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________________ दृढ़प्रहारीमुनि द्वारा समभाव से उपसर्ग-सहन योगशास्त्र प्रथम प्रकाश श्लोक १२ (मुखिया) ने आव देखा न ताव, बेचारी गाय को कसाई के समान तलवार के एक ही झटके में मार डाली। दरिद्र ब्राह्मण, जो उक्त चोर से मुकाबला करने आया था, उसके मस्तक को भी तलवार के एक ही प्रहार से अनन्नास के पेड़ के समान काटकर जमीन पर गिरा दिया। उस समय उसकी गर्भवती पत्नी उसके सामने आकर चिल्ला उठी-'ओ निर्दय पापी यह क्या कर डाला तूंने?" परंतु उसने उसकी एक न सुनी और जैसे भेड़िया गर्भवती बकरी पर सहसा हमला कर देता है, वैसे ही उस क्रूर ने उस गर्भवती स्त्री पर हमला करके तलवार से उसके दो टुकड़े कर डाले। उसके गर्भ में जो बालक था उसके अंग के भी टुकड़े-टुकड़े हो गये। बेल के पत्तों की तरह थर-थर कांपते, तड़फड़ते और छटपटाते हुए उस बालक को देखकर पत्थर-से हृदय में भी करुणा के अंकूर फूटने लगे, ऐसा अत्यंत करुण दृश्य था। ठीक उसी समय ब्राह्मण के पुत्र जोर-जोर से करुण स्वर से 'हाय पिताजी, हाय पिताजी! इस प्रकार विलाप करते हुए वहाँ आये। भूखे, नंगधडंग, दुबले और शरीर पर मैल जमा होने से कालेकलूट बालकों को देखकर, दृढ़प्रहारी पश्चात्ताप करने लगा और विचार करने लगा-'हाय! मैंने निर्दयी बनकर इस ब्राह्मण-दंपती का वध कर डाला! इन बेचारे अभागे बालकों का अब क्या होगा? जैसे जलाशय में पानी के बिना मछलियाँ जीवित नहीं रह सकती हैं, वैसे ही ये बच्चे मातापिता के बिना कैसे जीवित रह सकेंगे? ओफ! यह क्रूर कर्म अब न मालूम मुझे किस दुर्गति में ले जायेगा? इस पाप के फल से मुझे कौन बचायेगा? अब मैं किसकी शरण लूँ?' इस तरह चिंतन करते-करते वैराग्यभाव जागृत हो गया। अतः गाँव में न जाकर गाँव के बाहर ही एक उद्यान में पहुंचा। वहाँ पाप रूपी रोग के निवारण के औषध के समान एक साधु-मुनिराज को देखा। हत्यारे दृढ़प्रहारी ने उन्हें नमस्कार किया और कहा-'भगवन्! मैं महापापी हूँ। इतना ही नहीं, मेरे साथ वार्तालाप करने वाला भी पापी हो जाता है। क्योंकि कीचड़ से लथपथ व्यक्ति को जो मनुष्य स्पर्श करता है, उसके भी कीचड़ लग जाती है। लोकमान्यता यह है कि बालक, स्त्री, ब्राह्मण और गाय इनमें से जो एक की भी हत्या करता है, वह अवश्य ही नरक का अधिकारी बनता है। मैंने तो निर्दय बनकर इन चारों की हत्या की है। प्रभो! मझ सरीखे निर्दय एवं पापी की रक्षा आप सरीखे पवित्र साधु ही कर सकते हैं।' वर्षा जब बरसती है, तब विचार नहीं करती कि यह उपजाऊ जमीन है या ऊषरभूमि?' उस पतितपावन मुनिवर ने उसे पाप से सर्वथा मुक्त होने के लिए तप-संयममय साधुधर्म का उपदेश दिया। सुनकर जिस तरह कोई गर्मी से घबराया हुआ मनुष्य छाता धारण करता है उसी तरह अतीव जिज्ञासा से पापाताप-भय से छुटकारा पाने हेतु उसने साधु धर्म स्वीकार किया। साथ ही यह अभिग्रह भी धारण किया कि जब तक यह पाप मुझे याद आयेगा, तब तक मैं भोजन नहीं करूँगा और सर्वथा क्षमा रलूँगा।' जिस कुशस्थल गांव में उसने पहले आतंक मचाया था, विहार करते हुए कर्मक्षय की इच्छा से महामना दृढ़प्रहारी मुनि उसी गांव के निकट पहुंच गये। गाँव के लोगों ने जब उसे देखा तो वे उसे पहचान गये और कहने लगे कि यह तो वही पापियों का शिरोमणि है, महापापी है, धूर्त ने अब कपट से साधुवेष पहन लिया है। मार भगाओ इसे।' कई लोग कहने लगे-'यह तो वही गौ, ब्राह्मण, बालक और स्त्री का हत्यारा है। ढोंगी कहीं का! आने दो इसे मजा चखायेंगे!' यों कई दिनों तक लोग तरहतरह से उस महात्मा को कोसते, डांटते, फटकारते एवं निंदा करते रहे। जहां कहीं भी वह भिक्षा के लिए जाता था, वहीं पर लोग उसको उसी प्रकार ढेले से मारते थे, जैसे कुत्तों को ढेले से मारा जाता है। इस प्रकार दृढ़प्रहारी मुनि प्रतिदिन गाँव में भिक्षा आदि के लिए जब जाता तो ये निंदामय बातें सुनता रहता था, इस कारण उसे अपने पाप याद आ जाते थे और वह अपनी प्रतिज्ञानुसार किसी को प्रत्युत्तर न देकर क्षमाभाव रखता था; आहार भी नहीं करता था। सच है साहसी आत्मा के लिए कुछ भी दुष्कर नहीं है। किसी समय प्रातःकाल, किसी समय दोपहर को और किसी समय संध्या को जब भी उसे गाँव के लोग मिलते, उसके पूर्वपापों का स्मरण दिला देते थे। अतः एक दिन भी उसने भोजन नहीं किया। लोग उस मुनि को ढेले, लाठी, मुष्टि इत्यादि से मारते थे, उस पर धूल उछालते थे; फिर भी वह उन सारे उपद्रवों को समभाव से सहन करता था और ऐसी भावना किया करता था-आत्मन्! तूंने जिस प्रकार से पाप किये हैं, उसी प्रकार से पाप-फल को भोग! जैसा बीज बोया है, वैसा ही तो फल मिलता है। यह तो बहुत ही अच्छा है कि ये लोग मुझ पर आक्रोश करके अनायास ही मुझे सकामनिर्जरा की सिद्धि का अवसर दे रहे हैं। मुझ पर आक्रोश करने वालों के दिल में हर्ष उमड़ता है तो भले ही उमड़े; मैं उनके कटुवचनों को प्रेम से सहन करता हूँ। इस कारण .38
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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