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________________ १७२ श्री प्रश्नव्याकरण सूत्र मुगन्धित धूप आदि देने एवं फूलों व फलों से परिपूर्ण विधि से (सीसोवहारे) बकरे आदि पशुओं के सिरों को बलि (देह) दो, (य) और (बहुविहेण) नाना प्रकार की, (पाणाइवायकरणेणं) हिंसा करके (विवरीउप्पायदुस्सुमिण-पावसउण-असोमग्गहचरिय-अमंगलनिमित्तपडिघायहे) अशुभसूचक उत्पात, प्रकृतिविकार, खोर्ट स्वप्न, बुरे शकुन, क्रूरग्रह की चाल, अमंगलनिमित्तसूचक अंगस्फुरण आदि के फल को नष्ट करने के लिए (पायच्छित्ते पापोपशमनार्थ प्रायश्चित्त (करेह) करो। (वित्तिच्छेयं करेह) आजीविका को नष्ट कर डालो, (मा देह किंचि दाणं) किसी को कुछ भी. दान मत्त दो, (सुठ्ठ हओ सु? हओ) अच्छा हुआ, मारा गया, अच्छा हुआ, मारा गया ! (सुठु छिन्नो) अच्छा हुआ काट डाला गया, (भिन्नो) टुकडे हो गए, (इति) इस प्रकार (उवदिसंता) किसी के बिना ही पूछे उपदेश करते हुए या कहते हुए मनुष्य (मणेण) मन से, (वायाए) वाणी से, (य) और (कम्मुणा) कर्म से (एवंविहं) इस प्रकार के (अलियं) द्रव्य से सत्य होते हुए भी प्राणिहिंसा का कारण होने से असत्य भाषण, (करेंति) करते हैं । (वे कौन ?) (अकुसला) हिंसक और अहिंसक या कहने और न कहने योग्य, वचन के रहस्य को समझने में अचतुर (अणज्जा) अनार्य (अलियाणा) मिथ्याशास्त्रों को मानने वाले। (अलियधम्मणिरया) असत्यधर्म में आसक्त, (अलियासु कहासु अभिरमंता) आत्मगुणों को घटाने वाली पापोत्तेजक झूठी कहानियों—(उपन्यासों नाटकों आदि) में आनन्द मानने वाले, (बहुप्पगारं वा) नाना प्रकार से (अलियं) मिथ्याभाषण (करेत्त) करके (तुट्ठा, संतुष्ट (होंति) होते हैं। ___मूलार्थ-कई पापिष्ठ, संयमहीन, व्रतरहित अथवा पापकर्मों से अविरत, कपटी, कुटिल. कट और चंचल स्वभाव के, क्रोधी, लोभी, भयातुर, हंसी-मखौल करने वाले, गवाही देने वाले, चोर, गुप्तचर (जासूस या भेदिये), भट (योद्धा), चुंगी के कर्मचारी अथवा कर, जकात वगैरह वसूल करने वाले, हारे हुए जुआरी, गिरवी (बंधक) रखने वाले, मायाचारी, कपटपूर्वक नाना कुवेषों के धारक, कपटी, वाणिज्य-व्यवसाय करने वाले, खोटा तौल और खोटा नाप करने या रखने वाले, खोटे सिक्कों से रोजी चलाने वाले, जुलाहे, सुनार तथा छींपे आदि कारीगर, ठगाई करने वाले, चोरी करने वाले, खुशामदखोर,तथा कोतवाल एवं व्यभिचारी दुष्टवादी, चुगलखोर और कर्जदार, किसी के बोलने से पहले ही उसके अभिप्राय को ताड़ने में कुशल, भूत और भविष्य काल की बातों को बताने में प्रवीण, बिना विचारे बोलने वाले, कमीने (नीच आत्माएँ), सत्पुरुषों के लिए अहितकारक ऋद्धि, रस और साता के गर्व में चूर, असत्य अर्थ की स्थापना करने में
SR No.002476
Book TitlePrashna Vyakaran Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni
PublisherSanmati Gyanpith
Publication Year1973
Total Pages940
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_prashnavyakaran
File Size21 MB
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