवरी,2003) ISBN 81-901845-3-9 For Private & Personal use only www.jainelibrary.org,
SR No.002549
Book TitleJain Dharma Vigyana ki Kasoti par ya Vigyana Jain Dharma ki Kasoti par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNandighoshvijay
PublisherBharatiya Prachin Sahitya Vaigyanik Rahasya Shodh Sanstha
Publication Year2005
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Science
File Size6 MB
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