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________________ योग के प्रभाव से प्राप्त लब्धियाँ योगशास्त्र प्रथम प्रकाश श्लोक ८ सनत्कुमार चक्रवर्ती की कथा : हस्तिनापुर नगर में षट्खण्डाधिपति सनत्कुमार नामक चौथा चक्रवर्ती राज्य करता था। एक बार सुधर्मा नाम की देवसभा में इन्द्र महाराज ने विस्मित होकर उसकी अप्रतिम रूप संपदा की प्रशंसा की-'कुरुवंश-शिरोमणि सनत्कुमार चक्रवर्ती का जिस प्रकार का रूप है, वैसा आज देवलोक में या मनुष्यलोक में किसी का भी नहीं है।' इस प्रकार की रूप-प्रशंसा पर विश्वास न करके विजय और वैजयंत नाम के दो देव सनत्कुमार की परीक्षा करने के लिए मर्त्यलोक में आये। उन दोनों देवों ने यहाँ आकर ब्राह्मण का रूप बनाया और सनत्कुमार के रूप को देखने के लिए उसके राजमहल के द्वार पर द्वारपाल के पास आये। सनत्कुमार भी उस समय स्नान करने की तैयारी में था। सभी पोशाक खोलकर वह केवल एक कटिवस्त्र पहने हुए तेल मालिश करवा रहा था। द्वारपाल ने दरवाजे पर खड़े दो ब्राह्मणों के आगमन के बारे में सनत्कुमार चक्रवर्ती से निवेदन किया। अतः न्यायसंपन्न चक्रवर्ती ने उसी समय उनका प्रवेश कराया। सनत्कुमार को देखकर विस्मय से आँखे तरेरते हुए वे दोनों देव सिर हिलाते हुए विचार करने लगे-अहो! अष्टमी की रात्रि के चन्द्रसदृश इसका ललाट है, कान तक पहुंचे हुए दो नेत्र हैं, नील-कमल को मात करने वाली इसकी शरीर-कांति है? पक्के बिंबफल के समान कांतिमय ओठ हैं, सीप के समान दो कान हैं, पँचजन्य शंख से भी श्रेष्ठ इसकी गर्दन है, हाथी की सूंड को मात करने वाले दो हाथ हैं, मेरुपर्वत की शोभा को भी हरण करने वाला इसका वक्षःस्थल है, सिंह-शिशु के उदर के समान इसकी कमर है, अधिक क्या कहें, इसके पूर्ण शरीर की शोभा वर्णनातीत है। अहो! चंद्रमा की चांदनी के समान इसके लावण्य को नदी के प्रवाह में स्नान करके शरीर को स्वच्छ करने वाला हम नहीं जान सकते। इंद्रमहाराज | ने इसके रूप का जैसा वर्णन किया था, उससे भी अधिक उत्तम इसका रूप है। महापुरुष कभी असत्य नहीं बोलते इतने में चक्रवर्ती बोला-'विप्रवरो, आप दोनों यहाँ किस प्रयोजन से आये हैं?' तब उन्होंने कहा 'हे नरसिंह! इस चराचर जगत् में तुम्हारा रूप लोकोत्तर और आश्चर्यकारी है। दूर-दूर से तुम्हारे रूप का वर्णन सुनकर हमारे मन में इसे देखने का कुतूहल पैदा हुआ, इस कारण हम यहाँ आये हैं। आज तक हमने आपके अद्भुत रूप का वर्णन सुना था, आँखों से देखा नहीं था; परंतु आज आपका रूप देखकर आँखों को तृप्ति हुई। तब मुस्कराकर सनत्कुमार ने कहा'विप्रवरो! तेल मालिश किये हुए शरीर की कांति तो कुछ भी नहीं है; कुछ देर ठहरो, बैठो और मेरा स्नान हो जाय तब तक जरा इंतजार करो। देखो, जब मैं अनेक आश्चर्यकारी विविध वेष-भूषा और बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित हो जाऊँ, तब रत्नजड़ित सुवर्ण के समान मेरा रूप देखना।' यों कहकर सनत्कुमार स्नान करके वेष-भूषा एवं अलंकार आदि धारण करके आकाश में चंद्र की तरह सुशोभित होकर राज सभा में सिंहासन पर बैठे। राजा ने उसी समय दोनों ब्राह्मणों को बुलाया। अतः राजा के सामने आकर राजा के रूप को निहारकर दोनों विचार करने लगे-'कहाँ वह रूप एवं कांति और कहाँ अब का यह फीका रूप और लावण्य! सचमुच संसार के सभी पदार्थ क्षणिक है।' राजा ने पूछा'विप्रवरो! पहले मुझे देखकर आप हर्षित हुए थे; अब आपका मुख विषाद से एकदम मलिन क्यों हो गया?' तब अमृतोपम वचनों से वे कहने लगे-'हे महाभाग! हम दोनों सौधर्म देवलोक के निवासी देव हैं। इन्द्रमहाराज ने देवसभा में आपके रूप की प्रशंसा की थी! उनके कथन पर हमें विश्वास नहीं हुआ। अतः हम मनुष्य का रूप बनाकर आपका | रूप देखने के लिए यहाँ आये हैं। इंद्रमहाराज द्वारा वर्णित आपका रूप पहले हमने यथार्थ रूप में देखा था; परंतु वर्तमान में वह रूप वैसा नहीं रहा है। जैसे निश्वास से दर्पण मलिन हो जाता है, वैसे ही अब आपकी शरीर की कांति मलिन हो गयी है। आपका रूप विकृत हो गया है, लावण्य फीका पड़ गया है। अब आपका शरीर अनेक रोगों से घिरा हुआ है।' इस तरह सच-सच बात बताकर वे दोनों देव अदृश्य हो गये। राजा ने झुलसे हुए वृक्ष के समान अपने निस्तेज शरीर को देखा। वह विचार करने लगा-सदैव रोग के घर के समान इस शरीर को धिक्कार है! मंदबुद्धि मूर्ख व्यर्थ ही इस पर ममता करते हैं। जैसे बड़े लक्कड़ को भयंकर घुन खाते हैं; वैसे ही शरीर में उत्पन्न हुए विविध प्रकार के भयंकर रोग इस शरीर को खा जाते हैं। बाहर से यह शरीर चाहे कितना ही अच्छा दिखे, मगर बड़ के फल के समान अंदर से तो कीड़ों से व्यास होता है। जैसे सुशोभित महासरोवर के पानी पर शैवाल छा जाने से उसकी शोभा नष्ट हो जाती है, वैसे ही इस शरीर पर रोग छा जाने से वह इसकी रूप संपत्ति 14
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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