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________________ ३१२ श्री प्रश्नव्याकरण सूत्र कर ने कहा है । और अदत्तादान का यह पूर्वोक्त फलविपाक भी उन्हीं प्रभु ने बताया है। - इस तरह यह अदत्तादान परधनहरण, दहन, मृत्यु, भय, मालिन्य, त्रास और रौद्रध्यान सहित लोभ का मूल है। अधिक क्या कहें, चिरकाल से परिचित या प्राप्त है और अनादिकाल से प्राणी के पीछे लगा हुआ है और इसका अन्त होना बड़ा ही दुष्कर है अथवा इसका अन्त दुःखकर है । इस प्रकार तीसरा अधर्म द्वार समाप्त हुआ; ऐसा मैं कहता हूँ । ' व्याख्या बारहवें सूत्र के पूर्वार्द्ध में चोरी करने वालों को, खासतौर से मनुष्यलोक में प्राप्त होने वाले कटुफलों का निरूपण किया गया था। इसके उत्तरार्द्ध में नरकगति और तिर्यंचगति में प्राप्त होने वाले भयंकर दुःखों का वर्णन किया गया है और अन्त में, बड़ी कठिनता से किसी को मनुष्यभव प्राप्त होने के बाद उसकी दुरवस्था और जीवन की दुर्दशा का सजीव चित्रण किया गया है। मूलपाठ में पापकर्मरत संसारीजीवों का संसारसमुद्र में अनन्तकाल तक निवास बता कर जन्ममरणचक्ररूप संसार की समुद्र के साथ तुलना करते हुए उसके सारे अंगोपांगों की हूबहू संगति समुद्र के साथ बिठाई गई है। मूलार्थ में तथा पदार्थान्वय में अधिकांश अर्थ हम स्पष्ट कर आए हैं। कुछ खास स्थलों पर यहाँ विश्लेषण कर देना ही उचित समझते हैं चोरों की मृत्यु के बाद जनता में प्रतिक्रिया-मृत्यु मानवजीवन की अच्छी या बुरी प्रवृत्तियों की अन्तिम मंजिल है। मृत्यु होने के बाद ही किसी मनुष्य की असलियत का पता लगता है कि अमुक व्यक्ति कैसा था ? वास्तव में शरीर की समाप्ति ही मानव जीवन की सही निर्णायिका होती है। उससे पहले पूरी तरह से पता नहीं लगता कि कौन मनुष्य भला या बुरा है । प्रायः मृत्यु हो जाने के बाद ही उसके विषय में आम जनता अपनी अच्छी या बुरी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है । अगर आदमी अच्छे कर्म करके इस लोक से विदा होता है तो उसके विषय में जनता कहती है'हमारे समाज, जाति या राष्ट्र का एक रत्न चला गया ; उसके स्थान की क्षतिपूर्ति कठिन है ।' साथ ही सारा समाज उसके लिए रोता है ; उसका वियोग सबको खटकता है। परन्तु कोई पापी, अन्यायी, अत्याचारी या दुरात्मा इस संसार से विदा होता है, तो जनता प्रायः उसके विषय में कहा करती है--'अच्छा हुआ, पापी मर गया ! अच्छा किया, पापी को मार डाला ! यह सबको सताता था।' मतलब यह है कि पापी के मरने पर सभी खुशियाँ मनाते हैं, मिठाई बांटते हैं। पापी व्यक्ति
SR No.002476
Book TitlePrashna Vyakaran Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni
PublisherSanmati Gyanpith
Publication Year1973
Total Pages940
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_prashnavyakaran
File Size21 MB
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