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________________ सगरचक्रवर्ती की कथा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ११२ | उन्हें इसका जहर उतारने की आज्ञा दी। उन्होंने अपने मंत्रकौशल से जहर उतारने की बहुतेरी कोशिक की, मगर राख में घी डालने के समान वह निष्फल सिद्ध हुई । वह मरा हुआ व्यक्ति जीवित न हो सका । परंतु उधर उस शोकग्रस्त | ब्राह्मण को भी समझाना आसन न था। अतः राजा ने एक युक्ति से समझाया - विप्रवर! तुम ऐसा करो, जिसके यहां आज तक कोई मरा न हो, उसके यहां से एक मुट्ठी राख ले आओ। बस, राख मिलते मैं तुम्हारे पुत्र को जिला दूंगा। राजा के कहते ही ब्राह्मण ने हर्षित होकर कहा - यह तो बहुत ही आसान बात है । ब्राह्मण वहां से चल पड़ा और गांव-गांव | और नगर - नगर में घूमता फिरा राख की तलाश में । परंतु ऐसा कोई घर न मिला; जिसके यहां आज तक कोई न मरा | हो । ब्राह्मण निराश होकर खाली हाथ लौट आया तो राजा ने कहा- 'विप्रवर ! राख ले आये क्या? ब्राह्मण ने कहा| महाराज ! ऐसा कोई घर न मिला, जहां कोई मरा न हो । अतः अब तो आप ही ऐसी राख दे दीजिए। राजा ने कहा| मेरे कुल में भी भगवान् ऋषभदेव, भरत चक्रवर्ती, बाहुबली, सूर्ययशा, सोमयशा आदि अनेक व्यक्ति चल बसे हैं, कोई | मोक्ष गया तो कोई स्वर्ग में, राजा जितशत्रु मोक्ष में गये हैं, सुमित्र राजा देवलोक में गये हैं। अतः मृत्यु तो सर्वसाधरण है। जब इतने - इतने मर गये और उनका वियोग हमने सह लिया तो फिर तुम अपने एक पुत्र का वियोग क्यों नहीं सहन | कर लेते? ब्राह्मण ने कहा - महाराज ! आपकी बात सही है। परंतु मेरे तो एक ही पुत्र है, इसलिए आपको इसे बचाना | चाहिए। दीनों और अनाथों की रक्षा करने का तो सत्पुरुषों का नियम होता है। चक्रवर्ती ने कहा- विप्रवर! तुम शोक | मत करो! मृत्यु के दुःख से संसार में मुक्त होने का उपाय वैराग्यभावना की शरण ही है। ब्राह्मण ने उन्हें उसी सिक्के |में जवाब दिया- पृथ्वीनाथ ! यदि ऐसी बात है तो आपके साठ हजार पुत्रों के मरने का भी आपको शोक नहीं होना | चाहिए। राजा ने सुनते ही चौंककर कहा- ऐं क्या कहा? मेरे ६० हजार पुत्र मर गये? कैसे मरे ? क्या एक भी नहीं बचा ? | क्या हुआ? यह विस्तार से कहिए? इस पर पहले से संकेत किये हुए सैनिकों ने आकर आद्योपांत सारी आपबीती सुनाई। | यह महाभयंकर समाचार सुनते ही सगरचक्री सहसा मूर्च्छित होकर धड़ाम से उसी तरह धरती पर नीचे गिर गया, जिस | तरह वज्र पर्वत पर गिर पड़ता है। मूर्च्छा समाप्त होते ही राजा होश में आये। कुछ देर तक तो राजा साधारण आदमियों की तरह रोने लगे। उन्हें इस घटना से संसार से विरक्ति हो गयी। वह विचारने लगे- मेरे पुत्र मेरे वंश की शोभा बढ़ायेंगे, मुझे आनंद देंगे, इसी आशा में संसार को असार समझते हुए भी मैंने कुछ नहीं सोचा। धिक्कार है मुझे ! इतने पुत्रों के होते हुए भी मुझे तृप्ति नहीं हुई तो फिर दो चार पुत्रों के और बढ़ जाने से कैसे होती? मेरे जीते जी अकस्मात् | मेरे पुत्रों की यह गति हुई है, और वे मेरे पुत्र मुझे कोई संतोष न दे सके ! हाय! संसार की ऐसी अधम लीला है। इसमें फंसकर जीवन को व्यर्थ ही खोना है। इस प्रकार सगर चक्रवर्ती ने जन्हुकुमार के पुत्र भगीरथ का राज्याभिषेक करके | भगवान् अजितनाथ के चरणों में दीक्षा धारण की और संयम पालनकर अक्षयपद प्राप्त किया। यह है सगर चक्री की जीवनी का संक्षिप्त हाल! कुचिकर्ण की गोव्रज पर आसक्ति : मगधदेश में सुघोषा नामक गांव था। वहां कुचिकर्ण नाम का एक प्रसिद्ध ग्रामनायक था। उसने धीरे-धीरे एक | लाख गायें इकट्ठी की । बूंद-बूंद से सरोवर भर जाता है। उसने उन गायों का अलग-अलग टोले बनाकर पालन करने के लिए वे विभिन्न ग्वालों को सौंप दी। परंतु वे ग्वाले आपस में तूं तूं - मैं-मैं करने लगे, एक कहता- मेरी गाय सुंदर है। दूसरा कहता है - तेरी गाय सुंदर नहीं है, मेरी गाय सुंदर है, इस प्रकार उन्हें लड़ते देखकर कुचिकर्ण ने उन गायों के अलग-अलग विभाग करके किसी को सफेद, किसी को काली, किसी को पीली, किसी को कपिला नाम देकर भिन्नभिन्न अरण्यों में गोकुल स्थापित कर दिये। स्वयं भी वह गोकुल में रहकर दूध, दही का भोजन करता था । मदिरा का व्यसनी जैसे पर्याप्त मदिरा पी लेने पर भी अतृप्त रहता है, वैसे ही कुचिकर्ण भी इतने दूध-दही के सेवन करते हुए भी | अतृप्त रहता था। दूध दही के अत्यधिक सेवन से उसे शरीर में ऊपर-नीचे फैलने वाला रस युक्त अजीर्ण हो गया। उसके | पेट में इतनी अधिक जलन होती, मानो वह आग में पड़ा हो। वह जोर-जोर से चिल्लाता - हाय! मैं अपनी गायों, बैलों, बछड़ो को फिर कब प्राप्त करूंगा? इस प्रकार गोधन से अतृप्त कुचिकर्ण वहां से आयुष्य पूर्ण कर तिर्यंचगति में पैदा हुआ। 176
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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