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________________ दर्पण बनो मैंने कहा : मामला क्या है ! उसने कहा कि सदा मां ने अपने ही कमरे में सुलाया। अब तो उम्र उसकी कोई सत्ताईस साल है । अकेला नहीं सो सकता कमरे में ! कोई न कोई चाहिए। मां का परिपूरक कोई चाहिए। कोई कमरे में न हो, तो वह अकेला नहीं सोता । वह कहता है : मुझे नींद ही नहीं आती। अब यह जरा जरूरत से ज्यादा बात हो गयी। हां, छोटा बच्चा है, अकेला नहीं सो सकता, यह समझ में आता है। मां सो जाए। लेकिन जैसे ही बच्चे की क्षमता जगने लगे, वैसे ही उसे हट जाना चाहिए। अब यह बच्चा तो रुग्ण हो गया । इसको सहारा नहीं मिला, जहर हो गयी बात । और ऐसा ही इस सूक्ष्म जगत में भी घटता है— गुरु और शिष्य के बीच | गुरु अगर कसकर हाथ पकड़ ले, जैसा गुरु पकड़ लेते हैं। ... जो कसकर हाथ पकड़ ले, समझ लेना कि वह मिथ्या - गुरु है । जो तुम्हारा कसकर हाथ पकड़ रहा है, वह तुम्हें सहारा कम दे रहा है; खुद सहारा ज्यादा ले रहा है। इस बात को खयाल में रख लेना । जो कसकर हाथ पकड़ रहा है, वह भला तुमसे कह रहा हो कि मैं तुम्हें सहारा दे रहा हूं, लेकिन वह खुद अकेला होने में डरता है । और तुम अगर उसे छोड़ोगे, तो वह बहुत नाराज होगा। वह बहुत क्रोध से भर जाएगा। वह तुम्हें अभिशाप देगा। वह कहेगा कि यह तो बगावत हो गयी; दगा हो गया; धोखा हो गया ! 1 यह गुरु खुद ही कमजोर है । यह तुम्हारा हाथ पकड़कर खुद भी हिम्मत जुटा रहा था। यह किसी काम का नहीं है । यह तुम्हें क्या हिम्मत देगा? इसमें खुद भी हिम्मत नहीं है। सदगुरु की परिभाषा है : जो तुम्हारा हाथ पकड़े, बहुत पोले- पोले पकड़े। इतना पोला पकड़े कि कभी हाथ खिसकाना पड़े, तो तुम्हें पता भी न चले। तुम्हारे हाथ पर दबाव भी न पड़े। तुम्हारे हाथ को पकड़े जाने की आदत भी न पड़े। आदत के पहले हाथ सरक जाए। सदगुरु वही है, जो अंततः तुम्हें तुम्हीं पर फेंक दे, ताकि तुम अपने पैरों पर खड़े • हो जाओ - अपनी स्वतंत्रता में, अपनी महिमा में; ताकि तुम अपने भीतर के सत्य कालो । मुक्तानंद जैसे गुरु एक काम करते हैं : जोर से पकड़ लेते हैं । कृष्णमूर्ति जैसे गुरु दूसरा काम करते हैं: वे पकड़ते ही नहीं । वे छिटककर दूर खड़े रहते हैं। अभी चाहे बच्चा छोटा हो; चाहे अभी घुटने सरकता हो; वे कहते हैं कि नहीं, हाथ पकड़ने में खतरा है। हाथ मैं नहीं पकडूंगा। तुम खुद ही खड़े हो जाओ। तुम खुद ही चलो। वे दूर खड़े रहते हैं। वे दूर से ही कहते हैं कि चलो, खुद ही खड़े हो जाओ। अपने पैर पर खड़े हो जाओ! यह बात भी जंचती नहीं, क्योंकि छोटा बच्चा अभी अपने पैर पर खड़ा नहीं हो सकता है। बहुत संभावना है कि यह जिंदगीभर घिसटता रहे; घुटने के बल ही चलता 183
SR No.002388
Book TitleDhammapada 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1991
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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