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________________ मानकषाय और उसके कुफल योगशास्त्र चतुर्थ प्रकाश श्लोक १२ से १३ दुःखी होने के बजाय यह विचार करो कि-कहने वाला यदि मुझे सत्य कहता है, तो उस पर कोप क्यों किया जाय? यदि वह झूठ बोलता है तो उन्हें उन्मत्त-(पागल) के वचन मान लिये जाय! यदि कोई वध करने के लिए आता है तो मुस्कराकर उसकी ओर देखे कि वध तो मेरे कमों से होने वाला है, यह मूर्ख वृथा ही नृत्य करता है। यदि मारने आये तो अपने मन में ऐसा विचार करे कि मेरा आयष्यकर्म पूर्ण होने पर ही मेरी मत्य होगी। या ऐसा विचार करे कियदि मेरे पाप नहीं होते तो यह बेचारा मुझे क्यों मारने आता? सभी पुरुषार्थों के हरणकर्ता क्रोध पर तो तं क्रोध नहीं। करता. तो फिर अल्प अपराध करने वाले दसरे पर तं इतना क्रोधित क्यों होता है? इसलिए धिक्कार है तझे। सभी इंद्रियों को शिथिल करने वाले उग्र सर्प के समान आगे बढ़ते हुए क्रोध को जीतने के लिए बुद्धिमान सपेरे की विद्या के समान लगातार निर्दोष क्षमा धारण करो ।।११।। अब मान-कषाय का स्वरूप कहते हैं।३३८।विनय-श्रुत-शीलानां, त्रिवर्गस्य च घातकः । विवेक-लोचनं लुम्पन्, मानोऽन्धकरणो नृणाम् ।।१२।। अर्थ :- मान विनय का, श्रुत का और शील-सदाचार का घातक है तथा धर्म, अर्थ और काम तीनों का घातक है। मान मनुष्यों के विवेक रूपी चक्षु को नष्ट करके अंधा बना देता है ।।१२।। व्याख्या :- मान गुरुजन आदि बड़े लोगों के प्रति उपचार रूप विनय, श्रुत अर्थात् विद्या, शील अर्थात् सुंदर स्वभाव का घातक है। जाति आदि के मद में पिशाच-सम अभिमानी बनकर व्यक्ति गुरु आदि का विनय नहीं करता। गरु की सेवा नहीं करने से अविनयी विद्या प्राप्त नहीं कर सकता. इसके कारण सभी लोगों की अवज्ञा करने वाला अपना दुःस्वभाव प्रकट करता है। मान केवल विनयादि का ही घातक नहीं है, बल्कि धर्म, अर्थ और काम रूपी त्रिवर्ग का भी घातक है। अभिमानी व्यक्ति इंद्रियों को वश नहीं कर सकता; इससे उसमें धर्म कैसे हो सकता है? मानी मनुष्य अक्कड़पन के कारण राजादि की सेवा में परायण नहीं होने से अर्थ की प्राप्ति कैसे कर सकता है। काम की प्राप्ति भी व्यक्ति मृदुता होने पर ही कर सकता है। लूंठ के समान अभिमान में अक्कड़ बना हुआ कामपुरुषार्थ कैसे सिद्ध कर सकता है? | जो व्यक्ति पहले देखता था; और उसे बाद में मानकषाय अंधा बना देता है। वह किसको? मनुष्य को। क्या करता है? कृत्य-अकृत्य चिंतन रूप विवेक-लोचन का लोप कर देता है। एक तो निर्मल चक्षु वह सहज विवेक होता है। इस वचन से विवेक ही नेत्र कहलाता है। ज्ञान-वृद्धों की सेवा नहीं करने वाला मानी अपने विवेक-लोचन का अवश्य लोप (नाश) करता है। अतः मान अंधत्व पैदा करता है; यह सहज ही समझी जाने जैसी बात है ।।१२।। ___ अब मान के भेद बताकर उसके फल कहते हैं||३३९। जाति-लाभ-कुलैश्वर्य-बल-रूप-तपः श्रुतैः । कुर्वन् मदं पुनस्तानि, हीनानि लभते जनः ॥१३॥ अर्थ :- जो व्यक्ति जाति, लाभ, कुल, ऐश्वर्य, बल, रूप, तप और ज्ञान; इन मद के आठ स्थानों (कारणों) में जिस किसी का मद करता है; वह जन्मांतर में उसी की हीनता प्राप्त करता है ।।१३।। व्याख्या :- इस विषय पर आंतरश्लोकों का भावार्थ कहते हैं-उत्तम, मध्यम और अधम आदि अनेक प्रकार जाति भेद देखकर समझदार मनुष्य कभी जातिमद नहीं करता। शभकर्म के योग से उत्तमजाति मिलने के बाद फिर अशुभकर्म के योग से हीनजाति में जन्म लेता है, इस प्रकार अशाश्वत जाति प्राप्त कर कौन मनुष्य जाति का अभिमान करेगा? अंतरायकर्म के क्षय होने से लाभ (कोई पदार्थ प्राप्त) होता है, उसके बिना नहीं। अतः वस्तुतत्त्व को जानने वाला लाभमद नहीं करता। दूसरे की कृपा से अथवा दूसरे के प्रयत्न आदि से महान् लाभ होने पर भी महापुरुष किसी भी प्रकार से लाभमद नहीं करते। अकुलीन की बुद्धि, लक्ष्मी और शीलसंपन्नता देखकर महाकुल में जन्म लेने वाला कुलमद न करे। 'कुल का कुशीलता और सुशीलता से क्या संबंध है? इस प्रकार जानकर विचक्षण पुरुष कुलमद नहीं करते। वज्र को धारण करने वाले इंद्र के तीन लोक के ऐश्वर्य (वैभव) को जान-सुनकर कौन ऐसा व्यक्ति होगा, जो किसी शहर, गांव, धन, धान्य आदि के ऐश्वर्य का अभिमान करेगा? दुःशीला (बदचलन) स्त्री के समान निर्मलगुण वाले के पास से भी ऐश्वर्य चला जाता है और दोषों का सहारा करता है; इसलिए विवेकी पुरुष को ऐश्वर्य का अहंकार नहीं करना चाहिए। बड़े-बड़े महाबली भी रोग आदि के कारण क्षण में निर्बल हो जाते हैं। इसलिए पुरुष में बल अनित्य होने से 335 क
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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