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________________ ब्रह्मदत्त चक्री की कथा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक २७ से भी बढ़कर मधुर गीत गाने लगे। और तंबूरा तथा वीणा बजाने में नारद से भी बाजी मारने लगे। गीत-प्रबंध में उल्लिखित स्पष्ट सात स्वरों से जब वे वीणा बजाते थे, तब किन्नरदेव भी उनके सामने नगण्य लगते थे। और धीरघोष वाले वे दोनों जब मृदंग बजाते थे, तब मुरदैत्य के अस्थिपंजरमय वाद्य को लिए हुए कृष्ण का स्मरण हो आता था। नाटक भी वे ऐसा करते थे, जिससे महादेव (शिव) उर्वशी, रंभा, मुंज, केशी, तिलोत्तमा आदि भी अनभिज्ञ थे। ऐसा मालूम होता था, मानो ये दोनों गांधर्वविद्या के सर्वस्व और विश्वकर्मा के दूसरे अवतार हों। सचमुच, प्रत्यक्ष में अभिव्यक्त होने वाला उनका संगीत भला किसके मन को हरण नहीं करता? एक बार उस नगर में मदन-महोत्सव हो रहा था। तब नगर की संगीतप्रवीण सुंदर गीतमंडलियाँ चित्र और संभूति के निकट से गुजरी। बहुत से नागरिक नर नारी इनके गीतों से आकर्षित होकर हिरणों के समान झुंड के झुंड आ-आकर इनके पास जमा होने लगे। यह देखकर कुछ नागरिकों ने राजा से जाकर यह शिकायत की, कि 'नगर के बाहर दो मातंग आये हुए हैं। सुंदर गीत गा-बजाकर अपनी ओर आकर्षित कर लेते है और अपनी तरह सभी को दूषित कर रहे हैं। 'यह सुनते ही राजा ने नगर के बड़े कोतवाल को उलाहना देते हुए आज्ञा दी-'खबरदार! ये दोनों नगर में कदापि न होने पाये।' इस राजाज्ञा के कारण वे दोनों तभी से वाराणसी के बारह रहने लगे। नगरी में एक दिन कौमदीसव हआ। उस दिन इन दोनों चंचलेन्द्रिय मातंगपत्रों ने राजाज्ञा का उल्लंघन कर हाथी के गंडस्थल में भ्रमण की तरह नगर में प्रवेश किया। सारे शरीर पर बुर्का डाले हुए दोनों मातंगपुत्र वेष बदलकर चोरों की भांति गुपचुप उत्सव देखते हुए नगर में घूम रहे थे। जैसे एक सियार की आवाज सुनकर दूसरा सियार बोल उठता है, वैसे ही नगर के संगीतज्ञों का स्वर सुनकर ये दोनों भी अत्यंत मधुरकंठ से गीत गाने लगे। 'भवितव्यता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।' उनके कर्णप्रिय मधुर गीत सुनकर नगर के युवक इस प्रकार मंडराने लगे, जैसे मधुमक्खियां अपने छत्ते पर मंडराती है। लोगों ने यह जानने के लिए कि ये कौन है? उनका बुर्का खींचा। बुर्का खींचते ही उन्हें देखकर लोग बोल उठे-'अरे ये तो वे ही दोनों चांडाल है! दुष्टो! खडे रहो;' यों कहकर लोग एकदम उन पर टूट पड़े। कइयों ने लाठी, ढेले, पत्थरों आदि से उन्हें मारा-पीटा और उनका भयंकर अपमान किया। इससे वे दोनों गर्दन झुकाए शर्मिन्दा होकर उसी तरह नगरी से बाहर निकल गये, जैसे कुत्ते गर्दन नीची किये घर से चले जाते हैं। एक और जनता की विशाल भीड़ उनके पीछे लगी थी; दूसरी ओर, वे दोनों ही थे। उस समय वे ऐसे लगते थे, मानो एक छोटे-से खरगोश पर सारी सेना टूट पड़ी हो। कदम-कदम पर ठोकर खाते हुए भागते-दौड़ते बड़ी कठिनता से वे गंभीर नामक उद्यान में पहुंचे। वहां पहुंचकर दोनों भाइयों ने विचार किया-'सर्प द्वारा सूंघा हुआ दूध जैसे दूषित हो जाता है, वैसे ही खराब | (चांडाल) जाति से दूषित होने के कारण अब हमारे कला-कौशल, रूप आदि को धिक्कार है। हमारे गुणों से उपकृत होकर हमारी कद्र करना तो दूर रहा; उल्टे हम पर कहर बरसाकर हमारा अपकार किया जाता है। अतः ऐसी कायरता की शांति धारण करने से तो विषमता उत्पन्न होती है। कला, लावण्य और रूप ये सब शरीर के साथ जुड़े हुए हैं और जब शरीर ही अनर्थ का घर हो गया है, तब उसे तिनके की तरह झटपट छोड़ देना चाहिए। यों निश्चय करके वे दोनों प्राण-त्याग करने को उद्यत हुए। उस समय वे दोनों दक्षिण-दिशा में उसी तरह चले जा रहे थे, मानो मृत्यु से साक्षात्कार करने जा रहे हों। आगे चलते-चलते उन्होंने एक पर्वत देखा। उस पर चढ़कर नीचे देखा तो उन्हें हाथी सूअर से बच्चे जितना नजर आता था। अतः उन्होंने इसी पर्वत से कूदकर आत्महत्या करने की इच्छा से भृगुपात करने की ठानी। किन्तु पर्वत पर चढ़ते समय जंगम गुणपर्वत सरीखे एक महामुनि मिले। पर्वत के शिखर पर वर्षाऋतु के बादलों के समान मुनि को देखकर वे दोनों शोक-संताप से मुक्त हुए। उनकी आंखों से हर्षाश्रु उमड़ पड़े, मानो अश्रुत्याग के बहाने वे पूर्वदुःखों का त्याग कर रहे थे। वे दोनों उन मुनिवर के चरण-कमलों में ऐसे गिर पड़े, जैसे भौंरा कमल पर गिरता है। मुनि ने ध्यान पूर्ण करके उनसे पूछा-'वत्स! तुम कौन हो? यहां कैसे और क्यों आये हो?' उन्होंने आद्योपांत अपनी सारी रामकहानी सुनायी। मुनि ने उनसे कहा-'वत्स, भृगुपात करने से शरीर का विनाश जरूर किया जा सकता है; मगर सैंकड़ों जन्मों में उपार्जित अशुभ कर्मों का विनाश नहीं। यदि तुम्हें इस शरीर का त्याग करना है तो फिर शरीर का फल प्राप्त करो और मोक्ष एवं स्वर्ग आदि के महान् कारण रूप तप की आराधना करो। वही तुम्हें शारीरिक और 95
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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