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________________ अर्थ लोलुप नंदराजा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ११३ महत्वाकांक्षी निस्तेज एवं शोभारहित राजा को देखकर उनसे मिला और नमस्कार करके उनके सामने बैठ गया। राजा से अनुज्ञा लेकर दूत बोला-'मेरे स्वामी का संदेश सुनकर आप गुस्सा न करें। मधुर बोलने वाले कभी हितैषी नहीं होते। कर्णपरंपरा से आपकी निंदा सुनी थी, लेकिन आज तो मैंने प्रत्यक्ष ही अनुभव कर लिया। लोगों का कथन सर्वथा निराधार नहीं होता। अन्याय से प्राप्त किया हुआ धन का एक अंश भी राजा के तमाम यश को धो डालता है। तूम्बे के फल का एक दाना भी गुड़ की मिठास को नष्टकर देता है। राजा प्रजा को अपनी आत्मा के तुल्य समझे। राजा के द्वारा प्रजा का उच्छेदन करना उचित नहीं होता। मांसाहारी कभी अपना मांस नहीं खाता। इसलिए अपनी प्रजा का पोषण कीजिए। पोषित प्रजा ही राजा का पोषण करती है। गाय दीन-हीन और अधीन होते हुए भी चारे दाने से पोषित किये बिना दूध नहीं देती। लोभ समस्त गुणों का विनाशक है। इसलिए आप लोभ का त्याग कीजिए। हमारे जनप्रिय राजा ने आपके हित की दृष्टि से यह संदेश भिजवाया है। दावाग्नि से जली हुई भूमि पर पानी पड़ते ही जैसे गर्म धुऔंसा उठता है, वैसे ही उस दूत की बात नंद के कानों में पड़ते ही नंदराजा ने उष्णवचन रूपी गर्म धुंए के समान उद्गार निकाले-बस, चुप हो जा, मुझे उपदेश देने की जरूरत नहीं है। तूं राजदूत होने के कारण अवध्य है; भाग जा यहां से! यों कहकर नंदराजा तुरंत वहां से उठकर सिरदर्द वाले रोगी की भांति अपने गर्भगृह में चला गया। 'जवासा जैसे जलधारा को ग्रहण नहीं करता, वैसे ही यह राजा मेरी उपदेशधारा को ग्रहण नहीं करता, इसलिए उपदेश के अयोग्य है।' यों सोचकर दूत भी अपने राजा के पास अयोध्या लौट आया। अन्याय के पाप के फल स्वरूप नंदराजा के शरीर में पीड़ा देने वाले भयंकर रोग पैदा हुए। उन रोगों के कारण उसे इतनी वेदना होती थी, मानो नरक के परमाधार्मिक | असुरों द्वारा दी हुई वेदना हो। उस भयंकर वेदना से पीड़ित होकर राजा ज्यों-ज्यों आक्रंद करता था, त्यों-त्यों प्रजाजन उससे आनंद महसूस करता था। नंदराजा के शरीर और मन में इतनी भयंकर वेदना थी, मानो आग में पक रहा हो, या भाड़ में चने के समान भुन रहा हो अथवा आग में झुलस रहा हो। पापात्मा के लिए तो यह सब बहुत ही थोड़ा माना जाता है। हाय! इस पृथ्वी पर मैंने सोने के पहाड़ खडे किये; जगह-जगह सोने के ढेर लगाये; अब इनका मालिक कौन होगा? मैं तो इतने सोने का जरा-सा भी आनंद नहीं ले सका। अफसोस! मैं तो रात-दिन सोना इकट्ठा करने की ही तरकीबें सोचता रहा, इसी में लगा रहा! अब मेरा क्या होगा? यो आर्तनाद करता हुआ एवं अपने परिग्रह पर गाढ़ मूर्छा करता हुआ अतृप्त नंद राजा चल बसा। उसने संसार के असीम दुःख प्राप्त किये। यह है नंद की परिग्रहकथा! परिग्रह ग्रहण करने के अभिलाषी योगियों के भी मूलव्रतों को हानि पहुंचती है, इस बात को अब प्रस्तुत करते हैं।१६९। तपःश्रुतपरिवारां, शमसाम्राज्यसम्पदम् । परिग्रहग्रहग्रस्तास्त्यजेयुर्योगिनोऽपि हि ॥११३॥ . अर्थ :- परिग्रह रूपी ग्रह से ग्रस्त योगीजन भी तप और ज्ञान के परिवार वाली शमसाम्राज्य-संपत्ति को छोड़ बैठते हैं ॥११३।। व्याख्या :- सामान्य मानव की बात तो दूर रही, ज्ञान-दर्शन-चारित्र रूपी रत्नत्रय से सुशोभित योगीजन भी परिग्रह रूपी ग्रह के चंगुल में फंसकर जरा-से भी सुख में लुब्ध हो जाय तो अपने वशीभूत भूत-प्रेतों के समान तप, त्याग और श्रुतज्ञान के परिवार वाले शम (संतोष) रूपी साम्राज्य संपत्ति को भी तिलांजलि दे बैठते है। अर्थात् अपने मूलगुणों को भी तिलांजलि देकर लोभ रूपी पिशाच के वश में हो जाते हैं ।।११३।। ____ असंतोष के फल बताकर अब संतोष का फल बताते हैं।१७०।असन्तोषवतः सौख्यं, न शक्रस्य न चक्रिणः । जन्तोः सन्तोषभाजो, यदभयस्येव जायते।।११४॥ अर्थ :- असंतोषी मनुष्य चाहे वह इंद्रमहाराज और चक्रवर्ती ही हो, उसे जो सुख प्राप्त नहीं होता, उसे संतोषी __ मनुष्य अभयकुमार को प्राप्त संतोष रूपी साम्राज्यसुख की तरह प्राप्त कर लेता है ।।११४।। अभयकुमार की संप्रदायगम्य कथा इस प्रकार है 178
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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