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________________ धन्ना-शालिभद्र मुनियों द्वारा अनशन और माता भद्रा द्वारा खेद-प्रकाशन योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक ८८ इधर शालिभद्र विरक्त होकर घरबार छोडने का विचारकर रहा था। इसी दौरान उसका एक धर्ममित्र आया और | नम्र निवेदन करने लगा-सुरासुरवंदित, साक्षात् धर्ममूर्ति चारज्ञान के धनी धर्मघोष मुनिवर इस नगर के बाहर उद्यान में पधारे हैं। शालिभद्र सुनकर अत्यंत हर्षित हुआ और रथ में बैठकर उनके दर्शनार्थ पहुंचा। वह आचार्य धर्मघोष तथा | अन्य मुनियों के चरणों में वंदना-नमस्कार करके उपदेश-श्रवण के लिए उनके सामने बैठा। उपदेश के बाद शालिभद्र |ने उनसे सविनय पूछा-भगवन्! कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे मेरे सिर पर दूसरा कोई स्वामी न रहे? आचार्य श्री ने कहा-मुनि दीक्षा ही ऐसा उपाय है, जिससे सारे जगत् का स्वामित्व प्राप्त किया जा सकता है? नाथ! यदि ऐसा ही है तो मैं अपनी माताजी से आज्ञा प्राप्त करके मुनिदीक्षा ग्रहण करूंगा। इस प्रकार शालिभद्र ने जब कहा तो उत्तर में | | आचार्यश्री ने कहा-तो बस, इस कार्य में जरा भी प्रमाद न करो। शालिभद्र वहां से सीधा घर आया और अपनी माता | को नमस्कार करके कहा-माताजी! आज मैंने धर्मघोष आचार्य के श्रीमुख से जगत् के दुःखों से मुक्ति का उपायभूत धर्म सुना है! 'वत्स! धर्मश्रवण करके तूंने अपने कान पवित्र किये! बहुत अच्छा किया। ऐसे ही धर्मात्मा पिता का तूं पुत्र है।' इस प्रकार माता ने प्रशंसात्मक शब्दों में धन्यवाद दिया। शालिभद्र ने माता से कहा-माताजी! यदि ऐसा ही है और मैं उस धर्मात्मा पिता का पुत्र हूं तो आप मुझ पर प्रसन्न होकर आशीर्वाद दें, ताकि दीक्षा ग्रहण करके मैं स्वपरकल्याण कर सकू। माता ने अधीर होकर कहा-पुत्र! तेरे लिए अभी तो श्रावकव्रत पालन करना ही उचित है, महाव्रत पालन करना तो लोहे के चने चबाने के समान है। अभी तेरा शरीर बहुत ही सुकुमार है। तेरा लालन-पालन भी दिव्य-भोग-साधनों द्वारा हुआ है। छोटा बछड़ा जैसे रथ के भार को सहन नहीं कर सकता। वैसे ही अभी तूं संयम के भार को सहन नहीं कर सकेगा! शालिभद्र ने सविनय उत्तर दिया-मां! जो पुरुष भोगसाधनों का उपभोग कर सकता है, वह अगर महाव्रतों के कष्ट को नहीं सह सकता तो, उसके समान कायर और कोई नहीं है। माता ने दुलार करते हुए कहा-बेटा! अभी तो तूं मर्त्यलोक की पुष्पमाला की गंध को सहन कर, और भोगों को छोड़ने का अभ्यास कर। धीरे-धीरे अभ्यास से सुदृढ़ हो जाने पर फिर मुनिदीक्षा अंगीकार करना। शालिभद्र भी माता का वचन मानकर प्रतिदिन एक पत्नी और एक शय्या (बिछौने) का त्याग करने लगा। राजगृह में ही शालिभद्र की छोटी बहन सुभद्रा का पति धन्ना सार्थवाह रहता था। वह जितना महाधनाढ्य था, उतना ही धर्मवीर भी था। एक दिन सुभद्रा धन्ना को स्नान करा रही थी, तभी उसकी आंखों से गर्म अश्रुबिन्दु धन्ना की पीठ पर टपक पड़े। धन्ना एकदम चौंककर बोल उठे-प्रिये! आज तुम्हारी आंखों में आंसू क्यों? सुभद्रा ने गद्गद् स्वर में कहा-प्राणनाथ! मेरा भैया भगवान् महावीर के पास मुनिदीक्षा लेने की इच्छा से रोजाना एक पत्नी और एक शय्या छोड़कर चला जा रहा है। ३२ दिनों में वह सभी पत्नियों और शय्याओं का त्यागकर देगा और मुनि बन जायगा। पीहर में तो बहन के लिए भाई का ही आधार होता है! उसे याद करके मन भर आया और अश्रुबिन्दु गिर पड़े। धन्ना ने उपहास करते हुए कहा- तुम्हारा भाई कायर है, गीध के समान डरपोक और दुर्बल है, जो इस प्रकार धीरे-धीरे त्यागकर रहा है। महाव्रत ग्रहण करना है तो एक ही दिन में क्यों नहीं ग्रहण कर लेता? सुभद्रा ने कहा-प्रियतम! कहना सरल है, करना बड़ा कठिन है। यदि महाव्रत ग्रहण करना सरल है तो आप क्यों नहीं ग्रहण कर लेते? धन्ना ने प्रत्युत्तर में कहा-मेरे महाव्रत ग्रहण करने में तुम ही बाधक थी, इसलिए मैं अब तक महाव्रत न ले सका। अब पुण्ययोग से तुमने ही मुझे प्रोत्साहित करके अनुमति दे दी है। तो लो, आज से तुम मेरी बहन के समान हो, अभी अविलंब मैं दीक्षा ग्रहण करूंगा। सुभद्रा ने कहा-नाथ! यह तो मैंने मजाक में कहा था। आपने उसे सच मान लिया। अतः कृपा करके सदा लालितपालित लक्ष्मी और हमें मत छोड़िए। मगर धन्ना को संयम का रंग लग चुका था। उसने कहा-यह लक्ष्मी और स्त्री सभी अनित्य हैं। इसलिए इनका त्याग करके शाश्वतपद प्राप्त करने की इच्छा से मैं अवश्य ही दीक्षा ग्रहण करूंगा। यों कहकर धन्ना उसी समय उठ खड़ा हुआ। सुभद्रा आदि धन्ना की पत्नियों ने कहा-ऐसी बात है, तो हम भी आपका अनुसरण करके दीक्षा ग्रहण करेंगी। अपने को धन्य मानते हुए महामना धन्ना ने उन्हें सहर्ष अनुमति दे दी। संयोगवश श्रमण भगवान् महावीर भी विचरण करते-करते राजगृह के वैभारगिरि पर पधार गये। अतः धन्ना को उसके धर्ममित्र ने ये समाचार दिये। धन्ना भी अपनी अपार संपत्ति का दान करके अपनी पत्नियों के साथ शिविका में बैठकर श्री महावीर प्रभु के चरणों में पहुंचे और जन्ममरण के भय से उद्विग्न धन्ना ने अपनी पत्नियों सहित दीक्षा अंगीकारकर 224
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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