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________________ तृतीय अध्ययन : अदत्तादान - आश्रव २७१ का वर्णन किया है । साथ ही सेना की मनोवृत्ति का भी विश्लेषण किया है । इतने साहसिक रूप से धनहरण का काम वे ही लोग करते हैं, जिनकी लालसा ए अत्यन्त बढ़ी हुई हैं | यह सब मूलार्थ से स्पष्ट है । लुद्धा धणस्स कज्जे समुद्दमझे हणंति, गंतूण जणस्स पोते – इस लम्बे वर्णन में उन लोगों की मनोवृत्ति, तरीकों तथा साहसिकता का उल्लेख किया है, जो समुद्रयात्रा करने वालों के जहाजों पर हमला करके उन्हें लूट लेते हैं । इसका आशय भी मूलार्थ में स्पष्ट किया गया है । लोभी मनुष्य धन के लिए किन-किन खतरों का सामना करता है; इस बात को समुद्र की भयंकरता का वर्णन करके शास्त्रकार ने स्पष्ट किया है । ... परदव्वहरा नरा परस्स दव्वाहि जे अविरया - इस अनुच्छेद में शास्त्रकार ने परद्रव्यहरण करने वाले लोगों की मनोवृत्ति का विश्लेषण किया है । मूलार्थ में इसका आशय स्पष्ट है । तव केई अदिन्नादाणं 'वसणसयसमावण्णा - इतने लम्बे वर्णन में . शास्त्रकार ने इस सूत्र पाठ का उपसंहार करते हुए चोरी करने वाले लोगों की दुर्दशा और संकटापन्न स्थिति को स्पष्ट किया है। चोरी करने वाले लोगों को अन्न, पानी, निवास, शयन आदि के भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ता है; राजदण्ड से बचने के लिए अपनी जान को जोखिम में डाल कर वे वनों में भूखे-प्यासे रहते हैं, रात-दिन भयभीत रहते हैं, भयंकर हिंस्र-जन्तुओं व जंगली जानवरों के बीच में रहते हैं । उनकी सूरत, उनका स्वास्थ्य, उनके परिवार की हालत, उनके बालकों की शिक्षा-दीक्षा तथा संस्कार से रहित हो जाने की परिस्थिति, उनकी लोभवश परस्पर भय, आशंका और आर्त्तरौद्रध्यान से रात-दिन घिरी हुई मनःस्थिति और सैकड़ों व्यसनों और कष्टों से घिरी हुई उनकी जिंदगी का स्पष्ट विश्लेषण शास्त्रकार ने इस मूलपाठ में कर दिया है जिसका अर्थ स्पष्ट है । चोरी के भयंकर कुकृत्यों के कारण मनुष्य की अनमोल जिंदगी धूल में मिल जाती है । चोरी करने वालों को अपने जीवन में किसी भी अच्छी चीज की उपलब्धि नहीं होती । इस प्रकार का नारकीय जीवन व्यतीत करके चोर अपने आपको स्वयं गुमराह करते हैं | आत्म - वंचना के साथ-साथ समाज - वंचना करके चोर अपने अमुल्य जीवन को दुःखी, अशान्त, अस्वस्थ एवं निरर्थक बना लेते हैं। समाज के सभ्य लोगों की दृष्टि में वे घृणित बन जाते हैं, सरकार की निगाहों में वे अपराधी समझे जाते हैं और धर्मात्मा पुरुषों की नजरों में वे पापी और अधर्मी माने जाते हैं ! भला यह भी कोई जीवन है, जिसमें अपने शरीर, मन और परिवार को कोई सुख नहीं मिलता ? जिसमें सिवाय तकलीफों और खतरों के कोई लाभ नहीं ? इतने कष्टों के बाद प्राप्त
SR No.002476
Book TitlePrashna Vyakaran Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni
PublisherSanmati Gyanpith
Publication Year1973
Total Pages940
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_prashnavyakaran
File Size21 MB
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