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________________ [259 ] विंशति अध्ययन सचित्र उत्तराध्ययन सूत्र तुट्ठो य सेणिओ राया, इणमुदाहु कयंजली । अणाहत्तं जहाभूयं, सुट्ठ मे उवदंसियं ॥ ५४ ॥ तुष्ट हुए राजा श्रेणिक ने हाथ जोड़कर कहा - भगवन्! आपने मुझे अनाथता का स्वरूप भली-भाँति समझाया है ॥ ५४ ॥ Contented king Shrenik spoke with joined palms - Bhante! You have explained me the meaning of being unprotected very well. (54) तुझं सुलद्धं खु मणुस्सजम्मं, लाभा सुलद्धा य तुमे महेसी । तुभे साहाय सबन्धवा य, जं भे ठिया मग्गे जिणुत्तमाणं ॥ ५५ ॥ हे महर्षि! आपका मनुष्य - जन्म वास्तव में सफल हुआ, आपकी लब्धियाँ सफल हुईं। आप ही सनाथ और सबान्धव हो क्योंकि आप जिनेश्वरों के मार्ग में स्थित हो ॥ ५५ ॥ O great sage! Really your birth as a human being has been worthwhile; your spiritual accomplishments have also been fruitful. You, indeed, are the only one with protection and with friends because you are firm on the path of Jinas. (55) तं सि नाही अणाहाणं, सव्वभूयाण संजया ! खामि ते महाभाग !, इच्छामि अणुसासिउं ॥ ५६ ॥ हे संयंत! आप अनाथों के और सभी जीवों के नाथ हो । महाभाग ! मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ और अब मेरी इच्छा है कि आप मुझे हितशिक्षा दें ॥ ५६ ॥ O restrained saint! You are the protector of the unprotected and savior of all the living beings. O fortunate one! I beg your forgiveness and I seek your beneficial instructions. (56) पुच्छिऊण मए तुब्भं, झाणविग्घो उ जो कओ । निमन्तिओ य भोगेहिं, तं सव्वं मरिसेहि मे ॥ ५७ ॥ मैंने प्रश्न पूछकर आपके ध्यान में विघ्न किया और भोगों का निमंत्रण दिया, उस सब के लिए आप मुझे क्षमा प्रदान करें ॥ ५७ ॥ I disturbed your meditation by asking questions and invited you to worldly pleasures. Please forgive me for all that. (57) एवं थुणित्ताण स रायसीहो, अणगारसीहं परमाइ भत्तिए । सओरोहोय सपरियणो य, धम्माणुरत्तो विमलेण चेयसा ॥ ५८ ॥ इस प्रकार राजाओं में सिंह के समान श्रेणिक राजा अनगार सिंह (अनाथी मुनि) की परम भक्तिपूर्वक स्तुति कर, निर्मल हृदय से अन्तःपुर ( रानियों) तथा बान्धवों- परिजन सहित धर्म में अनुरक्त हो गया ॥ ५८ ॥ This way king Shrenik, the lion among kings, eulogized (Anaathi ascetic) with great devotion and embraced (ascetic) religion with pure heart along with his queens and family members. (58)
SR No.002494
Book TitleAgam 30 mool 03 Uttaradhyayana Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni
PublisherPadma Prakashan
Publication Year2011
Total Pages726
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size28 MB
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