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________________ नकली असली सुग्रीव में युद्ध, साहसगति की मृत्यु योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ९९ मारा है। अब तो यही चिंता है कि कैसे यह मायावी एवं प्रबल पराक्रमी द्वेषी दुष्ट मुझसे मारा जायेगा? धिक्कार है बाली के नाम को लज्जित करने और अपने पराक्रम से गिरने वाले मुझे?' महाबली अखंड पुरुष-व्रत पालक बाली को धन्य है. जिन्होंने तिनके के समान राज्य का त्यागकर परमपद की प्राप्ति की। मेरा पुत्र चंद्ररश्मि भी यद्यपि बलवान है, फिर | भी हम दोनों का रहस्य न जानने के कारण वह भी किसकी रक्षा करे, किसकी नहीं? इस पशोपेश में पड़ा है। परंतु चंद्ररश्मि ने इतना अच्छा किया कि उस दुष्ट को अंतःपुर में नहीं घुसने दिया। इस कट्टर दुश्मन को मारने के लिए मैं मुझ से बढ़कर किस बलिष्ठ का आश्रय लूं? क्योंकि 'शत्रु को तो किसी भी सूरत से खुद के या दूसरे के द्वारा मार डाला जाना चाहिए।' क्या मैं पाताल, धरती और स्वर्ग इन तीनों में पराक्रमी मरुत का या यज्ञ को भंग करने वाले रावण का शत्रुवध के लिए आश्रय लूं? नहीं, नहीं, वह तो स्वभाव से स्त्रीलंपट और तीनों लोकों में कांटे की तरह है। उसका वश चलेगा तो वह उसे और मुझे मारकर तारा को अपने अधीन कर लेगा। ऐसे संकट के समय दृढ़ साहसी, कठोर खर शक्तिशाली राजा था, लेकिन राम ने उसे मार दिया। अतः अब तो यही उपाय है कि शक्तिशाली, भुजबली राम और लक्ष्मण के पास जाकर उनसे मैत्री करूं? उन्होंने कुछ दिनों पहले विराध को राजगद्दी पर बिठाया है और अभी वे विराध के आग्रह से पाताललंका में ही रुके हुए हैं। इसी तरह सुग्रीव ने एकांत में गहरा मंथन करके अपने एक विश्वस्त दूत को विराध के पास भेजा। उसने पाताललंका में जाकर विराध को नमस्कार करके अपने स्वामी द्वारा कहा गया संदेश उन्हें दिया और अंत में कहा-'हमारे स्वामी बड़े संकट में हैं। वे आपके जरिये रघुनंदन राम और लक्ष्मण की शरण स्वीकार करना चाहते हैं।' विराध ने कहा-'सुग्रीव को यहां जल्दी से जल्दी ले आओ। सब कुछ ठीक होगा।' सत्पुरुषों का समागम प्रबल पुण्य से मिलता है। दूत ने आकर सारी बात सुग्रीव से कही। सुग्रीव ने भी अपने उत्तम घोड़े पर चढ़कर प्रस्थान किया और घोड़े की हिनहिनाहट से सभी दिशाओं को शब्दायमान करता हुआ, दूतगति से दूरी कम करता हुआ वह चलने लगा। पड़ोसी के घर की तरह शीघ्र ही वह पाताललंका पहुंच गया। वहां वह सर्वप्रथम विराध से मिला। विराध भी उससे गले लगाकर प्रेम से मिला और निःस्वार्थ पररक्षक श्रीराम से उसे मिलाया। सुग्रीव ने उन्हें नमस्कार किया और अपनी सारी कष्टकथा कह सुनायी। अंत में कहा- 'ऐसे संकट के समय आप ही मेरे शरणभूत है। जब छींक रुक जाय, तब सूर्य का ही एकमात्र शरण लिया जाता है।' स्वयं संकट में होते हुए भी श्रीराम उसका संकट मिटाने को तैयार हुए। महापुरुष अपना कार्य सिद्ध करने की अपेक्षा परकार्य के लिए अधिक प्रयत्नशील होते हैं। विराध ने सीताहरण का वृतांत सुग्रीव से कहा। सुग्रीव ने हाथ जोड़कर श्री राम से सविनय निवेदन किया-'समग्र विश्व को जैसे सूर्य प्रकाशित करता है, वैसे ही आप सब की रक्षा करने में समर्थ हैं। आपको किसी की सहायता की अपेक्षा नहीं रहती। फिर भी हे देव! मेरी आपसे प्रार्थना है कि आपकी कृपा से शत्रु को मारने में अपनी सेनासहित में आपका अनुगामी बनूंगा और शीघ्र से शीघ्र सीता के समाचार लाऊंगा।' सुग्रीव के साथ श्रीराम ने किष्किन्धा की ओर प्रयाण किया। विराध भी साथ-साथ आना चाहता था, लेकिन श्रीराम ने उसे समझा-बुझाकर वापिस लौटा दिया। श्रीराम सुग्रीव के साथ आगे बढ़ते गये। उन्होंने किष्किन्धानगरी के पास अपनी सेना का पड़ाव डाला और युद्ध के लिए नकली सुग्रीव को ललकारा। कपटी सुग्रीव भी गर्जन तर्जन करता हुआ वहां आ धमका। कहावत है-भोजन का न्यौता मिलने पर ब्राह्मण आलस्य नहीं करते, वैसे ही युद्ध का आमंत्रण मिलने पर शूरवीर आलस्य नहीं करते। वहीं जंगल के हाथी की तरह मदोन्मत्ततापूर्वक लड़ते हुए दोनों सुग्रीव अपने पैरों से पृथ्वी को कंपाने लगे। दोनों का रूप एकसरीखा होने से श्रीराम संशय में पड़ गये कि मेरा सुग्रीव कौन-सा और नकली सुग्रीव कौन सा है? इससे वे क्षणभर उदासीन-से होकर यह सोचने लगे कि जो होने वाला है, वह तो होगा ही। दूसरे ही क्षण उन्होंने वज्रावर्त नामक धनुष्य की टंकार की। उस टंकार को सुनते ही साहसगति की रूपरावर्तनी विद्या जाती रही। अब अपने असली रूप में आते ही श्रीराम ने साहसगति को ललकारा-दुष्ट! रूप बदलकर सबकी आंख में धूल झोंककर तूं परस्त्रीरमण करना चाहता है, पापी! अपना धनुष्य तैयार कर। यों कहकर श्रीराम ने एक ही बाण से उसका काम तमाम कर दिया। क्योंकि हिरण को मारने में सिंह को दूसरे पंजे की आवश्यकता नहीं पड़ती। अब श्रीराम ने विराध की तरह सुग्रीव को भी किष्किन्धानगरी की | राजगद्दी पर बिठाया। राजा सुग्रीव भी पहले की तरह प्रजा-मान्य बन गया। 159
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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