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________________ जमदग्नि का रेणुका के साथ पाणिग्रहण और परशुराम का जन्म, राज्य ग्रहण योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक २७ ने अपनी पत्नी के लिए ब्रह्मचरु तैयार किया और अपनी साली के लिए क्षत्रियपुत्र उत्पन्न करने हेतु एक मंत्रसाधित क्षात्रचर तैयार किया। जब दोनों चरु मंत्रसाधना से तैयार हो गये तब तापस ने रेणुका को दे दिये। रेणुका ने सोचा कि'मैं यहां पर इस घोर जंगल में हिरणी के समान अरक्षित बनी हुई हूँ। मेरे कोई क्षत्रियपुत्र हो तो अच्छा; जो मेरी रक्षा कर सके। यों विचारकर उसने ब्रह्मचरु के बदले क्षात्रचरू का भक्षण कर लिया। और ब्रह्मचरु अपनी बहन को दे दिया। समय पर दोनों के पुत्र हुए। रेणुका के पुत्र का नाम 'राम' रखा और उसकी बहन के पुत्र का नाम 'कृतवीर्य' रखा गया। पिता ऋषि होने पर भी जल में बडवानल की तरह तापस जमदग्नि के यहां उनका पत्र 'राम' क्षात्रतेज के साथ क्रमश: बढ़ने लगा। एक दिन आश्रम में एक विद्याधर आया। वह अतिसार-रोग से पीड़ित होने से आकाशगामी विद्या भूल गया था। राम ने भाई की तरह उसे औषधि आदि देकर उसकी सेवा की। अतः अपनी सेवा के बदले में उसने राम को परशुसंबंधी पारशवी नामक विद्या दी। शरवन नामक वन में अंदर जाकर उसने पारशवी विद्या की साधना की। इसके कारण बाद में राम परशुराम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। एक बार अपनी बहन से मिलने की उत्कंठा से रेणुका पति से पूछकर हस्तिनापुर चली गयी। प्रेमियों के लिए कोई चीज दूर नहीं है। अपनी साली चपलनेत्रा रेणुका को आयी देखकर लाड़-प्यार करते हुए अनंतवीर्य ने उसके कोमल अंगों पर हाथ फिराते-फिराते उसके साथ कामक्रीड़ा की। सचमुच, काम बड़ा निरंकुश है। अहिल्या के साथ इंद्र ने जैसे कामसुख का अनुभव किया था, वैसे ही अनंतवीर्य ने तापस पत्नी के साथ इच्छानुसार विषयसुख-संपदा का अनुभव किया। जैसे ममता-पत्नी से बृहस्पति को उतथ्य नामक पुत्र हुआ वैसे ही अनंतवीर्य से रेणुका को पुत्र हुआ। ऋषि रेणुका को उस पुत्र के साथ अपने घर ले आया। सच है, स्त्री के मोह में आसक्त मनुष्य प्रायः दोष नहीं देखता। अकाल में फलित लता के समान पुत्र-सहित रेणुका को देखकर परशुराम एकदम क्रुद्ध हो उठा। उसने आव देखा न ताव, शीघ्र ही अपने परशु से उस बालक को मार डाला। रेणुका ने यह बात अपनी बहिन के द्वारा अनंतवीर्य को कहलायी। यह सुनते ही हवा से आग की तरह अनंतवीर्य का क्रोध भड़क उठा। अतिपराक्रमी बाहुबली अनंतवीर्य | राजा फौरन जमदग्नि के आश्रम में आ पहुंचा। यहां आते ही मदोन्मत्त हाथी की तरह उसने जमदग्नि के आश्रम को | पेड़ों को उखाड़कर उसे नष्ट-भ्रष्टकर डाला। वहां के तापसों को परेशान करके उनकी गायें बछड़े आदि सब छीन लिये और केसरीसिंह की तरह मस्ती से झूमता हुआ अनंतवीर्यनृप हस्तिनापुर लौटा। दुःखित तपस्वियों का आर्तनाद और उनके साथ हुई ज्यादती व संघर्ष का कोलाहल सुनकर एवं आश्रम को उजाड़ने की बात जानकर क्रुद्ध परशुराम साक्षात् यमराज के समान परशु लेकर दौड़ा। अनेक सुभटों का युद्ध देखने को उत्सुक जमदग्नि-पुत्र परशुराम ने भयंकर परशु (कुल्हाड़े) से काष्ठ के समान अनंतवीर्य के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। अनंतवीर्य की मृत्यु हो जाने पर प्रजा के अग्रगण्यों ने उसके पत्र को राजगद्दी पर बिठाया। अभी वह छोटी उम्र का ही था। अपनी माता से एक दिन अपने पिता की मत्य की बात सुनकर और माता से आज्ञा प्राप्त करके वह चला और सर्प के समान जमदग्नि को मारकर बदला लिया। पिता की हत्या की बात से परशुराम का क्रोध अति उग्र हो गया। वह तत्काल हस्तिनापुर पहुंचा और उसने परशु के एक ही प्रहार से कृतवीर्य का खात्मा कर दिया। यमराज के लिए कौन-सी बात असाध्य है? कृतवीर्य के मरने के बाद परशुराम स्वयं उसकी गद्दी पर बैठा। राज्य सदा पराक्रमाधीन होता है; उसमें परंपरागत क्रम नहीं होता।' जैसे हिरनी सिंह से डरकर भागती है, उसी प्रकार कृतवीर्य की गर्भवती पत्नी हस्तिनापुर को अपने काबू में कर लेने के बाद परशुराम के डर से तापसों के एक आश्रम में पहुंची। तापसों ने उसे निधान की तरह भूमिगृह (तलघर) में रखी और क्रूर परशुराम से उसकी रक्षा की। एक दिन रानी ने तलघर में चौदह महास्वप्न से सूचित शुभ समय पर एक सुंदर स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया। सुख से भूमिगृह में रखने के कारण उसकी माता ने उसका नाम 'सुभूम' रखा। परशुराम का परशु जहां-जहां क्षत्रिय थे, वहां-वहां साक्षात् मूर्तिमान कोपाग्नि होकर जलने लगा और हजारों क्षत्रियों को मारने लगा। एक दिन अनायास ही परशुराम उस आश्रम में आ चढ़ा, जहां सुभूम का पालन-पोषण हो रहा था। जहां-जहां धुंआ होता है, वहां-वहां अग्नि 92
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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