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________________ स्थूलभद्र मुनि का कोशावेश्या के यहां सफल चातुर्मास योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १३१ प्रसन्न होकर राजा चाहे और उसे यह तन अर्पण करना पड़े तो उस एक पुरुष को छोड़कर अन्य सभी पुरुषों का मैं त्याग करती हैं। इस तरह स्थूलभद्रमुनि ने सुखपूर्वक चौमासा पूर्ण किया। ___ तीनों मुनि अपने-अपने अभिग्रह के अनुसार चौमासा पूर्ण करके क्रमशः गुरु-चरणों में पहुंचे। सिंहगुफावासी साधु आया, तब गुरु ने कुछ खड़े होकर उसे कहा-दुष्करकारक, वत्स! तुम्हारा स्वागत करता हूं। इसी तरह और दो साधु भी आये उनका भी गुरुमहाराज ने दुष्करकारक कहकर स्वागत किया। एकसरीखी प्रतिज्ञा करने वाले को स्वामी भी समान सत्कार देते हैं। इसके बाद पूर्ण-प्रतिज्ञ स्थूलभद्र भी गुरुदेव की सेवा में आये; तब गुरुमहाराज ने खड़े होकर कहा-दुष्कर-दुष्करकारक! महात्मन् तुम्हारा स्वागत करता हूं। यह सुनकर पहले आया हुआ एक मुनि ईर्ष्या से जल भुन गया। वह मन ही मन सोचने लगा। गुरुजी ने मंत्रीपुत्र होने के कारण स्थूलभद्र मुनि का पक्ष लिया है और उत्तम शब्दों से संबोधित किया है। यदि षट्रसभोजन करने वाले का कार्य दुष्कर-दुष्कर है तो मैं भी अगले वर्ष वैसी ही प्रतिज्ञा करूंगा। इस प्रकार मन में निश्चित कर लिया। आठ महीने संयम की आराधना करते हुए उक्त मुनि ने पूर्ण किये। वर्षाकाल आते ही कर्जदार के समान सिंहगुफावासी साधु हर्षित होकर गुरुमहाराज के पास पहुंचा और उनके सामने अपनी प्रतिज्ञा दोहरायी। भगवन्! इस वर्ष में कोशा-वेश्या के यहां रहकर सदा षट्रसयुक्त भोजन करते हुए चौमासा बिताऊंगा। गुरुदेव ने ज्ञान में उपयोग लगाकर देखा और विचार किया कि केवल स्थूलभद्र के प्रति ईष्या से इसने यह अभिग्रह अंगीकार किया है। अतः उसे कहा-वत्स! यह अभिग्रह दुष्करातिदुष्कर है। तुम इसके पालन में समर्थ नहीं हो! इसलिए ऐसा अभिग्रह मत करो। उसमें पूर्णतया उत्तीर्ण होने में तो मेरु समान स्थिर स्थूलभद्र ही समर्थ है। इस पर उस मुनि ने प्रतिवाद करते हुए गुरु से कहा-मेरे लिये तो यह कुछ भी दुष्कर नहीं है, तो फिर दुष्कर-दुष्कर की बात ही कहां रही? अतः मैं इस अभिग्रह में अवश्य ही सफल बनूंगा। गुरु ने कहा-इस अभिग्रह से तुम भविष्य के लिए भी भ्रष्ट और पूर्वकृत तप-संयम से भी नष्ट हो जाओगे; क्योंकि बलबूते से अधिक बोझ उठाने से अंगोपांगों का नाश होता है। किन्तु अपने आपको पराक्रमी समझने वाले उस मुनि ने गुरु-वचन को ठुकराकर कामदेव के निवासगृह के समान कोशागणिका के भवन की ओर प्रस्थान किया। दूर से आते मुनि को देखकर कोशा ने विचार किया कि मालूम होता है कि यह मुनि स्थूलभद्रमुनि के प्रति ईर्ष्या के कारण ही मेरे यहां आ रहा है। फिर भी मुझे श्राविका होने के नाते इसे पतित होने से बचाना चाहिए। यों सोचकर वेश्या ने खड़े होकर मुनि को वंदन किया। मुनि ने सती कोशा से उनकी चित्रशाला चार माह रहने के लिए मांगी। ने सहर्ष चित्रशाला खोल दी और उसमें ठहरने की अनुमति दे दी। मुनि ने उसमें प्रवेश किया और रहने लगा। षट्रसयुक्त भोजन के बाद मध्याह्न में मुनि की परीक्षा के लिए रूप-लावण्य-भंडार कोशा उनके पास आयी। कोशा की कमल-सी आंखें देखते ही मुनि एकदम विकार युक्त हो गये। जिस प्रकार की रूपवती स्त्री थी, उसी प्रकार का स्वादिष्ट विविधरसयुक्त भोजन मिल जाय तो विकार पैदा होने में क्या कमी रह सकती है? कामज्वर से पीड़ित मुनि ने कोशा से सहवास की प्रार्थना की। उसके उत्तर में कोशा ने कहा-भगवन्! हम ठहरी वेश्या! हम तो धन देने से ही वश में | हो सकती है। मुनि ने कहा-मृगलोचने! तुम मुझ पर प्रसन्न हो; मगर बालू में से तेल प्राप्त हो तो हमारे पास से धन प्राप्त हो सकता है। यह तो असंभव है, प्रिये! कोशा ने प्रतिबोध देने के लिहाज से मुनि से कहा-असंभव क्यों है? नेपालदेश के राजा से कोई पहली बार ही मिले, जिसे उसने पहले कभी देखा न हो, तो उस साधु को वह रत्नकंबल भेंट देता है। अतः आप वहां जाकर रत्नकंबल ले आइए। कोशा ने तो मुनि को विरक्ति हो जाने की दृष्टि से कहा था लेकिन उस बात को वह मुनि बिलकुल सच्ची मान बैठा और अपनी साधुमर्यादा को ठुकराकर अनेक विघ्न वाला वर्षाकाल होने पर भी बालक की तरह अपने व्रतों को पापपंक से लिप्स मिट्टी में मिलाते हुए वह चौमासे में ही वहां से चल पड़ा। नैपाल पहुंचकर राजा से रत्नकंबल लेकर मुनि वापिस आ रहा था कि रास्ते में एक चोरपल्ली दिखायी दी; जहां बहुत से चोर रहते थे। उन्होंने एक तोता पाल रखा था। उसने मुनि को देखकर कहा-लाख मूल्य वाला आ रहा है। यह सुनकर पेड़ पर बैठे चोरों के राजा ने दूसरे चोर से पूछा-यह कौन आ रहा है? उसने कहा-कोई भिक्षु आ रहा है और उसके पास कुछ दिखता तो है नहीं। साधु जब पास में आया, तब चोरों ने पकड़कर उसकी अच्छी तरह तलाशी ली। मगर उसके पास कुछ भी न मिला। अतः चोरों ने उसे निर्द्रव्य जानकर छोड़ दिया। किन्तु उसके जाने 313
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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